राजपथ - जनपथ
एसपीजी को चाहिए आईपीएस
स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) में ऑफिसर्स की कमी हो गई है। वैसे यह कमी, हर केंद्रीय गोपनीय सुरक्षा एजेंसी में बनी हुई है। हम यह इसलिए कह रहे हैं कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को अपने अपने यहां के इच्छुक आईपीएस अफसरों को एसपीजी में डेपुटेशन पर भेजने आधिकारिक पत्र लिखा है। इस सर्वोच्च हाई प्रोफाइल सुरक्षा बल ने जूनियर खासकर एसपी, डीआईजी स्तर के अफसरों की मांग की गई है। एसपीजी में इनके तय पद पूरी तरह नहीं भर पा रहे हैं।
मुख्य सचिवों से कहा गया है कि इस मैसेज को ज्यादा से ज्यादा आईपीएस अफसरों तक पहुंचाया जाए। प्रतिनियुक्ति के लिए योग्य एवं इच्छुक आईपीएस डीआईजी की फाइल तुरंत प्रभाव से गृह मंत्रालय को प्रेषित करें। दो सप्ताह पहले यह मैसेज भेजा गया था। इसमें कहा गया है कि बतौर डीआईजी के पद पर आने वाले अधिकारियों के लिए 14 साल की सेवा अनिवार्य है। ऐसे इच्छुक आईपीएस अधिकारियों का प्रतिनियुक्ति आवेदन, तीस दिन के अंदर गृह मंत्रालय को भेजा जाए। इसके साथ उनके विजिलेंस स्टेटस के बारे में भी सूचित किया जाए। कुछ वर्ष पूर्व इस एजेंसी में प्रतिनियुक्ति से लौटे एक आईपीएस अफसर ने कहा कि जूनियर पोस्ट पर बड़ी किल्लत है। इस वजह से प्रधानमंत्री के एक साथ दो से तीन देशों या देश के भीतर भी 3-4 अलग अलग राज्यों के दौरे होने पर एडवांस पार्टी की तैनाती में कमी से जूझना पड़ता है। इस विशेष सुरक्षा दस्ते को अभी और लोगों की जरूरत है। देश में एसपीजी की सुरक्षा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत को ही दी गई है।
बहरहाल गृह मंत्रालय के इस पत्र के बाद राज्य के युवा आईपीएस अफसरों के लिए इस हाई प्रोफाइल डेपुटेशन पर जाने के रास्ते खुल गए हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ से, केंद्र में डेपुटेशन कोटे से कम ही आईपीएस अफसर गए हैं या अनुमति दी गई है। राज्य के 142 आईपीएस अधिकारियों के कैडर में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए कोटा 31 अफसरों का है। जनवरी 26 की डेट में 8 ही डेपुटेशन पर गए हैं। उसके बाद के इन 4 महीने में तीन और अफसर गए हैं। अभी 19 और जा सकते हैं। यहां बता दें कि इस प्रतिष्ठित फोर्स में पूर्व में छत्तीसगढ़ से एडीजी विवेकानंद, एसपी अमित कांबले पदस्थ रहे चुके हैं।
सोता रहा सिस्टम, शिक्षकों पर रिकवरी का संकट
छत्तीसगढ़ के पंचायत संवर्ग से शिक्षा विभाग में संविलियित सहायक शिक्षकों के सामने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 5 मई के आदेश के बाद गंभीर संकट खड़ा हो गया है। वे मानसिक पीड़ा से गुजर ही रहे हैं, साथ ही उनकी भविष्य की आर्थिक योजनाएं भी खतरे में पड़ गई हैं।
दरअसल, हाईकोर्ट ने पंचायत नियमों के तहत नियुक्त सहायक शिक्षकों (जिन्हें पहले शिक्षा कर्मी कहा जाता था) को स्कूल शिक्षा विभाग के नियमित शिक्षकों की श्रेणी में मानने से इंकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उन्हें नियमित शिक्षकों की तरह 10 वर्ष की सेवा पर क्रमोन्नत वेतनमान या समान वेतन पाने का अधिकार नहीं है।
इस आदेश के तुरंत बाद शिक्षा विभाग और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने सभी जिलों के कलेक्टरों, जिला शिक्षा अधिकारियों तथा जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को पत्र भेजकर तुरंत समीक्षा करने और अधिक वेतन प्राप्त कर चुके शिक्षकों के चिह्नांकन की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि यह है कि छत्तीसगढ़ में सहायक शिक्षक (पंचायत) संवर्ग के 82,066 स्वीकृत पदों में से 77,628 पद भरे हुए हैं। वर्ष 1998-2008 के आसपास नियुक्त और 2011-2015 के दौरान 10 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले कई शिक्षकों को शासन के आदेश क्रमांक 411 (22/2011) के तहत अस्थायी रूप से क्रमोन्नत वेतनमान स्वीकृत किया गया था। यह लाभ केवल 1 नवंबर 2011 से 30 अप्रैल 2013 तक प्रभावी था, लेकिन इसके बाद भी क्रमोन्नत वेतनमान का भुगतान जारी रहा। 2015 से 2021 तक इन शिक्षकों को अतिरिक्त वेतन और एरियर मिला।
हाईकोर्ट ने 1,188 शिक्षकों की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने मांग की थी कि उनकी पंचायत संवर्ग में दी गई सेवा को भी वरिष्ठता और क्रमोन्नति के लिए गिना जाए। अदालत ने राज्य सरकार की दलील मानी कि 1 जुलाई 2018 को संविलियन के बाद से ही उनकी सेवा अवधि की गणना होगी।
दरअसल, अस्थायी आदेश के आधार पर पहले से क्रमोन्नत वेतनमान दिया जाता रहा और 30 अप्रैल 2013 के बाद भी इसे जारी रखा गया। अब यह पूरा लाभ वसूली के दायरे में आ गया है। राज्य स्तर पर हजारों शिक्षक इस प्रक्रिया में फंस सकते हैं और प्रत्येक से 8 लाख से 20 लाख रुपये तक की वसूली की जा सकती है। विभिन्न जिलों में शिक्षा अधिकारी दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं और जल्द ही संबंधित शिक्षकों को नोटिस जारी कर वसूली प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए सरकारी खजाने से गलत तरीके से हुई निकासी को वापस लेना जरूरी है, लेकिन इन शिक्षकों का क्या होगा? वे 15-20 लाख रुपये तक की बड़ी रकम एक साथ कैसे लौटा पाएंगे? क्या उनके वेतन से कटौती शुरू कर दी जाएगी? इन्होंने उसी वेतन के आधार पर बच्चों की पढ़ाई, परिवार का पालन-पोषण, इलाज और अन्य जिम्मेदारियों की योजना बनाई थी। अब रिकवरी के भय से कई शिक्षक मानसिक दबाव में हैं। कई सेवानिवृत्ति के करीब हैं और कुछ पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
फिर भी एक उम्मीद बाकी है-रिकवरी के खिलाफ हाईकोर्ट जाना। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में साफ कहा गया है कि यदि कर्मचारी से कोई छल-कपट नहीं हुआ है और विभाग की गलती से अधिक भुगतान हुआ है, तो उससे रिकवरी नहीं की जा सकती। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी हाल के कई मामलों में इसी आलोक में फैसले दिए हैं। यहां तक कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों की गई वसूली को वापस खाते में डालने के भी आदेश दिए हैं।
जिन शिक्षकों को अधिक वेतन दिया गया, उन्हें नोटिस जारी करना आसान है, लेकिन क्या उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी जिन्होंने वर्षों तक करोड़ों रुपये का अतिरिक्त भुगतान होने दिया और इसे वे रोकने में विफल रहे? उनसे ही वसूली क्यों नहीं की जानी चाहिए?
भाजपा की ‘बस पॉलिटिक्स’..
देशभर में ईंधन बचाने को लेकर चल रहे अभियान का असर अब भाजपा के तौर-तरीकों में भी दिखने लगा है। वीवीआईपी कारकेड में कटौती के बाद राज्यों में मुख्यमंत्री और मंत्री भी सीमित वाहनों के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं। भाजपा संगठन ने भी अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पेट्रोल-डीजल बचत के लिए व्यावहारिक संदेश देने की हिदायत दी है।
इसी कड़ी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रायपुर दौरे के दौरान भाजपा नेताओं ने अलग-अलग गाडिय़ों के बजाय सामूहिक रूप से बस से एयरपोर्ट पहुंचकर एक संदेश देने की कोशिश की। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, सांसद बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, महापौर मीनल चौबे और राज्यसभा सदस्य लक्ष्मी वर्मा समेत कई नेता एक साथ बस से एयरपोर्ट पहुंचे।
वित्त मंत्री ओपी चौधरी को भी बस से जाना था, लेकिन रायगढ़ से लौटने में देरी होने के कारण वे सीधे एयरपोर्ट पहुंचे। भाजपा कार्यसमिति की बैठक में भी कई नेताओं को ई-रिक्शा से कुशाभाऊ ठाकरे परिसर पहुंचते देखा गया।
बताते हैं कि भाजपा में अब प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे शीर्ष नेताओं के स्वागत में अलग-अलग वाहनों की बजाय सामूहिक परिवहन को प्राथमिकता देने का फैसला किया गया है। कांग्रेस भले ही इसे 'नौटंकी' बता रही हो, लेकिन बढ़ती ईंधन खपत और पेट्रोल-डीजल की कीमतों के बीच इसे सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
एक ही जाति, फिर भी सादगी
सामान्यत: कोर्ट मैरिज को अंतरजातीय होने या किसी पारिवारिक विरोध से जोड़ दिया जाता है। लेकिन सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के रायकोना गांव के इस विवाह ने यह धारणा तोड़ दी। यह विवाह इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह यह है कि यह शादी किसी मजबूरी या सामाजिक विरोध के कारण नहीं, बल्कि पूरी सहमति, समझदारी और सादगी के संकल्प के साथ हुई। रघुनाथ साहू और योगेश्वरी साहू, जो एक ही समाज और आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों से आते हैं, उन्होंने पारंपरिक धूमधाम, बारात, डीजे और लाखों रुपये के खर्च से दूरी बनाते हुए कलेक्ट्रेट में विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह किया।
शादियां सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बनती जा रही हैं। कई परिवार कर्ज तक लेने को मजबूर हो जाते हैं, ऐसे समय में इस विवाह को समाज को नई दिशा देने वाला उदाहरण माना जा सकता है। कोर्ट मैरिज के फैसले को दोनों परिवारों ने न केवल स्वीकार किया, बल्कि खुशी के साथ विवाह समारोह में शामिल होकर नवदंपती को आशीर्वाद दिया।


