राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : मैदान और मैडल!
16-Jun-2026 6:05 PM
राजपथ-जनपथ : मैदान और मैडल!

मैदान और मैडल!

राजधानी रायपुर के खिलाड़ी और खेल संघ इस बात को लेकर चिंतित हैं कि शहर में खेल मैदान सिमट रहे हैं। खाली सरकारी जमीनों पर आवासीय-व्यावसायिक कॉम्पलेक्स का निर्माण हो रहा है। शहर में दो ऐसी जगहें हैं, जो खेल मैदान के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं, लेकिन अब वहां भी आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं की आधारशिला रखने की तैयारी चल रही है। इनमें से एक बीटीआई शंकर नगर और दूसरी सिंचाई कॉलोनी शांतिनगर है।

बीटीआई शंकर नगर में खेल गतिविधियां होती रही हैं, मगर अब वहां बहुमंजिला आवासीय कॉम्पलेक्स के निर्माण के लिए टेंडर बुलाए जा रहे हैं। इसी तरह सिंचाई कॉलोनी शांतिनगर की 37 एकड़ जमीन पर पिछली सरकार ने पहले ही आवासीय-व्यावसायिक कॉम्पलेक्स की योजना बनाई थी। भाजपा सरकार भी अब इसी योजना को आगे बढ़ाती दिख रही है। इसको लेकर भाजपा के नेता भी नाखुश हैं।

रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने पहले ही दोनों परियोजनाओं पर अपनी असहमति जताई थी और मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था। इसके बाद कई अन्य भाजपा नेता भी इस फैसले के खिलाफ हो गए हैं। पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व विधायक देवजी पटेल ने भी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मिलकर बताया था कि शहर के एक बड़े हिस्से में एक भी खेल मैदान नहीं बचा है। उन्होंने मंडी बोर्ड की खाली जमीन के व्यावसायिक उपयोग पर भी चिंता जताई थी। स्थानीय भाजपा पार्षद और कई अन्य नेता धीरे-धीरे बड़े आवासीय-व्यावसायिक परियोजनाओं के खिलाफ हो रहे हैं। खिलाड़ी और खेल संघ भी लामबंद हो रहे हैं। खेल मैदान बचाने के लिए एक बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार हो रही है। देखना है आगे क्या होता है।

सरकार ओलंपिक मैडल लाने पर करोड़ रुपये का इनाम रखती है. न रहेंगे मैदान, न देने पड़ेंगे करोड़ रुपये।

इंसान के लिए न सही, कोयले के लिए

केंद्र सरकार ने धरमजयगढ़-पत्थलगांव-लोहरदगा नई रेल लाइन परियोजना को विशेष रेल परियोजना के रूप में अधिसूचित किया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस पर खुशी जताई है और प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त किया है। यह उम्मीद जताई जा रही है कि प्रस्तावित परियोजना के माध्यम से जशपुर जिले के रेल नेटवर्क से जुडऩे का मार्ग प्रशस्त होगा।

दरअसल, उत्तरी छत्तीसगढ़ रेल सुविधाओं के मामले में काफी पिछड़ा है। यहां रेल सुविधा बढ़ाने के लिए संघर्ष समिति बनी हुई है और समिति ने रेनुकूट (उत्तर प्रदेश) से अंबिकापुर तक रेल लाइन बिछाने की मांग को लेकर पदयात्रा भी की थी। विष्णुदेव साय सरकार ने उत्तरी छत्तीसगढ़ की कई प्रस्तावित रेल परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए काफी कोशिशें की हैं। प्रधानमंत्री और रेल मंत्री तक अपनी बात पहुंचाई है। ऐसे में धरमजयगढ़ रेल लाइन परियोजना को विशेष रेल परियोजना का दर्जा मिलने पर खुश होना स्वाभाविक है।

मगर वस्तुस्थिति कुछ अलग है। रेलवे इस परियोजना को आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं मानते हुए पहले ठंडे बस्ते में डाल चुकी है। हालांकि अब प्रस्तावित मार्ग पर कई कोयला खदानों में उत्खनन की संभावना है, ऐसे में यह परियोजना भविष्य में व्यवहारिक और लाभकारी साबित हो सकती है। अब देखना यह है कि परियोजना पर आगे काम बढ़ता है या नहीं।

कोरबा में सांपों की रहस्यमयी दुनिया

छत्तीसगढ़ में सांपों पर चर्चा की जाए तो कोरबा और जशपुर के उदाहरण पूरे देश में दिए जाते हैं। कोरबा छत्तीसगढ़ का एकमात्र ऐसा जिला है, जहां किंग कोबरा नियमित रूप से मिल जाते हैं। सन् 2014 से यहां सिस्टेमेटिक रिसर्च चल रही है, जिसमें 31 से ज्यादा नेस्टिंग स्पॉट्स मिल चुके हैं। सांपों के लिए जलवायु की विविधता, घने जंगल, नदी, झरने और बांस के झुरमुट आदर्श ठिकाने होते हैं। इसी वजह से एशिया के सबसे लंबे सांपों में गिना जाने वाला विषधर किंग कोबरा भी यहां पनप जाते हैं।  इसकी लंबाई 13 फीट तक हो सकती है, वैसे रिकार्ड 18-19 फीट तक का भी है। इसे किंग इसलिये कहा जाता है क्योंकि यह अपनी ही बिरादरी के दूसरे सांपों को, जो जाहिर है, इनसे ताकत में कमजोर होते हैं- उनको शिकार बना लेते हैं। जहर इतना भरा होता है कि हाथी जैसे बड़े जानवर को भी ये मार सकते हैं। वैसे आम तौर पर यह इंसानों से बचकर रहने वाला जीव है। यह घोंसला बनाकर अंडे देने वाली प्रजाति है। इसकी गुर्राहट भी डरावनी होती है। स्पीड के मामले में भी तेज होते होते हैं। 19 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकते हैं।

किंग कोबरा की यहां चर्चा इसलिये हो रही है क्योंकि हाल ही में फिर कोरबा में यह देखा गया। परसखेत फॉरेस्ट रेंज के छुईढोडा गांव में 14 जून को यह सांप देखने को मिला। इसकी लंबाई 11 फीट थी। वन विभाग और स्नैक कैचर्स की टीम ने बड़ी सावधानी से उसे काबू में किया और फिर जंगल में छोड़ दिया।

कोरबा में कुछ साल पहले एक अफवाह जमकर उड़ी थी। वह थी उडऩे वाले सांप की। इसे ग्लाइडिंग स्नैक कहते हैं। यहां एक बार 40 फीट लंबे सांप को देखने का दावा भी कई लोगों ने किया था। पर वैज्ञानिकों का नजरिया है कि 40 फीट लंबा सांप अब के आधुनिक युग में मिलना असंभव है। प्रागैतिहासिक काल में ऐसे सांप जरूर होते थे, बाकी लोककथाएं और किवंदतियों की उपज हैं। वैसे कोरबा में कई दुर्लभ प्रजातियों के सांप और भी हैं, जैसे रॉक पाइथन, यानि अजगर, रेट स्नैक, वुल्फ स्नैक, केल बैक, सैंड बोआ आदि। फिर बता दें कि कोरबा में सांपों की विविधता और प्रचुरता इसलिए हैं क्यों कि यह मध्य भारत के सबसे समृद्ध शुष्क व नम वनों के मिश्रण वाला इलाका है। अभी जो परसखेत रेंज में 11 फीट का किंग कोबरा मिला, वह सबसे बड़ा नहीं है। कोरबा में इससे पहले 12 फीट तक का किंग कोबरा देखा जा चुका है।

सांपों की एक और बस्ती जशपुर इलाके में है। इसे तो नागलोक नाम ही दे दिया गया है। यहां 70 अलग-अलग प्रजातियों के सांप देखे जा चुके हैं, जिनमें कुछ जहरीले भी हैं। यहां पर आदिवासी समुदाय पारंपरिक रूप से इन सांपों को श्रद्धा के साथ देखता है, इनके संरक्षण और सम्मान के हिमायती भी हैं। मगर, यहां हर साल बारिश से पहले स्नैक बाइट के मामले भी बढ़ जाते हैं। कोरबा में भी हाल ही में एक 11 साल की छात्रा के कान में सांप ने डस दिया, उसकी मौत हो गई। आने वाले बारिश को देखते हुए इनसे सतर्क रहना, सावधानी बरतना जरूरी है। इंसानों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व की भावना अपने भीतर बनाएं रखने के अलावा जागरूक भी होना चाहिए।


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