राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : ...समस्या खत्म जोखिम भत्ता खत्म
10-Jun-2026 6:17 PM
राजपथ-जनपथ : ...समस्या खत्म जोखिम भत्ता खत्म

...समस्या खत्म जोखिम भत्ता खत्म

छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का खात्मा बड़ा सुकून दे रहा है। अब प्रदेश के अधिकारी कर्मचारियों को बस्तर में रोटेशनल पोस्टिंग का सामना नहीं करना पड़ेगा न ही नेता अफसरों की बस्तर  ट्रांसफर की धमकी ही काम आएगी। इस दंश से छत्तीसगढ़ के कर्मचारी चार पांच दशकों से परेशान रहे। हालांकि कालांतर में इसे राष्ट्रीय समस्या मानकर केंद्र और राज्य सरकारों ने बस्तर पोस्टिंग में जोखिम भत्ता देना शुरू किया। अब यह यह भत्ता भी नहीं मिलेगा।

राज्य सरकार अभी नहीं तो अगले वित्त वर्ष से खत्म भी करने जा रही है। राज्य संवर्ग के अधिकारी कर्मचारियों को जोखिम भत्ता तो नहीं ट्राइबल एलाउंस के रूप में वेतन के साथ यह अतिरिक्त राशि दी जाती रही। एक कलेक्टर ने कहा कि सामान्य प्रशासन के अमले को यह कुछ सौ रूपए ही मिलते हैं वहीं पुलिस बल को कल्पना से अधिक ही दिया जाता है। यह  पद अनुसार मासिक वेतन का 18-30 फीसदी दिया जाता है। आईएएस आईएफएस ने भी नक्सल समस्या को नार्थ ईस्ट,और अन्य सीमावर्ती राज्यों की तरह बड़े जोखिम बताते हुए पुलिस की तरह भत्ता मांगा था। इसमें वृद्धि की मांग सिविल स्टाफ करते रह गया और समस्या ही खत्म हो गई। अब इस जोखिम भत्ते को खत्म किया जा सकता है।

उधर, आईएएस एसोसिएशन के राष्ट्रीय नेतृत्व ने 8 वें केंद्रीय वेतन आयोग को अपना  मांग पत्र प्रस्तुत किया हैं जो हार्ड स्टेशन पोस्टिंग में जोखिम भत्ता बढ़ाने की मांग की गई है। जो आयोग की केंद्रीय कर्मचारी परामर्शदात्री समिति के साथ होने वाली बैठक में भी उठने वाला है। आयोग इसे मंजूर करता है तो भी छत्तीसगढ़ के सिविल अफसरों को फायदा नहीं होगा।

हाथियों के साथ रहना सीखना ही होगा..

सरगुजा संभाग में बलरामपुर जिले के राजपुर परिक्षेत्र में एक दंपती को दल से बिछुड़े एक हाथी ने पटक-पटक कर मार डाला। इसके एक दिन पहले मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के गुरु घासीदास तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व में सडक़ निर्माण के काम में लगे दो मजदूरों पर हाथी टूट पड़े। उनको भी जान गंवानी पड़ी। इन दोनों घटनाओं के पीछे एक कारण यह था कि हाथियों की मौजूदगी के बारे में ग्रामीणों को मालूम नहीं था। वरना दंपती जंगल की ओर नहीं जाते और मजदूर भी सडक़ निर्माण का काम रोक देते। वन विभाग तकनीक का इस्तेमाल कर हाथियों के लोकेशन को पता करने तथा मोबाइल फोन, रेडियो और मुनादी के माध्यम से ग्रामीणों को सतर्क करने का दावा करता है। मगर, यहां हाथियों की असामयिक मौतों की भी खबर उनको खुद नहीं लगती, ग्रामीणों से सूचना मिलती है।

अब यह ताजा तस्वीर देखिये। मरवाही वन मंडल के, मरवाही में ही हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में हाथियों का एक झुंड 8 जून की रात टहलते हुए पहुंच गया। ग्रामीणों को इसकी कोई खबर नहीं थी। हलचल हुई तो लोगों का झुंड, जो हाथियों से भी बड़ा था, घर से बाहर निकल आए। कोई सेल्फी लेने लगा, कोई टार्च की रोशनी दिखाकर शोर मचाने लगा। वन अमला यहां नदारद था। यह वही मरवाही है, जहां कुछ साल पहले एक पुलिस अधीक्षक को हाथी ने तब दौड़ा दिया था, जब वे नजदीक जाकर उसकी तस्वीर लेने की कोशिश कर रहे थे। वह अफसर गंभीर रूप से घायल भी हुए थे। मरवाही में बीती रात हुई घटना में, जंगल के हाथियों के साथ लोग ऐसे खेल रहे थे, मानो वे किसी अजायबघर से बाहर निकल आए हैं। गनीमत हैं, हाथियों ने संयम रखा और पलटकर भीड़ को दौड़ाया नहीं।

छत्तीसगढ़ में हाथियों के प्राकृतिक आवास छिन्न-भिन्न होते जा रहे हैं और उनकी संख्या बढक़र, हाल के आंकड़ों के अनुसार 450 पहुंच चुकी हैं। मरवाही वन मंडल में पहुंचने वाले हाथी कोरबा जिले के पसान और लेमरू की ओर से आते हैं, जहां हसदेव अरण्य में बड़ी संख्या में पेड़ों को काटा गया है। यहां प्रस्तावित एलिफेंट कॉरिडोर अब तक अस्तित्व में नहीं आया है।

वन-टाईम प्रमोशन नीति हुई सार्थक

साल 2011 में नक्सल मोर्चे में तैनाती के लिए राज्य सरकार की वन-टाईम प्रमोशन नीति अब सार्थक  बनी है। इसी नीति से शौर्य पुरस्कार के हकदार बने छत्तीसगढ़ पुलिस महकमे के दो जांबाज अफसर रामेश्वर देशमुख और लक्ष्मण केंवट को उनकी नक्सल अभियान में अभुतपूर्व बहादुरी के एवज में केंद्र सरकार से मिली शौर्य पदक से राज्य पुलिस की छाती चौड़ी हो गई। दरअसल दोनों अफसर वन-टाईम प्रमोशन नीति का लाभ उठाकर लंबे समय से बस्तर में तैनात रहे हैं। वन-टाईम प्रमोशन नीति में सरकार ने नक्सली क्षेत्र में आरक्षक से सीधे सब- इंस्पेक्टर पदोन्नत कर 10 साल तक पदस्थापना की शर्त रखी थी। बताते हैं कि इस नीति में करीब 98 आरक्षकों को एक विभागीय परीक्षा के बाद चयन कर  कंधे में 2 स्टॉर लगाकर नक्सल इलाकों में भेजा गया। रामेश्वर देशमुख और लक्ष्मण केंवट के अलावा इस नीति के चलते कई जवान लंबे समय तक बस्तर के अलग-अलग नक्सल इलाकों में डटे रहे। सरकार ने यह नीति उस वक्त लागू की थी कि जब नक्सल क्षेत्रों में तैनाती के नाम से पुलिस अफसर घबराते थे। ऐसे में राज्य सरकार ने यह  नीति लागू कर नक्सलियों के सफाए अभियान को तेज गति दी। बताते हैं कि नक्सलियों से लोहा लेने के दौरान वन-टाईम प्रमोशन के 3 अफसरों को शहादत भी झेलनी पड़ी। नक्सल समस्या के खात्मे के बाद इस नीति के पुलिस अधिकारियों को शौर्य पदक से नवाजा गया है। इस उपलब्धि को पाकर छत्तीसगढ़ पुलिस को लगता है कि यह नीति सार्थक बनी।


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