राजपथ - जनपथ
राजनेता-कारोबारी के बीच लेन देन और गुरूजी
जब किसी राजनेता और कारोबारी के बीच लेन देन फंस जाता है तो गुरूजी को चेक क्लियर करवाना पड़ जाता है। चाहे पेमेंट आधा हो या पूरा। ऐसे ही एक कारोबारी शिष्य का गुरूजी ने हाल में पैसा वापस कराया है। गुरूजी छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के एक प्रसिद्ध धर्म गुरु हैं। उन्होंने एक पूर्व मंत्री के राजनैतिक गुरु को बोलकर अपने व्यापारी शिष्य का पेमेंट वापस कराई।जो दो साल से अटका हुआ था। अंचल के एक व्यवसायी ने पिछली सरकार के एक कद्दावर मंत्री को एक कार्य के एवज में एक खोखा भेंट किया था। इस शर्त पर थी कि कार्य अतिशीघ्र हो जाएगा। इसी बीच मंत्री जी का स्वास्थ्य खराब हुआ,फिर चुनाव आए। परिजनों,शुभचिंतकों ने भी चुनाव न लडऩे और किसी परिजन को लड़ाने की बात कही,लेकिन उन्हें लग रहा था कि वर्तमान मुख्यमंत्री विवादों में उलझ गये हैं तो सीएम की कुर्सी उन्हें ही मिलेगी।इसी भरोसे चुनावी मैदान में उतरे और विपक्षियों के बिछाए जाल में बुरी तरह फंसकर करारी हार झेलनी पड़ी। उसके बाद से व्यापारी का काम हुआ नहीं । न ही पैसे वापसी को लेकर रूचि दिखा रहे। चक्कर पे चक्कर के बाद अंत में व्यापारी ने अपने आध्यात्मिक गुरु के कानों तक बात पहुंचाई। गुरुजी ने मंत्री के राजनैतिक गुरु को पूरी जानकारी दी,फिर राजनीतिक गुरु ने पूर्व मंत्री की क्लास लगाई । तब कहीं जाकर उन्होंने व्यापारी को रकम वापस किया, वह भी हाफ। अब देखें शेष पचास फीसदी राशि शीघ्र वापस मिलेगी या गुरु से गुरु को फिर कहलाना पड़ेगा।
हक है तो वसूलिये, मगर समय पर
छत्तीसगढ़ बने 25 साल से ज्यादा हो चुके हैं। 1 नवंबर 2000 को जब मध्य प्रदेश से अलग होकर यह नया राज्य बना, तब इसे क्षेत्रीय सपनों और बेहतर प्रशासन की उम्मीदों का प्रतीक बताया गया था। लेकिन अब, रजत जयंती मना लेने के बाद अचानक एक पुराना हिसाब सामने आया है। वसूली मध्यप्रदेश से होनी है, इसलिये चर्चा वहां ज्यादा है।
27 फरवरी को भोपाल विधानसभा में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार के सवाल पर उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ सरकार ने एक अगस्त 2025 को यह राशि मांगी है। यह राशि पेंशन दायित्वों पर बढ़े बोझ की वजह से है।
मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम-2000 की धारा 49 और छठी अनुसूची के अनुसार, पेंशन की जिम्मेदारी दोनों राज्यों में जनसंख्या अनुपात के आधार पर बांटी जानी थी। यानी जो कर्मचारी विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ में आए और यहीं रिटायर हुए, उनकी पेंशन का बोझ आनुपातिक रूप से दोनों राज्यों पर पडऩा था।
अब अगर ऑडिट में अतिरिक्त दायित्व सामने आया है, तो छत्तीसगढ़ का दावा न तो मांग है, न उपकार। यह सीधा-सीधा कानूनी और नैतिक हक है। पर सवाल यह है कि राशि की मांग करने में इतनी देर क्यों? मौजूदा छत्तीसगढ़ सरकार बनने के बाद अगस्त 2025 में, यानि करीब 8 माह पहले यह राशि मांगी गई थी, मगर भुगतान नहीं हुआ। सवाल एक यह भी उठता है कि 2024 तक दोनों ही पार्टियों की सरकारें थीं, राशि वसूल करने में लचीलापन क्यों दिखाया गया? कुछ मौके ऐसे आए जब दोनों राज्यों में अलग-अलग समय पर कांग्रेस और भाजपा की सरकारें रहीं। अभी दोनों जगह भाजपा सत्ता में है। तो क्या उम्मीद करनी चाहिए कि यह राशि मिल जाएगी। या फिर ऐसा हो जाएगा कि- आपस की बात है सोचकर न मांगने वाला जिद करे, न देने वाला परवाह करे। भुगतान के मुद्दे को हल करने के लिए 28 नवंबर 2025 को मध्यप्रदेश ने एक कमेटी बना दी थी लेकिन उसने अब तक भुगतान करने की सिफारिश नहीं की है। शायद सही समय पर भुगतान की मांग की जाती तो रुकी हुई राशि का भुगतान इतना जटिल भी नहीं होता। 10 हजार 133 करोड़ रुपये बहुत होते हैं। इसके मिलने पर राज्य के विकास सडक़, स्कूल, अस्पताल का हिस्सा, जो पेंशन भुगतान में जा रहा है, उससे बचा जा सकेगा।
राज्यसभा, एक व्यक्ति एक पद ?

भाजपा में राज्यसभा प्रत्याशी को लेकर सस्पेंस बरकरार है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी किसी युवा चेहरे पर दांव खेल सकती है। हाल ही में एक युवा नेता ने दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात भी की है और वे संगठन के पसंदीदा माने जाते हैं। हालांकि पेच यह है कि उक्त नेता विधानसभा चुनाव हार चुके हैं और वर्तमान में एक निगम के चेयरमैन भी हैं। ऐसे में उन्हें राज्यसभा भेजने पर एक व्यक्तिएक पद और संगठनात्मक संतुलन को लेकर असंतोष की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
रणनीतिकारों के बीच एक महिला नेत्री के नाम पर भी चर्चा बताई जा रही है। वे जिले की प्रमुख पदाधिकारी हैं और एक पूर्व मंत्री की पुत्री हैं। पार्टी महिला प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरण को साधने के लिहाज से इस विकल्प पर भी विचार कर सकती है।
इसी बीच दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के परिवार की ओर से भी लॉबिंग की चर्चा है। उनके भतीजे रणविजय सिंह जूदेव पहले राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं, हालांकि उनके कार्यकाल को लेकर पार्टी के भीतर मिश्रित राय बताई जाती है। जूदेव के पुत्र प्रबल प्रताप सिंह जूदेव और पुत्रवधु संयोगिता सिंह जूदेव को पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव में मैदान में उतारा था, लेकिन दोनों को हार का सामना करना पड़ा। परिवार की एक अन्य सदस्य महिला आयोग में भी हैं। ऐसे में संगठन के भीतर यह आकलन है कि फिलहाल जूदेव परिवार से किसी को राज्यसभा भेजे जाने की संभावना सीमित हो सकती है।
इन नामों के अलावा चार पूर्व विधायक भी दावेदारी जता चुके हैं। भाजपा अक्सर अंतिम क्षणों में चौंकाने वाला फैसला लेने के लिए जानी जाती है, इसलिए किसी बिल्कुल नए और अप्रत्याशित नाम के सामने आने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।


