राजपथ - जनपथ
कोई और तर्क बाकी नहीं रहा
सरकार ने भ्रष्टाचार के प्रकरण में करीब तीन महीने पहले राज्य प्रशासनिक सेवा के एक अफसर के खिलाफ कार्रवाई कर दी। अफसर स्थानीय सांसद के मार्फत बहाली की कोशिश में हैं। सांसद भी अफसर के मुरीद रहे हैं। उन्होंने अफसर की बहाली की कोशिशें शुरू कर दीं।
बताते हैं कि सांसद, सीएम से काफी समय से अकेले में मुलाकात की कोशिश कर रहे थे, ताकि अफसर की बहाली का रास्ता साफ हो सके। सीएम पिछले दिनों सांसद के क्षेत्र में आए, तो उन्हें सीएम के सामने अपनी बात रखने का मौका मिल गया।
सांसद ने जैसे ही अफसर की बहाली के लिए भूमिका बांधनी शुरू की, वहां बैठे मंत्रीजी ने तुरंत टोक दिया और अफसर को भ्रष्ट बताते हुए कार्रवाई को उचित ठहरा दिया। फिर क्या था, सांसद के पास कोई और तर्क नहीं रह गया। बात वहीं खत्म होकर रह गई।
डीजल की बिक्री पर नया आदेश
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण डीजल-पेट्रोल संकट गहराता जा रहा है। सरकार का आधिकारिक बयान यह है कि ईंधन की आपूर्ति में कोई कमी नहीं है, लेकिन लोग जरूरत से अधिक घबराकर खरीदारी कर रहे हैं, जिसके चलते कई पेट्रोल पंप जल्दी खाली हो रहे हैं। इधर, 22 मई को राज्य के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग द्वारा जारी आदेश कुछ अलग संकेत देता है।
सामान्य उपभोक्ताओं के लिए कहा गया है कि पेट्रोल और डीजल की बिक्री केवल वाहनों की टंकी में ही की जाए। नियम का उल्लंघन होने पर संबंधित लोगों के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्रवाई होगी। आदेश के दूसरे हिस्से में कुछ परिस्थितियों में इस प्रतिबंध में शिथिलता दी गई है। रबी फसल की कटाई और खरीफ सीजन की तैयारी में लगे किसानों को छूट दी जाएगी। इसके अलावा, रेलवे, कलेक्टर द्वारा चिन्हित सडक़ निर्माण, भवन निर्माण तथा अस्पताल, मोबाइल टॉवर जैसे समय-सीमा वाले निर्माण कार्यों के लिए भी राहत का प्रावधान किया गया है।
आदेश के तीसरे बिंदु में बताया गया है कि यह छूट कैसे मिलेगी। इसके लिए संबंधित व्यक्ति को अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) के पास आवेदन करना होगा। आवेदन की जांच और संतुष्टि के बाद एसडीएम संबंधित रिटेल आउटलेट संचालक को ईंधन वितरण का आदेश जारी करेंगे।
किसान और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोग इस व्यवस्था को अव्यावहारिक बता रहे हैं। कृषि कार्यों से जुड़े हजारों लोगों के पास ट्रैक्टर और डीजल पंप हैं। ट्रैक्टरों की पंपों पर लंबी कतारें लग रही हैं। कई जिलों में कलेक्टरों ने अपने स्तर पर राशनिंग भी शुरू कर दी है और डीजल-पेट्रोल देने की अधिकतम सीमा तय कर दी गई है। सवाल यह है कि डीजल पंपों के लिए किसान बार-बार एसडीएम कार्यालय के चक्कर कैसे लगाएंगे? क्या एसडीएम स्तर पर हर आवेदन की जांच करना व्यावहारिक रूप से संभव होगा?
रासायनिक खाद की आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए भी निर्देश जारी किए जा चुके हैं। निर्माण कार्यों में उपयोग होने वाले डीजल की आपूर्ति के लिए पहचान का अधिकार कलेक्टर या उनके अधीनस्थ अधिकारियों को दिया गया है। लेकिन इसकी परिभाषा बहुत सीमित रखी गई है, जिसमें अस्पताल, मोबाइल टॉवर और सडक़ निर्माण जैसे कार्य शामिल हैं। जबकि बारिश से पहले इन दिनों बड़े पैमाने पर निजी निर्माण कार्य भी चल रहे हैं। ऐसे निर्माण कार्यों को ईंधन कैसे मिलेगा, यह स्पष्ट नहीं है। इन निर्माण कार्यों से हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी भी जुड़ी हुई है।
इधर, कुछ जिलों में पेट्रोल पंप संचालकों को नोटिस जारी कर पूछा गया है कि उन्होंने सामान्य दिनों की तुलना में अधिक मात्रा में डीजल किसे और क्यों बेचा। पता चला कि उद्योगों को अतिरिक्त आपूर्ति की गई थी। संभव है कि कई उद्योगों ने जरूरत से ज्यादा भंडारण भी कर लिया हो। लेकिन 22 मई के आदेश में उद्योगों की स्वाभाविक आवश्यकताओं को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं।
पिछले 10-11 दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम तीन बार बढ़ चुके हैं। लोगों को पहले से इसकी आशंका थी, इसलिए कहीं बड़ा असंतोष देखने को नहीं मिला। बल्कि आम धारणा यह बन रही है कि कीमतें अभी और बढ़ सकती हैं।
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से धान की खेती पर आधारित है। वहीं गांवों से शहरों में आने वाले हजारों भूमिहीन मजदूरों की आजीविका निर्माण कार्यों और उद्योगों पर निर्भर करती है। ऐसे में डीजल-पेट्रोल की आपूर्ति वास्तविक जरूरतों के अनुरूप सुनिश्चित करने की व्यवस्था इस आदेश में दिखाई नहीं देती।


