राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : चुनाव ड्यूटी नहीं फिर भी रखवाली नहीं हो रही
04-Apr-2026 5:37 PM
राजपथ-जनपथ : चुनाव ड्यूटी नहीं फिर भी रखवाली नहीं हो रही

चुनाव ड्यूटी नहीं फिर भी रखवाली नहीं हो रही

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण-एनजीटी ने असम सरकार या कहें, राज्य निवार्चन पदाधिकारी के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें 1600 वन कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी पर लगा दिया गया था। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह समाचार इसलिये खास है क्योंकि यहां के बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वन कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती रही है, वन कर्मचारी संगठनों के विरोध और अदालती आदेशों के बावजूद। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद से अब तक हुए लगभग सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वन विभाग के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी में लगाया गया है। चुनाव आयोग के नियमानुसार, सरकारी कर्मचारियों की कमी होने पर वन विभाग के मैदानी और कार्यालयीन स्टाफ का उपयोग मतदान दल और सुरक्षा व्यवस्था में किया जा सकता है।

2023 के विधानसभा चुनाव में सैकड़ों वनरक्षक, वनपाल और लिपकीय स्टाफ को पीठासीन या मतदान अधिकारी के तौर पर ड्यूटी दी गई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ड्यूटी लगाई गई। विशेषकर बस्तर और सरगुजा जैसे दुर्गम क्षेत्रों में, जहां वन विभाग के कर्मचारियों को भौगोलिक स्थिति की बेहतर समझ होती है, उन्हें अक्सर गाइड या मतदान दल के सदस्य के रूप में शामिल किया जाता रहा है। हालांकि इनकी सटीक संख्या उपलब्ध नहीं है। बस्तर और सरगुजा संभाग के बड़े हिस्से में जंगल हैं और रास्ते दुर्गम हैं, इसलिए कई वन कर्मचारियों को रास्ता बताने के लिए गाइड के रूप में शामिल किया गया।

पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में स्टेट फॉरेस्ट रेंजर्स एसोसिएशन इसी बात को लेकर हाईकोर्ट चला गया था कि उनकी ड्यूटी चुनाव में लगाई जा रही है। एसोसिएशन का तर्क था कि  क्षेत्रीय अमला न होने की वजह से वन क्षेत्र में चोरियां बढ़ेंगी। साथ ही गर्मी के दिनों में वनों में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं. ऐसे में अगर वन विभाग का क्षेत्रीय अमला चुनाव ड्यूटी में लगा रहता है तो फिर इन घटनाओं पर रोक लगाना नामुमकिन हो जाएगा। तब चुनाव आयोग ने अडरटेकिंग दी कि वन कर्मचारी ड्यूटी पर नहीं लगाए जाएंगे।

 फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी ने भी 2024 में सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर वन कर्मियों को ड्यूटी से छूट देने का मशविरा दिया था। इन आदेशों बाद भारत निर्वाचन आयोग ने भी कम से कम दो बार पत्र लिखकर राज्यों से कहा कि कुछ श्रेणियों के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी से बाहर रखा जाए।

छत्तीसगढ़ में भी कर्मचारी संगठन इसी तरह की मांग उठाते रहे हैं। पर इनकी मांग पूरी तरह नहीं मानी गई है। बस्तर संभाग में ही 1200 से अधिक वन कर्मचारी ड्यूटी पर बीते विधानसभा चुनाव के  दौरान लगाए गए थे। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सरगुजा के जिला निर्वाचन अधिकारी को 800 से अधिक वन कर्मचारियों की सूची भेजी गई थी। वैसे इनमें से अधिकांश को रिजर्व मतदान दल के रूप में रखा गया था, पर चुनाव में सक्रिय भागीदारी तो हो ही गई। वे फील्ड पर नहीं थे।

वैसे राष्ट्रीय उद्यानों, चिडिय़ाघरों, वन्यजीव अभयारण्यों और टाइगर रिजर्व में तैनात कर्मचारियों को तथा उनके वाहनों को चुनाव ड्यूटी पर नहीं भेजा जाता है। माना जाता है कि इन स्थानों पर ड्यूटी की निरंतरता जरूरी होती है, अवरोध खड़ा नहीं किया जा सकता।

छत्तीसगढ़ के साथ एक विशिष्ट परिस्थिति यह भी है कि यहां कई जिले हाथी प्रभावित हैं। इनके मूवमेंट पर लगातार निगरानी रखनी पड़ती है। वहीं, बीते कई लोकसभा चुनाव गर्मियों के दिनों में हुए। इस मौसम में जंगलों में आग लगने, शिकार व चोरी की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

वैसे छत्तीसगढ़ में वनों से चोरी और शिकार का कोई मौसम नहीं है। बीते दो हफ्ते के भीतर ही करंट लगाकर जानवरों के शिकार की घटनाएं हुई हैं। शिकार के बाद मांस पकाते लोग पकड़े गए हैं। इलेक्शन अर्जेंट नहीं होने के बाद भी वन्यप्राणियों और वन संपदा की हिफाजत छत्तीसगढ़ में चुनौतीपूर्ण ही है। असम की परिस्थितियों के बारे में कुछ कह नहीं सकते, लेकिन यहां तो वन विभाग क्या, दूसरे कई और विभागों के अधिकारी कर्मचारी हैं, जो चुनाव ड्यूटी से बचने का कोई न कोई रास्ता ढूंढते रहते हैं।

पेट्रोल फिर महंगा, सौ के पार कीमत

पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध की वजह से पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के बीच आम उपभोक्ताओं पर भी असर दिखने लगा है। हाल ही में केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर राहत के संकेत दिए थे। इसके बाद भाजपा नेताओं ने सरकार के इस फैसले की जमकर सराहना भी की थी और उम्मीद जताई जा रही थी कि कीमतों में स्थिरता बनी रहेगी।

लेकिन ताजा घटनाक्रम में राज्य सरकार ने पेट्रोल की कीमत में एक रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। इसके साथ ही पेट्रोल की कीमत अब 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गई है। नई दरें 1 अप्रैल से प्रभावी हो चुकी हैं। खास बात ये है कि पेट्रोल-डीजल राज्य सरकार के वैट के दायरे में आते हैं। पहले इन पर 25 प्रतिशत वैट और 1 प्रतिशत सेस लगाया जाता था, जिसे अब बढ़ाकर 2 प्रतिशत कर दिया गया है। इस फैसले के बाद उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है।

केंद्र सरकार ने पहले ही कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी कर दी है। मगर रसोई गैस सिलेंडर की दरें यथावत हैं। हालांकि इसकी किल्लत चल रही है। संभावना जताई जा रही है कि अप्रैल के आखिरी में रसोई गैस सिलेंडर महंगी हो सकती है। तब तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव निपट चुके होंगे।


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