राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : संदीप पाठक पर भाजपा की खामोशी
07-Jun-2026 5:39 PM
राजपथ-जनपथ : संदीप पाठक पर भाजपा की खामोशी

संदीप पाठक पर भाजपा की खामोशी

आम आदमी पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल हुए राज्यसभा सदस्य डॉ. संदीप पाठक को लेकर छत्तीसगढ़ भाजपा में अब तक सन्नाटा है। मुंगेली जिले के मूल निवासी डॉ. पाठक को भाजपा में आए दो माह से अधिक समय हो चुका है, लेकिन प्रदेश संगठन की ओर से कोई विशेष प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। अपवाद के रूप में भाजपा के पूर्व पदाधिकारी नरेश चंद्र गुप्ता ने सोशल मीडिया पर उनका स्वागत किया था।

दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के प्रभारी रहे डॉ. पाठक के भाजपा में जाने के बाद भी आप का कोई बड़ा नेता भाजपा में नहीं आया। उलटे, उनके फैसले का पार्टी कार्यकर्ताओं ने विरोध किया था। ऐसे में डॉ. पाठक की राजनीतिक राह आसान नहीं दिख रही है। पंजाब में उनके खिलाफ एक मामले में एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है।

हालांकि भाजपा पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है और बूथ प्रबंधन तथा संगठन विस्तार में डॉ. पाठक के अनुभव का उपयोग कर सकती है। आम आदमी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को खड़ा करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि भाजपा उन्हें पंजाब की राजनीति में कितनी और कैसी जिम्मेदारी देती है।

हारी हुई सीटों पर भाजपा का फोकस

प्रदेश भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए हारी हुई सीटों पर विशेष रणनीति बनानी शुरू कर दी है। पार्टी ने चुपचाप 36 निगम-मंडलों के पदाधिकारियों को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों का प्रभार सौंपा है। उन्हें हर महीने कम से कम पांच दिन अपने प्रभार वाले क्षेत्र में बिताने, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं से संवाद करने और स्थानीय मुद्दों का फीडबैक जुटाने के निर्देश दिए गए हैं।

तीन महीने बाद इन प्रभारियों को रिपोर्ट कार्ड भी देना होगा। पार्टी रणनीतिकार विशेष रूप से बालोद जिले की बालोद, डौंडीलोहारा और गुंडरदेही सीटों को लेकर चिंतित बताए जाते हैं। इन क्षेत्रों में लोकसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहता है, लेकिन पिछले तीन विधानसभा चुनावों में पार्टी को लगातार हार का सामना करना पड़ा है।

इसी तरह अविभाजित जांजगीर-चांपा जिले की विधानसभा सीटें भी भाजपा के लिए चुनौती बनी हुई हैं। लोकसभा क्षेत्र में प्रभाव होने के बावजूद विधानसभा स्तर पर कांग्रेस की पकड़ मजबूत है। इसके अलावा खरसिया, कोटा और कोंटा जैसी सीटें ऐसी हैं, जहां राज्य गठन के बाद से भाजपा जीत दर्ज नहीं कर पाई है।

पार्टी अब इन क्षेत्रों में संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ाने, सामाजिक सम्मेलनों के आयोजन और सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के जरिए माहौल बनाने की तैयारी कर रही है। साथ ही संभावित उम्मीदवारों को पहले से जिम्मेदारियां देकर उन्हें क्षेत्र में सक्रिय करने की रणनीति भी अपनाई जा रही है। अब देखना यह है कि भाजपा की यह कवायद चुनावी नतीजों में कितना असर दिखा पाती है।

छत्तीसगढ़ के सिंचाई मॉडल की तारीफ

छत्तीसगढ़ ने सिंचाई और जल प्रबंधन के क्षेत्र में ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसकी अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने राज्य में लागू आधुनिक जल प्रबंधन प्रणाली की सराहना करते हुए देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसका अध्ययन करने तथा स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपनाने की सलाह दी है।

यह उपलब्धि एम-सीएडीडब्ल्यूएम- (कमांड क्षेत्र विकास और जल प्रबंधन का आधुनिकीकरण) मॉडल के कारण मिली है। यह प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की एक उप-योजना है।

वैसे तो केंद्र सरकार को यदि लगता है कि राज्य सरकार उसकी योजना का अच्छी तरह क्रियान्वयन कर रही है तो उसकी प्रशंसा तो होती ही है, पर इस मामले में केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय ने दूसरे राज्यों को भी छत्तीसगढ़ के प्रयासों को अमल में लाने की सलाह दी है। इसलिये प्रशंसा का महत्व बढ़ जाता है। सरल भाषा में समझें तो यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें नहरों या अन्य जल स्रोतों से पानी को खुले रास्तों के बजाय भूमिगत पाइपलाइन के जरिये सीधे खेतों तक पहुंचाया जाता है। इससे रास्ते में होने वाला रिसाव और वाष्पीकरण कम होता है, जिससे पानी की बचत होती है।

जशपुर जिले के बगिया में इस परियोजना का मॉडल देखने को मिल जाता है। पिछले महीने मई माह में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 119 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना का उद्घाटन किया था। इस योजना के तहत 13 गांवों के करीब 5000 हेक्टेयर खेत में भूमिगत पाइप लाइनों के माध्यम से जल आपूर्ति की जा रही है। भूमिगत पाइप लाइन का संचालन सौर ऊर्जा से उत्पन्न होने वाली बिजली से किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने ऐसी परियोजनाओं के लिए फिलहाल 1600 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है।

यह प्रश्न उठता है कि सिंचाई के पारंपरिक तरीके और इसमें क्या फर्क है? पारंपरिक तौर पर खुली नहरों और खेत की मेड़ों के किनारे नालियां तैयार कर खेतों में पान पहुंचाया जाता है। अब एम-सीएडीडब्ल्यूएम मॉडल के जरिये भूमिगत पाइपलाइन के जरिये सीधे खेतों में पानी पहुंचेगा। इससे पानी का रिसाव बहुत कम होगा, वाष्पीकरण और नहरों की टूट-फूट से पानी के व्यर्थ बहने की समस्या हल हो जाएगी। पारंपरिक तकनीक में बांधों से छोड़े गए पानी का केवल 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा ही खेतों में पहुंच पाता था, नई तकनीक से 75 प्रतिशत उससे अधिक पानी का उपयोग हो सकेगा। पारंपरिक तकनीक में होता यह है कि एक खेत में पानी की जरूरत पूरी हो जाने के बावजूद अगले खेतों के लिए पानी की आपूर्ति की जाती है। नए मॉडल में जिस खेत को पानी मिल चुका है, या जरूरत नहीं है- वहां आपूर्ति बंद कर आगे के खेतों तक सीधे पानी पहुंचाया जा सकता है। किसी कमांड एरिया में पानी पर्याप्त पहुंच चुका है या नहीं, इसका पता करने की तकनीक अभी तक मैनुअल है। मगर नए मॉडल में सेंसर आधारित निगरानी होगी, यानि पर्याप्त सिंचाई हो जाने के बाद पानी की आपूर्ति रुक जाएगी। नए मॉडल में ड्रिप और स्प्रिंकलर  से जुडऩे की तकनीक भी है। अभी यह सुविधा सिर्फ निजी मोटर पंप लगाने वाले किसानों को मिल पाती है। योजना का उद्देश्य है पानी की हर बूंद में अधिकाधिक फसल का उत्पादन।

वर्षा की अनिश्चितता से घिरे कृषि पर निर्भर छत्तीसगढ़ में यह तकनीक कारगर तो है लेकिन अभी यह बिल्कुल प्रारंभिक अवस्था में है। मॉडल प्रोजेक्ट की सफलता को देखकर केंद्र सरकार ने अन्य राज्यों से भी यह तकनीक अपनाने की सलाह दी है। इस प्रोजेक्ट का बजट भी कम नहीं है। बगिया के प्रोजेक्ट की ही लागत 119 करोड़ रुपये है।


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