विचार / लेख

यही योग दिवस का सत्य है
21-Jun-2021 2:57 PM
यही योग दिवस का सत्य है

- कृष्ण कांत
योग से तोंद पिचक सकती है। तोंद अमीरों को होती है। अमीर दफ्तरों में काम करते हैं और जरूरत से ज्यादा खाते हैं इसलिए मोटे हो जाते हैं। जो शारीरिक काम न करके मोटे और रोगी हो जाते हैं वे वाक पर जाते हैं, व्यायाम करते हैं या योग करते हैं। मजदूर, किसान, गरीब लोग ये सब नहीं करते। वे दिन भर हांड़ तोड़ मेहनत करते हैं और योग-व्यायाम को नौटंकी समझते हैं। मैं भी जब गांव में रहता था तो खेती और पशुपालन का काम करता था। तब मुझे भी ये सब नौटंकी लगता था। किसी किसान-मजदूर या ग्रामीण को आप योग बताएंगे तो हंस देगा। 

सरकार ने योग को वैश्विक स्तर पर सेलिब्रेट करना शुरू किया है। लेकिन मजदूर या किसान दिवस को उसी तरह सेलिब्रेट नहीं करती। देश अब भी मूल रूप से किसानों-मजदूरों और आम कामगारों के दम पर टिका है।  छोटे व्यापार, फैक्ट्रियों और आम रोजगार पर चोट की गई तो अर्थव्यवस्था दो साल से माइनस में चल रही है। दो साल से जब हर सेक्टर डूबा हुआ है, कृषि अकेला सेक्टर है जो मुनाफे में है। किसान-मजदूर देश की रीढ़ हैं, फिर भी सरकार उनके नाम से वैसे धूमधाम से कोई महोत्सव नहीं करती। 

प्राचीन भारत में योग योगियों की साधना का साधन था। योग और ध्यान के जरिये वे कुंडलिनी जागरण की अवस्था तक पहुंचने की बात कहते थे। तब योग आम लोगों की चीज नहीं था। 

टीवी आया तो वह अपने साथ एक व्यापारी बाबा लाया। बाबा ने तेल, साबुन, चूरन के साथ-साथ योग को भी बेचा और बताया कि योग सब मर्ज का इलाज है। अब योग तोंद वाले अमीरों का शगल या जरूरत है। आम लोग योगी नहीं होते। योग की कुछ शारीरिक क्रियाओं को ही आम लोगों पर थोपकर उसे संस्कृति से जोड़ा जा रहा है। सरकार कुछ प्रतिशत अमीरों के शगल को भारतीय संस्कृति बताकर उसका महोत्सव मनाती है।
 
एक दो प्रतिशत लोगों की शारीरिक प्रैक्टिस को देश की संस्कृति माना जाए या नहीं, इस पर विद्वान लोग बहस कर सकते हैं। इसे सेलिब्रेट किया जाए या नहीं, इस पर कोई बहस नहीं है क्योंकि ये किया जा रहा है। 

पूरे देश के रहन-सहन, जीवनचर्या, बोली-भाषा, पूजा पद्धति वगैरह का उत्सव क्यों नहीं मनाया जा रहा है, इस पर कोई सवाल नहीं पूछता। मजदूर और किसान संख्या में ज्यादा हैं, फिर भी उनके नाम अंतरराष्ट्रीय उत्सव क्यों नहीं होता? ये सवाल आज के माहौल में थोड़ा एन्टीनेशनल हो सकता है। 

ये सरकार दरअसल अमीरों के लिए काम करती है, धर्म और संस्कृति के नाम पर उनको उल्लू बनाती है, मध्यवर्ग धर्म और संस्कृति के सियासी बाजार का मुख्य खरीदार है। 

इस देश में दो लोग मिलकर दो परसेंट लोगों के लिए सरकार चलाते हैं। यही योग दिवस का सत्य है।


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