राजपथ - जनपथ
राज्यसभा, एक-दो अनार, दर्जनों बीमार
राज्यसभा की दो रिक्त सीट के लिए अप्रैल में चुनाव होंगे। कांग्रेस और भाजपा, दोनों को एक-एक सीट मिलना तय है। कांग्रेस से तो दूसरे राज्य से भी प्रत्याशी बनाए जाते रहे हैं। ऐसा होते आया है, लेकिन भाजपा में अब तक स्थानीय को ही राज्यसभा में भेजा गया है। ये अलग बात है कि भाजपा अब नामों को लेकर चौंकाते रही हैं।
पिछली बार भाजपा में स्थानीय स्तर पर वरिष्ठ नेता रामप्रताप सिंह के नाम पर सहमति बन गई थी। वो नामांकन के लिए जरूरी कागजात एकत्र में जुटे थे तभी पार्टी ने रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य देवेन्द्र प्रताप सिंह को प्रत्याशी घोषित कर दिया।
कुछ इसी तरह वर्ष-2018 विधानसभा चुनाव के पहले धरमलाल कौशिक भी राज्यसभा में जाने की तैयारी कर रहे थे। तत्कालीन सीएम डॉ रमन सिंह ने दिल्ली में पार्टी में कुछ प्रमुख नेताओं से चर्चा भी कर ली थी। कौशिक ने तो नामांकन पत्र मंगवा भी लिए थे इस आशय की खबर लीक होने के बाद पार्टी ने धरमलाल कौशिक की जगह सरोज पांडेय को प्रत्याशी बना दिया, और कौशिक राज्यसभा में जाने से रह गए। उन्हें विधानसभा चुनाव लडऩा पड़ा, और वो विधायक बनकर नेता प्रतिपक्ष बने। वर्तमान में रिक्त सीट पर कई हारे हुए नेताओं की नजर टिकी हुई है। कुछ रिटायर्ड अफसर भी अपनी संभावना तलाश रहे हैं। मगर पार्टी हमेशा चौंकाते आई है। कुछ इस बार भी ऐसा हो सकता है।
मनरेगा को आकार देने वालों के विचार
केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को रद्द कर दिया है और उसकी जगह विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) या वीबी-ग्रामजी या वीबी जी राम जी, को लाया है। सरकार इसे मनरेगा से बेहतर बता रही है- ज्यादा काम के दिन, बेहतर योजना और विकास पर फोकस, लेकिन कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल गरीबों पर हमला। यह कह कर कि इससे काम का अधिकार छिन जाएगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होगी। राजनीतिक बहस में दोनों पक्ष अपनी-अपनी बातें जोर-शोर से रखते हैं, लेकिन आम आदमी उलझ जाता है कि सच्चाई क्या है?
क्या यह वाकई सुधार है या गरीबों की कमर तोडऩे की साजिश? ऐसे में जरूरी है कि हम उन विचारकों की सुनें जिनका इस मुद्दे से सीधा जुड़ाव है, जो जमीन पर काम करते हैं और जिनकी बातें राजनीति से ऊपर उठकर आती हैं।
फ्रंटलाइन पत्रिका के नए अंक में प्रकाशित निखिल डे और अरुणा रॉय का लेख- सर्जिकल स्ट्राइक ऑन द पुअर, इसी तरह की गहरी पड़ताल है। ये दोनों सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) के संस्थापक सदस्य। अरुणा रॉय पूर्व आईएएस अधिकारी हैं, जिन्होंने सरकारी नौकरी छोडक़र ग्रामीण गरीबों के अधिकारों के लिए जीवन समर्पित किया। वे सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून की आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाईं। निखिल डे भी दशकों से ग्रामीण मजदूरों के संघर्ष में सक्रिय हैं। दोनों ने मनरेगा कानून बनाने के आंदोलन में अहम हिस्सा लिया और उसके कार्यान्वयन पर नजर रखी। इस विषय पर विचार रखने की उनकी पात्रता इसलिए है क्योंकि वे किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जमीन की हकीकत जानते हैं। उन्होंने लाखों मजदूरों के साथ काम किया, जहां मनरेगा ने गरीबी के खिलाफ लड़ाई में मदद की। ऐसे में उनका लेख राजनीतिक शोर से अलग, तथ्यों पर आधारित मान सकते हैं।
लेख में उनकी सबसे बड़ी चिंता है काम के अधिकार का खत्म होना। मनरेगा में हर ग्रामीण को साल में 100 दिन काम मांगने का हक था, जो मांग पर आधारित था। लेकिन वीबी-जी रामजी में यह गारंटी नहीं है। केंद्र सरकार तय करेगी कहां काम होगा, किस तरह का और कितना। यह सेंट्रलाइजेशन है, जहां दिल्ली से फैसले होंगे, जबकि मनरेगा में ग्राम सभाएं और पंचायतें फैसला करती थीं। उनके मुताबिक इससे लोकतंत्र कमजोर होगा और स्थानीय जरूरतें नजरअंदाज।
दूसरी चिंता वित्तीय बोझ की है। नया कानून केंद्र और राज्य के बीच 60:40 अनुपात में खर्च बांटता है, जो राज्य सरकारों पर दबाव डालेगा। अगर राज्य पैसा नहीं दे पाए, तो योजना बंद हो सकती है और गरीब मजदूर बीच में लटक जाएंगे। लेखक कहते हैं कि इससे संघीय ढांचा कमजोर होगा और केंद्र राज्यों से पैसे नहीं मिलने का बहाना बनाएगा।
तीसरी बड़ी चिंता मजदूरों के शोषण की। वीबी-जी राम जी में फसल के मौसम में 60 दिन काम बंद करने का प्रावधान है, जो बड़े किसानों को सस्ती मजदूरी मिलने देगा। मनरेगा न्यूनतम मजदूरी की तरह काम करता था, जो अब खत्म। मजदूरी दरें भी केंद्र तय करेगा, बिना मुद्रास्फीति को ध्यान में रखे।
लेखक इसे श्रम कानूनों में बदलाव की कड़ी बताते हैं, जहां मजदूरों के अधिकार कम हो रहे हैं और नियोक्ताओं को फायदा। उन्होंने कोविड महामारी का उदाहरण दिया, जब मनरेगा ने करोड़ों को बचाया, लेकिन अब ऐसा कोई सुरक्षा जाल नहीं रहेगा। कुल मिलाकर, वे कहते हैं कि यह बदलाव गरीबों पर सर्जिकल स्ट्राइक है, जो कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा देगा।
पार्टी पदों के लिए इंटरव्यू!!
कांग्रेस में शीर्ष पदों पर नियुक्ति के लिए इंटरव्यू की औपचारिकता निभाई जा रही है। पहले जिला अध्यक्षों की नियुक्ति से पहले दावेदारों का इंटरव्यू लिया गया था, और अब प्रदेश महिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए इंटरव्यू हुआ है।
एआईसीसी ने राष्ट्रीय सचिव अलका लांबा की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने इंटरव्यू कर नाम प्रस्तावित करने का जिम्मा दिया है। बताते हैं कि कमेटी ने दावेदारों की शार्ट लिस्टिंग कर पांच नेत्रियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया था। इनमें तीन पूर्व विधायक, और एक वर्तमान विधायक संगीता सिन्हा थीं।
पूर्व विधायकों में छन्नी साहू, ममता चंद्राकर, डॉ लक्ष्मी ध्रुव हैं। तीनों की टिकट कट गई थी। इसके अलावा दिवंगत पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा की पुत्री तुलिका कर्मा का भी इंटरव्यू हुआ। अलका लांबा कमेटी ने पांच जनवरी को दिल्ली में पांचों दावेदार का इंटरव्यू लिया था। इसके बाद अपनी अनुशंसा एआईसीसी को भेज दी है।
ममता और तुलिका तो पहले ही महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय पदाधिकारी बन चुकी है। ऐसे में बाकी तीन छन्नी, संगीता सिन्हा, और डॉ लक्ष्मी ध्रुव में से फैसला होना है। पार्टी के कई लोग मान रहे हैं कि स्थानीय बड़े नेताओं की सिफारिश को ही महत्व दिया जाएगा। ऐसा जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में देखने को मिल चुका है। महिला कांग्रेस अध्यक्ष के मामले में क्या होता है, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
आकांक्षा के खिलाफ फिर एफआईआर
छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के रामानुजगंज में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर आकांक्षा टोप्पो के खिलाफ एफआईआर फिर से दर्ज कराई गई है। इस बार मामला केवल एक थाने तक सीमित नहीं रहा। मंत्री रामविचार नेताम के समर्थकों ने अलग-अलग आठ थानों में लिखित शिकायतें दी हैं। आरोप है कि आकांक्षा ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए मंत्री पर अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणी की है।
सूरजपुर जिले के एक वन विश्राम गृह में कथित अश्लील नृत्य का वीडियो सामने आने पर मंत्री ने कहा कि केवल सीताराम-सीताराम करना ही कला नहीं है, कला का दायरा व्यापक है। इसी बयान को आकांक्षा टोप्पो ने अपनी रील में तीखे, व्यंग्यात्मक और कुछ आपत्तिजनक शब्दों के साथ निशाने पर लिया। रील में एक कथित ऑडियो क्लिप भी जोड़ी गई, जिसमें मंत्री किसी कार्यकर्ता को झिडक़ते और ‘पागल’ कहते सुनाई देते हैं।
इससे पहले महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो पर टिप्पणियों के मामले में आकांक्षा की गिरफ्तारी हुई थी।
भाजपा कार्यकर्ताओं का तर्क है कि ऐसी टिप्पणियां जनप्रतिनिधियों की छवि धूमिल करती हैं और समाज में वैमनस्य फैलाती हैं। यह मांग कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शालीनता की कसौटी पर खड़ी दिखती है।
मीडिया में परंपरागत भाषा और मर्यादा की उस परंपरा का पालन नहीं किया जाता, जो अखबारों में दिखाई देता है। शायद, सत्ता के प्रति असंतोष को भरोसे की भाषा से लोगों को तसल्ली नहीं मिल रही, इसलिए एफआईआर दर्ज होने वाली बातें कहने के बावजूद आकांक्षा टोप्पो को हजारों लाइक्स मिल रहे हैं।


