राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : नया हो या पुराना, है तो सही
15-Apr-2026 6:15 PM
राजपथ-जनपथ : नया हो या पुराना, है तो सही

नया हो या पुराना, है तो सही

राजधानी रायपुर के तेलीबांधा के एक रेस्टोरेंट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वायरल वीडियो में रईसजादे हुक्का पीते दिख रहे हैं। वीडियो के वायरल होते ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया, और पुलिसिया संरक्षण में हुक्का बार संचालित होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। मगर इससे जुड़ी कुछ और जानकारी छनकर सामने आ रही है।

पिछली सरकार में रेस्तरां और पब में हुक्का बार संचालित होते रहे हैं। इसके लिए लाइसेंस भी दिया जाता रहा है। मगर बाद में हुक्का बारों में मारपीट की घटनाओं, और युवाओं में नशे की बढ़ती लत के चलते भारी विरोध के बाद प्रतिबंधित कर दिया गया।

यह कहा जा रहा कि वायरल वीडियो चार साल पुराना है। जो युवक-युवती वीडियो में दिख रहे हैं, वो नामी उद्योगपतियों के परिवार के हैं। हालांकि पुलिस वायरल वीडियो की पड़ताल कर रही है। प्रकरण की जांच से जुड़े एक अफसर ने ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि अभी वीडियो कहां का है, यह स्पष्ट नहीं है। कब का है, यह पता लगाया जा रहा है। वीडियो में दिख रहे चेहरों की भी जानकारी जुटाई जा रही है।

वीडियो भले ही पुराना हो, लेकिन पुलिस पर आरोप लगाने के लिए पर्याप्त है। देखना है कि जांच में क्या कुछ निकलता है।

सारे जतन आज़माए

रिक्त पदों पर भर्ती की मांग को नवा रायपुर में धरने पर बैठे डीएड अभ्यर्थियों को 112 दिन हो चुके हैं। मगर उनकी मांगों से सरकार सहमत नहीं है। डीएड अभ्यर्थियों ने आस नहीं छोड़ी है, और जिस दिन कैबिनेट की बैठक रहती है, उसके पहले सुबह-सुबह मंत्रियों के घर धमक जाते हैं।

बुधवार को कैबिनेट की बैठक थी। आज भी पांच-पांच का दल बनाकर आंदोलनकारी डीएड अभ्यर्थी सुबह मंत्रियों के घर पहुंच गए। उनकी डिप्टी सीएम अरुण साव, ओपी चौधरी, राजेश अग्रवाल, लक्ष्मी राजवाड़े, और गुरु खुशवंत साहेब से मुलाकात हुई। सभी मंत्रियों का एक ही जवाब था कि मांगों पर कैबिनेट की बैठक में विचार किया जाएगा। हालांकि कैबिनेट के एजेंडे में डीएड अभ्यर्थियों का विषय नहीं है। ऐसे में चर्चा होने की उम्मीद नहीं है। फिर भी अभ्यर्थियों ने आस नहीं छोड़ी है।

आंदोलन भी अब पारंपरिक दायरे से निकलकर प्रतीकात्मक और भावनात्मक रूप ले चुका है। दंडवत प्रणाम से लेकर घुटनों के बल मार्च, दांडी यात्रा, न्याय कलश और जल समाधि तक हर तरीका अपनाया जा चुका है। हाल ही में 14 मंत्रियों के सामने आरती उतारकर सद्बुद्धि की प्रार्थना भी की गई।

इधर, पुलिस कार्रवाई भी कम नहीं रही। कई बार झड़प, अब तक 90 से ज्यादा अभ्यर्थियों की गिरफ्तारी, और झूठे मामलों में फंसाने के आरोप माहौल को और गरमा रहे हैं। तेज गर्मी में भी सैकड़ों अभ्यर्थी धरने पर बैठे हुए हैं। यह स्पष्ट कर चुके हैं कि जब तक भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं होती, धरना जारी रहेगा। गेंद अब सरकार के पाले में है। देखना है आगे क्या होता है।

निजी स्कूलों में सब ठीक चल रहा?

शराब माफिया, रेत माफिया, कोल माफिया की तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी माफिया होते हैं। कानूनन शिक्षा को सेवा के रूप में संचालित किया जा सकता है, लेकिन है तो यह एक संगठित कारोबार । छत्तीसगढ़ हो या कोई दूसरा राज्य, ऐसे उदाहरण मिलेंगे जब निजी स्कूल अपनी मनमानी करती हैं। किताबें, कॉपियां, यूनिफॉर्म और स्टेशनरी चुनिंदा चिन्हित दुकानों से खरीदने के लिए विवश किया जाता है। मध्यप्रदेश में इंदौर के कलेक्टर ने ऐसे मामलों में जो सख्ती दिखाई है, वह दूसरे राज्यों के लिए भी नजीर है। वहां शिकायतें मिलीं तो तीन-चार स्कूलों के प्राचार्यों, संचालकों और स्टेशनरी दुकानदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई। एफआईआर दर्ज कराने अभिभावकों को बच्चों के साथ थाने भेजा गया। रात दो बजे भी एफआईआर कराई गई। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के ज्यादातर कानून एक समान है। हमारे यहां अशासकीय विद्यालय फीस विनियमन अधिनियम, 2020 लागू किया है। हाल ही में हाईकोर्ट ने इस कानून को संवैधानिक करार देते हुए सरकार के फीस नियंत्रण के अधिकार को वैध भी ठहरा दिया है।

शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के पास वही शक्ति है, जो मध्यप्रदेश में इंदौर या किसी अन्य जिले के कलेक्टर के पास है। जैसे-फीस में 8 फीसदी से ज्यादा वृद्धि नहीं की जा सकती। जो फीस बढ़ाई जाएगी उसका अनुमोदन जिला फीस निर्धारण समिति से कराना होगा, जिसमें अभिभावक भी सदस्य होते हैं। डीईओ को स्कूलों का नियमित निरीक्षण करना जरूरी है और शिकायतों की रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपना है। अनियमितता पाए जाने पर मान्यता रद्द करने, जुर्माना लगाने का अधिकार तो अधिनियम देता ही है, जिला फीस समिति के पास सिविल कोर्ट जैसे अधिकार भी होते हैं। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग भी बच्चों के मामले में संज्ञान लेने का अधिकार रखता है। कानून बहुत से हैं, जरूरी है कि शिक्षा विभाग और सरकार मनमानी को काबू में करने की इच्छा रखे। कुछ जिलों में कलेक्टर ऐसे मामलों में रुचि लेते हैं और कार्रवाई करते हैं। पर फिलहाल इंदौर में जैसा हुआ, छत्तीसगढ़ में कहीं, किसे जिले में दिखा नहीं। क्या यह मान लिया जाए कि निजी स्कूलों से अभिभावकों और बच्चों को कोई शिकायत ही नहीं है? 

अजन्मे बच्चे की हिफाजत के लिए..

एक शौकिया वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर सामान्य तौर पर मैदान में पक्षियों की तलाश में आगे बढ़ रहा था। उसकी नजऱ जमीन पर नहीं थी, कदम अपने आप बढ़ते जा रहे थे। तभी अचानक टीं-टीं-टीं की तेज, बेचैन आवाज ने उसे रोक दिया। उसने नीचे देखा तोकुछ ही दूरी पर एक टिटिहरी अपने अंडों पर डटी बैठी थी।

उस क्षण वह खतरे को भांप चुकी थी, पर उडक़र खुद को बचाने के बजाय अपने अंडों की रक्षा में अडिग थी। वह घबराई तो थी पर भागी नहीं। बल्कि चीख रही थी कि यहां से दूर रहो। अकेली होती तो वह कब की उड़ चुकी होती, लेकिन मां थी। इस दुनिया में आने वाले बच्चों की रखवाली कर रही थी। ममता के लिए साहस और समर्पण भी जरूरी होता है। फोटो नरेंद्र वर्मा ने मोहनभाठा इलाके से ली है।


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