राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : एक और रस्म निभाई साइकिल ने
03-Jun-2026 6:23 PM
राजपथ-जनपथ : एक और रस्म निभाई साइकिल ने

एक और रस्म निभाई साइकिल ने

विश्व साइकिल दिवस के मौके पर आज जगह-जगह साइकिल रैलियां निकाली गई। चूंकि कलेक्टर, एसपी और बड़े प्रशासनिक अधिकारी उनमें शामिल हुए, सडक़ें खाली रखी गईं और वाहनों को रैली के दौरान डायवर्ट किया गया। इसका मतलब यह है कि सडक़ों पर साइकिलों को तभी दौड़ाया जा सकता है, जब दूसरी गाडिय़ों का दबाव नहीं हों, वरना साइकिल चलाना खतरे से खाली नहीं है।

इस बार जब पश्चिम एशिया में युद्ध के हालात बनने के बाद पेट्रोल-डीजल का संकट आया तो गाडिय़ों का काफिला कम करने के अलावा साइकिल पर चलने का संदेश दिया गया। नेताओं और अफसरों ने कम से कम एक दिन साइकिल से दफ्तर जाकर इस रस्म को पूरा किया, तस्वीरें खिंचाई और पेट्रोल-डीजल बचाने का संदेश दिया। मगर, उसके बाद लोगों ने देखा कि फिर गाडिय़ों का काफिला निकल पड़ा है। ऐसे में याद आती है स्मार्ट सिटी मिशन के तहत पब्लिक बाइसिकल शेयरिंग योजना। छत्तीसगढ़ में तीन शहरों बिलासपुर, रायपुर और नवा रायपुर को स्मार्ट सिटी के अंतर्गत लिया गया था। बिलासपुर में इस योजना पर 68 लाख रुपये खर्च किए गए। रायपुर में इससे अधिक। योजना का उद्देश्य यह बताया गया था कि शहरों में ट्रैफिक कम किया जा सकेगा, प्रदूषण कम होगा, आटो-रिक्शा, बस या टैक्सी का किराया बचेगा। रायपुर और बिलासपुर में जितनी तेजी से यह योजना लाई गई। तेजी साइकिल रखने के स्थल के निर्माण में और साइकिलों की खरीदी में थी- उतनी ही तेजी से यह धूल खाने लगी। कोई रखरखाव नहीं हुआ, उपयोग करने वाले भी नहीं मिले। स्मार्ट सिटी योजना ज्यादातर शहरों में अपने लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाई है। इनमें साइकिल वाली योजना तो स्मारक की तरह हो गई। दो चार मुख्य सडक़ों को छोड़ दें तो बाकी की हालत खराब है। कार, आटो रिक्शा में इन गड्ढों से मिलने वाले हिचकोलों को तो बर्दाश्त किया जा सकता है पर साइकिल चलाते वक्त ऐसा मुश्किल है। शहर के प्रमुख स्थानों, जैसे जय स्तंभ या नेहरू चौक से स्टेशन को जोडऩे वाली सडक़ में साइकिल चलाना जोखिम भरा काम है। लोगों से बात करने पर मालूम होता है कि साइकिल के लिए सडक़ों पर कोई ट्रैक ही नहीं। जहां बने हैं, वहां गाडिय़ां या ठेले पार्क किए गए हैं। जिन साइकिलों को बीच चौराहे पर सजाकर रख दिया गया, उसके पार्ट्स गायब हो गए। धूप-पानी में धूल में वे खराब होते गए-उनकी सुरक्षा के लिए किसी को तैनात नहीं किया गया। स्मार्ट सिटी के अफसरों की दिलचस्पी केवल योजनाओं पर खर्च करने में दिखी, लेकिन रखरखाव पर नहीं, जमीन पर योजना लागू हों, इसके प्रयास नहीं किए गए। प्रधानमंत्री की अपील के बाद अफसरों ने एक दो दिन दफ्तर जाने के लिए साइकिलों का इस्तेमाल किया लेकिन स्मार्ट सिटी की साइकिलों को चलन में लाने के लिए उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। इसे गरीबों की गाड़ी मानने की मानसिकता को बदलने में उनकी भूमिका हो सकती थी, जन प्रतिनिधियों की भी हो सकती थी। तो, फिलहाल दोनों जगह रायपुर और बिलासपुर में ये योजनाएं बंद हो चुकी हैं। लोग शहर और आसपास के इलाकों में आने-जाने के लिए सस्ते विकल्प की तलाश कर रहे हैं, मगर सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की गति भी धीमी है। लंबे समय से इलेक्ट्रिक सिटी बसों की योजना की बात हो रही है पर वह जमीन पर नहीं उतर पाई है। वैसे देश के कुछ शहरों में साइकिल की ये योजनाएं संतोषजनक तरीके से काम कर रही हैं। भोपाल में करीब 500 साइकिलों का रोजाना उपयोग हो रहा है। इसके लिए ट्रैक सिटी बस के रास्ते के बगल में बनाए गए हैं। मैसूर ऐसा शहर है जहां सबसे पहले पब्लिक बाइसिकल शेयरिंग का अच्छा परिणाम देखने को मिला। पुणे के कुछ इलाकों में यह योजना ठीक तरह से काम कर रही है। चंडीगढ़, सूरत, रांची में भी कुछ हद तक सफलता मिली है। इनमें से ज्यादातर स्मार्ट सिटी ही हैं।  नीदरलैंड का एम्स्टर्डम, चीन के शहर शंघाई और बीजिंग, फ्रांस की राजधानी पेरिस, अमेरिका के न्यूयॉर्क और यूके के लंदन में बहुत सालों से साइकिल के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत हैं और कामयाब हैं। साइकिल चालकों के लिए डेडिकेटेड लेन है। साइकिल ट्रैक व साइकिलों का अच्छा रखरखाव है और वे अतिक्रमण मुक्त हैं। भारी वाहनों को साइकिल वालों के लिए रास्ता छोडऩा पड़ता है। इनमें से कई देश ऐसे हैं जहां पेट्रोल डीजल का संकट भी नहीं है।

छोटे चुनाव को लेकर हलचल तेज

नगरीय निकाय और पंचायत उपचुनाव के नतीजे गुरुवार को घोषित किए जाएंगे। पंचायतों में मतगणना पूरी हो चुकी है और चुनाव परिणामों का औपचारिक ऐलान निकायों के नतीजों के साथ किया जाएगा। दुर्ग जिले के पाटन में जनपद सदस्य की रिक्त सीट के लिए हुई मतगणना में भाजपा को झटका लगने के संकेत मिले हैं।

प्रदेश में जनपद सदस्य के 10 रिक्त पदों के लिए चुनाव हुए थे। मतदान के तुरंत बाद पंचायतों में मतगणना शुरू हो गई थी और देर रात तक गिनती पूरी कर ली गई। हालांकि अधिकृत नतीजे गुरुवार को घोषित किए जाएंगे। जनपद सदस्य के चुनावों में पड़ोसी दुर्ग जिले के पाटन की एक सीट को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता रही। चुनाव भले ही दलीय आधार पर नहीं हुआ, लेकिन कांग्रेस और भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी थी। यहां कांग्रेस की उर्वशी साहू, भाजपा समर्थित सुरेन्द्र साहू और छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के भूपेंद्र साहू मैदान में थे। भाजपा समर्थित प्रत्याशी के प्रचार में सरकार के मंत्री गुरु खुशवंत साहेब और जिले के कई बड़े पदाधिकारी सक्रिय थे। इसके बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी उर्वशी साहू ने एक हजार से अधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज की है। छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के भूपेंद्र साहू दूसरे स्थान पर रहे। हालांकि उर्वशी के पति शैलेश साहू जनपद सदस्य थे। उनके निधन के रिक्त सीट पर चुनाव हुए, और कहा जा रहा कि पत्नी उर्वशी के पक्ष में सहानुभूति का माहौल था। अन्य जनपदों में मिले-जुले नतीजे सामने आए हैं।

अब निगाहें नगरीय निकाय अध्यक्ष पदों के नतीजों पर टिकी हुई हैं। इस छोटे चुनाव के नतीजों के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो सकती है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।

निलंबित सीईओ के तेवर

दुर्ग जिले में पिछले दिनों जनसमस्या निवारण शिविर में विधायक ललित चंद्राकर की मौजूदगी में भाजपा मंडल अध्यक्ष के साथ दुर्व्यवहार पर जनपद सीईओ रूपेश पांडेय को निलंबित कर दिया गया। पांडेय के तेवर काफी चर्चा में रहे। उनके खिलाफ विभागीय जांच की तैयारी चल रही है।

यह बात उभरकर सामने आई कि जनपद सीईओ रूपेश पांडेय ने आज तक पदोन्नति नहीं ली है, जबकि उनके बैचमेट पंचायत विभाग में ज्वाइंट कमिश्नर तक पहुंच चुके हैं। निलंबन के बाद पांडेय ने पूर्व सीएम भूपेश बघेल से पूर्व विधायक अरुण वोरा के निवास पर मुलाकात की।

भूपेश, पूर्व विधायक अरुण वोरा की माता से मिलने उनके निवास गए थे।

निलंबित जनपद सीईओ ने पूर्व सीएम से कुछ देर चर्चा भी की। इसका वीडियो भी वायरल हुआ है। जनपद सीईओ पांडेय निलंबन को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। सरकार उन पर कड़ी कार्रवाई कर सकती है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।


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