विचार / लेख

इनके लिए भले 3 की जगह 5 लाख मर जाएँ...
29-May-2021 5:32 PM
इनके लिए भले 3 की जगह 5 लाख मर जाएँ...

-कनुप्रिया

जीवन रुकता नहीं, प्रलय के बाद भी नहीं, सकारात्मक होने के लिए अतिरिक्त प्रयास की ज़रूरत ही नहीं, वह जीवन नामक इस अपरिहार्यता में शामिल है। आप लाख नकारात्मक होकर चाहें कि साँस रुक जाए तो वह रुकती नहीं, और साँस चलती है तो जीवन की गतिविधियाँ भी चलती हैं। मरा हुआ मन भी चुप मारे पड़े नहीं रह सकता, व्यवहार जगत का निर्वाह वह भी करता रहता है।

सुबह रसोई में काम करते समय रेडियो चलता रहता है, आज विविध भारती जाने कौन से गीत सुना रहा था (फिल्मी नहीं), गीत कह रहा था हम चाहे चले जाएँ भारत बचना चाहिए। कौन सा भारत? कैसा भारत? वो कौन सा भारत है जो सब भारतजनों के शवों पर भी बचा रहेगा? क्या यही देशभक्ति है? यह क्या सिखाया जा रहा है?  मैंने चैनल बदल दिया, आशा भोंसले गा रही थी ‘रात बाकी बात बाकी’, मन चाहे उदास हो उस गीत से तो यह गीत चलेगा मैंने सोचा। तभी रेडियो जॉकी ने सकारात्मकता का गान शुरू कर दिया, एक मेंटल ट्रेनर लाया गया जो कहता है अमेरिका में युद्ध के सिपाहियों के अवसादग्रस्त मन  को अपने अवचेतन मन की ट्रेनिंग के जरिये ठीक किया गया। सकारात्मक सोचिये, मैं बताता हूँ वो करिए, सोचिये कि मैं स्वस्थ हूँ, मैं स्वस्थ हूँ। इस पागलपन के बाद मैंने रेडियो बन्द कर दिया। इनके लिए कोविड भी युद्ध है जहाँ कोरोना वॉरियर होते हैं सेवियर नहीं।

जीवन के अत्यंत त्रासद दिनो में मैंने पत्थर भाटे सब पूजे, Art of living से लेकर योग ध्यान के कई शिविरों के चक्कर लगाए, न शांति मिली न सवालों के जवाब। ये केंद्र आपको सिखाते हैं कि बाहर से आने वाली नकारात्मकता अपरिहार्य है आप उसे महसूस करना बंद कर दीजिये, ख़ुद को बदलिए और उससे डील कीजिये, उसे बदलने की बात मत कीजिये।  कुल मिलाकर ये ज्यादातर सिस्टम के उपकरण होते हैं जो आपकी तर्क और संवेदनशक्ति कुंद करके आपको सिस्टम का अंतिम तौर पर गुलाम बनाते हैं, आपके भीतर उसके प्रति उठने वाले सवाल तक खत्म कर देते हैं। गजब ये है कि सिस्टम के लिये इस कदर अहिंसक ये केंद्र धार्मिक हिंसा और साम्प्रदायिकता पर चुप्पी मार जाते हैं।

 कल एक श्रद्धांजलि देती पोस्ट पर मेरे दुख के इमोटिकॉन पर एक भक्त हँसकर चला गया। इनके लिए भले 3 लाख की जगह 5 लाख मर जाएँ, ये अपने लक्ष्य और  उद्देश्य के लिए फोकस्ड हैं, वह उद्देश्य जो नागपुर में निर्धारित होता है। ये मृतकों के लिए ‘हमारी बला से भाड़ में जाओ’ की जगह एक पवित्र शब्द चुनते हैं ‘मुक्ति’, इनके लिए शववाहिनी गंगा भी पवित्र बनी रहती है।

प्रेम, ईश्वर, धर्म, मुक्ति, पवित्रता, देशभक्ति, बलिदान, सकरात्मकता, योग आदि-आदि कितने ही शब्द जो अपने निहित मानवीय उद्देश्यों के कारण खूबसूरत माने जाते हैं छल और मूर्ख बनाने के उत्तम औजार बन चुके हैं। शब्द अपने आप में अप्रशनेय नहीं होते, उद्देश्य बदलते ही उनके मायने बदल जाते हैं, असल बात उस उद्देश्य को समझने की है।

हम दु:ख, अवसाद, धक्के से जूझने वाले लोग, जो गतिशील बने रहने के लिये ख़ुद को  जीवन की न रुकने वाली अनिवार्य धारा से ही सींचते हैं। ऐसे लोगों से संघर्षरत हैं जो सकारात्मकता और आस्था की आड़ में संवेदनहीन हैं। यह दोधारी लड़ाई निश्चित तौर पर कठिन है।


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