राजपथ - जनपथ
अरण्य में फेरबदल के बाद की चर्चाएं
वन मुख्यालय अरण्य में सीनियर आईएफएस अधिकारियों के प्रभार बदले गए हैं। 1994 बैच के आईएफएस अधिकारी अरुण पाण्डेय के वनबल प्रमुख बनने के बाद उनकी जगह 1995 बैच के अधिकारी ओपी यादव को वन्य प्राणी का प्रभार दिया गया है। यादव अभी पीसीसीएफ के प्रभार पर हैं और उनकी पदस्थापना वन बल प्रमुख के बाद दूसरे नंबर के पीसीसीएफ (वन्य प्राणी) पद पर की गई है। जबकि उनसे वरिष्ठ 1992 बैच के आईएफएस अधिकारी कौशलेन्द्र कुमार मुख्यालय में पीसीसीएफ (कार्य आयोजना) के पद पर हैं। वे नंबर एक और दो की स्थिति तक नहीं पहुंच सके।
कौशलेन्द्र कुमार के मामले में पहले भी वरिष्ठता को नजरअंदाज किए जाने की चर्चा रही है। कुछ समय पहले सेवानिवृत्त हुए वी. श्रीनिवास राव को पांच सीनियर पीसीसीएफ को पीछे छोडक़र पीसीसीएफ बनाया गया था। हालांकि वन मुख्यालय में एक और बड़ा फेरबदल होना बाकी है। दो पीसीसीएफ अनिल साहू और प्रेम कुमार क्रमश: जुलाई और अगस्त में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। साहू लघुवनोपज संघ के प्रबंध संचालक हैं, जबकि प्रेम कुमार वन विकास निगम के प्रबंध संचालक पद पर हैं।
चर्चा है कि दोनों पदों पर महिला अधिकारियों की पदस्थापना हो सकती है। अनुमान लगाया जा रहा है कि शालिनी रैना को वन विकास निगम और संजीता गुप्ता को लघुवनोपज संघ का प्रबंध संचालक बनाया जा सकता है। शालिनी वर्तमान में कैंपा का प्रभार संभाल रही हैं। इसी तरह एपीसीसीएफ और सीसीएफ स्तर के अधिकारियों के प्रभार भी बदले जा सकते हैं।
नए जिले में ताला तोड़ कब्जे की नौबत
लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए पुलिस अक्सर नसीहत देती है कि कानून अपने हाथ में मत लीजिए। पुलिस को इस नसीहत पर क्या खुद भी ध्यान नहीं देना चाहिए? मगर नवगठित सक्ती जिले में हाल ही में हुए एक वाकये ने पुलिस अफसरों के बीच जवाबदेही के टकराव का मामला सामने आ गया है। मगर, इससे भी अधिक, इस घटना ने नए जिलों में तैनात अधिकारियों- कर्मचारियों की समस्या पर भी ध्यान खींचा है।
कुछ समय पहले सक्ती में एडिशनल एसपी के तौर पर हरीश यादव तैनात थे। बीते जनवरी माह में उनका तबादला बेमेतरा जिले में हो गया। एक बिल्कुल नए जिले से, कुछ पुराने वाले नए जिले में। बेमेतरा पहुंचे तो उन्हें रहने का ठीक ठौर-ठिकाना नहीं मिला। बेमेतरा में सशरीर ड्यूटी पर तो हाजिर हो गए, लेकिन अपनी गृहस्थी का सामान नहीं ले जा पाए। सक्ती वाले दफ्तर के एक कमरे में ही समेटकर सारा सामान रख दिया। दो चार महीने बीते, अब जून आ गया। 6 महीने बाद भी जब कमरा खाली नहीं हुआ तो पुलिस वालों ने ताला तोड़ दिया और सारा सामान एक ट्रक में लाद दिया, जिसने उसे बेमेतरा छोड़ दिया। इस एकतरफा कार्रवाई से यादव बुरी तरह नाराज हो गए हैं। उनका लदा हुआ सामान बेमेतरा पुलिस लाइन में ही खड़ा है। यादव की शिकायत है कि बिना उनकी मंजूरी के निजी सामान से भरे उनके कमरे का ताला क्यों तोड़ा गया? सक्ती पुलिस से पुलिसिया भाषा में ही उन्होंने पूछा है कि क्या ताला तोडऩे की किसी से इजाजत ली गई थी? क्या सामान निकालते समय उसका पंचनामा कराया गया? कोई सामान गायब हो गया हो तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? यादव ने जिम्मेदार पुलिस वालों पर कार्रवाई नहीं होने पर अदालत जाने की चेतावनी भी दे दी है। एसपी के बाद किसी जिले में एडिशनल एसपी दूसरे नंबर के बड़े अफसर होते हैं। तबादला हुआ तो क्या हुआ, छत्तीसगढ़ पुलिस में तैनात तो हैं ही। इसलिये निचले स्तर पर पुलिस वालों ने यह ताला तोडक़र सामान डिस्पैच करने का फैसला लिया हो, ऐसा नहीं माना जा सकता। सक्ती पुलिस अधीक्षक प्रफुल्ल ठाकुर का एक व्यावहारिक बयान आया है। उनका कहना है कि नया जिला होने के कारण यहां संसाधनों और जगह की कमी है। कोई कमरा छह महीने तक बंद रहेगा तो काम कैसे चलेगा? सरकारी दफ्तर कोई निजी गोदाम तो है नहीं।
यह अनुमान ही लगाया जा सकता है कि कमरा खाली करने के लिए एएसपी को दो चार बार कहा गया होगा। हल नहीं निकलने पर यह नौबत आई। सामान हटाते समय कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं, कोई सामान तो गायब नहीं हो गया- ये सब मुद्दे देर-सबेर सुलझ जाने की उम्मीद है।
मगर, इस घटना ने एक दूसरी महत्वपूर्ण समस्या की तरफ ध्यान खींचा है। वह है, नए जिलों में इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव। छत्तीसगढ़ जब अलग राज्य बना तो यहां 18 जिले थे, अब दुगने से कुछ कम 33 जिले हैं। प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और राजनीतिक समर्थन के उद्देश्य से भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सरकारों ने उदारता के साथ नए जिले स्थापित किए। पर बुनियादी ढांचा उस गति से खड़ा नहीं किया गया। सन् 2018 से 2023 के बीच कांग्रेस शासनकाल में सर्वाधिक 6 नए जिले बनाए गए। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी, सारंगढ़-बिलाईगढ़, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर और साथ ही जिला सक्ती, जिसकी बात हो रही है।
इनमें से गौरैला-पेंड्रा-मरवाही सन् फरवरी 2020 में अस्तित्व में आया, बाकी सितंबर 2022 में बने। इन सभी जिलों के प्रमुख कार्यालयों के लिए खुद के भवनों का अभाव है। कलेक्टर, एसपी कार्यालय, जिला कोर्ट, जिला पंचायत के सुविधायुक्त प्रशासनिक भवन तैयार नहीं हुए हैं। अधिकांश जिला कार्यालय पुरानी तहसीलों, जनपद पंचायत भवनों यहां तक कि कॉलेजों के खाली कमरों में संचालित किए जा रहे हैं। एक जगह कोई कम्पोजिट बिल्डिंग होने का सवाल ही नहीं है। आम जनता एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर जाने के लिए कई-कई किलोमीटर चक्कर लगा रही है।
दूसरे कई विभाग जैसे शिक्षा, कृषि, पीडब्ल्यूडी के अधिकारी या तो पुराने जिलों के ही बैठ रहे हैं या फिर उनको नए जिलों में किसी कोने में कोई कमरा दे दिया गया है। भारतीय और राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों के लिए जैसे-तैसे कुछ सरकारी क्वार्टर्स या बंगलों का इंतजाम तो कर लिया गया है पर क्लास 1, 2 अफसर और कर्मचारी रोजाना 40 से 80 किलोमीटर तक अप डाउन कर रहे हैं।
कई जिलों में सडक़ों की हालत जर्जर हैं। नया जिला बन जाने के बाद भी मोहला-मानपुर या मनेंद्रगढ़-चिरमिरी पहुंचना दूर के ग्रामीणों के लिए अब भी काफी मुश्किल है। सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का भी हाल बुरा ही है। जिला मुख्यालय पहुंचने में ग्रामीणों को काफी समय और रुपये खर्च करने पड़ते हैं। जिला अस्पताल, कई जिलों में खुल तो गए हैं पर हालत किसी पीएचसी से बेहतर नहीं है। डिजिटल गवर्नेंस की बात होती है, पर इन नए जिलों में कनेक्टिविटी की समस्या आम है। ऐसी और भी समस्याएं गिनाई जा सकती हैं। नए जिलों के गठन से जनता की कलेक्टर, एसपी से दूरी तो कम हुई है- पर जब तक बुनियादी ढांचे को दुरुस्त नहीं किया जाएगा, प्रशासनिक व्यवस्था पटरी पर नहीं आने वाली।
निगम चुनाव की आहट
नगरीय निकाय उपचुनाव के बाद अब भिलाई, भिलाई-चरौदा और बीरगांव नगर निगम चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। ये चुनाव नवंबर-दिसंबर में संभावित हैं। तीनों नगर निगमों के साथ ही जामुल नगर पालिका में भी चुनाव होंगे। चारों निकायों का कार्यकाल नवंबर में समाप्त हो रहा है।
नगरीय निकाय उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर रही। यद्यपि कांग्रेस थोड़ी पीछे रह गई, लेकिन उसका प्रदर्शन बढिय़ा रहा। मगर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की राह आसान नहीं होगी। वजह यह है कि चारों निकायों में कांग्रेस का कब्जा है। ऐसे में सभी स्थानों पर अपना वर्चस्व बरकरार रखने की चुनौती रहेगी। ये चुनाव दोनों दलों के लिए लिटमस टेस्ट माने जा रहे हैं।
भिलाई और भिलाई-चरौदा नगर निगम में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और भिलाई विधायक देवेन्द्र यादव की प्रतिष्ठा दांव पर रहेगी। भूपेश का निवास क्षेत्र भिलाई-चरौदा नगर निगम में आता है, जबकि देवेन्द्र भिलाई के विधायक हैं। भाजपा ने अभी से चारों निकायों के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी है। स्थानीय संगठन को बैठकें लेने के निर्देश दिए गए हैं। कांग्रेस भी पूरी नजर बनाए हुए है। आने वाले दिनों में चुनाव के चलते चारों निकायों में राजनीतिक गतिविधियां तेज रहने की संभावना है।


