विचार / लेख

शाकाहारी हिन्दू, और हिन्दू-मुस्लिम...
06-Dec-2020 6:42 PM
शाकाहारी हिन्दू, और हिन्दू-मुस्लिम...

-अजीत साही

मैं वेजिटेरियन हूँ। अंडा भी नहीं खाता हूँ। अंडे वाला केक तक नहीं खाता हूँ। पिछले करीब बारह सालों से मैं मुसलमानों के बीच खासा उठ-बैठ रहा हूँ। जब इंडिया में था तो देश भर में कई मुस्लिम संगठनों ने मुझे दर्जनों बार तकरीर के लिए बुलाया। बंगाल, केरल, बिहार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, यूपी, मध्यप्रदेश, राजस्थान और यहाँ तक कि गोवा में भी भाषण दिया है। खाड़ी के देशों में प्रवासी भारतीय मुसलमानों के निमंत्रण पर भी कई बार गया।

पिछले पाँच सालों से अमेरिका में बसे भारतीय मुसलमानों ने भी अलग-अलग शहरों में मेरा भाषण रखा। इसके अलावा इंग्लैंड और साउथ अफ्रीका में भी मुस्लिम संगठनों का मेहमान रहा हूँ। इतने सालों में एक बार छोडक़र ऐसा कभी नहीं हुआ कि ऐसे मौकै पर मेरे लिए वेजिटेरियन खाना न रहा हो। लगभग सभी जगह मुझे छोडक़र कोई दूसरा वेजिटेरियन नहीं होता है। सौ-दो-सौ लोगों का खाना आर्डर पर बना हुआ होता है लेकिन मेरे लिए अलग से वेजिटेरियन खाना तैयार मिलता है। मुझे बहुत बाद में पता चला कि हर लोकेशन पर किसी एक की पहले से जिम्मेदारी मुकर्रर होती है कि मेरे लिए वेजिटेरियन खाने का इंतजाम करें।

भारत के बाहर कई बार तो मुसलमान बहनें अपने घर से मेरे लिए वेजिटेरियन खाना पका कर लाती हैं और उनके शौहर मुझे बताते हैं कि आप बिंदास खाइए क्योंकि आज हमने घर पर नॉनवेज बनाया ही नहीं इसलिए मांस के छू जाने का सवाल नहीं उठता। मुझे शर्मा कर उन्हें बताना पड़ता है कि मैं छुआछूत नहीं करता हूँ और मांस खऱीद के भी लाता हूँ और अपने परिवार के लिए पकाता भी हूँ, बस खाता नहीं हूँ। और हर जगह मेरे लिए खाना इतना ले आते हैं कि दस लोग खा लें। आगे चल कर मैंने पहले से कहना शुरू कर दिया कि, भईया, एक आदमी का ही खाना लाना वरना खाना बेकार जाता है। जब कभी तकरीर के बाद भोज नहीं होता है तो मेजबान संगठन के छह-सात लोग रेस्तराँ का प्रोग्राम बना के तैयार रहते हैं। दस में नौ बार वो मुझे वेजिटेरियन रेस्तराँ में ले जाते हैं।

मुझे कहना पड़ता है कि, देखिए, मुझे मांसाहार से परहेज है मांसाहारी से नहीं। इस पर या तो मुसलमान भाई-बहन हंस के कहते हैं कि, अरे, अजित भाई, हम तो रोज़ मांस खाते ही हैं, आज आपके बहाने वेजिटेरियन का मजा लेना चाहते हैं। या ये कहते हैं कि, अरे, ऐसा नहीं है कि हम हर समय मांस खाते हैं। इन बारह सालों में आज तक एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी मुसलमान भाई या बहन ने मेरे वेजिटेरियन होने का मज़ाक़ बनाया हो या नीचा दिखाया हो। या ये बोला हो कि अगर मांस नहीं खाते हो तो प्रोटीन कहाँ से मिलता है फिर? अभी पिछले महीने यहाँ अमेरिका में छह-सात दोस्तों ने, जो कि सभी मुसलमान हैं, एक पिकनिक का प्रोग्राम रखा। सबकी पत्नियाँ और बच्चे साथ थे। सब लोग घर से एक-एक डिश पका कर लाए। हमें कुछ भी लाने से मना कर दिया। जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा कि उन्होंने मुझ अकेले के लिए वेजिटेरियन बिरयानी, पनीर की सब्ज़ी, मिक्स्ड वेजिटेबल और दाल बनाई थी। पुरु की बर्थडे तभी बीती थी तो सब लोग उसके लिए सरप्राइज गिफ़्ट्स लेकर आए थे। और पुरु से केक की जगह रसमलाई कटवाई ये कहकर कि केक लाते तो उसमें अंडा होने की वजह से अजित भाई नहीं खाते।

हिंदू दोस्तों के साथ मेरा अनुभव थोड़ा अलग है। अपने परिवार वाले तो बहुत खयाल रखते हैं। लेकिन जब कभी दूसरे और लोगों के साथ बाहर खाता हूँ तो ये बताने से कतराता हूँ कि मैं वेजिटेरियन हूँ। वजह ये है कि मांसाहारी हिंदू मेरे वेजिटेरियन होने का अक्सर मज़ाक़ उड़ाने लगते हैं। कई बार ये भी अनुभव हुआ है कि हिंदू दोस्त ने छह-सात दोस्तों को घर पर बुलाया और इसका ख्याल ही नहीं रखा कि कोई वेजिटेरियन भी हो सकता है। या खय़ाल रखा भी तो उनको यही ठीक लगा कि बाक़ी सब को तो तीन प्रकार के मटन-चिकन और कबाब खिलाना लाजमी है, बस इस वेजिटेरियन को एक सब्ज़ी दे देंगे और एक दाल रख देंगे तो बहुत होगा, क्योंकि अब एक आदमी के लिए क्या सर खपाएँ। पचासों हिंदू मुझे कह चुके हैं कि वेजिटेरियन क्यों हो? मीट क्यों नहीं खाते? ये क्या ड्रामा है? अब शुरू कर दो। मांस न खाना बेवकूफी है। वगैरह वगैरह।


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