राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : ऐसे ही तो निपटेंगे राजस्व के मामले...
24-Jun-2025 6:22 PM
राजपथ-जनपथ : ऐसे ही तो निपटेंगे राजस्व के मामले...

ऐसे ही तो निपटेंगे राजस्व के मामले...

कुछ दिन पहले ही कसडोल में शाला प्रवेशोत्सव के एक कार्यक्रम में यह देखने को मिला कि सांसद प्रतिनिधि का स्वागत पहले कराना कसडोल विधायक संदीप साहू को नागवार गुजरा। उन्होंने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को खरी-खोटी सुनाई और गुस्से में मंच छोडक़र चले गए। जब विधायक को ही प्रतिनिधियों का रुतबा खटक रहा हो, तो फिर आम लोगों की क्या बिसात?

एक वाकया सोमवार को तखतपुर तहसील कार्यालय में हुआ। राजस्व न्यायालय की पेशियों के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण पक्षकार पहुंचे थे। वकील भी अपने मुवक्किलों की पैरवी के लिए मौजूद थे। तहसीलदार साहब दफ्तर में ही थे, मगर उनका अर्दली सबको यह कहकर रोक रहा था कि अंदर कॉन्फिडेंशियल मीटिंग चल रही है। काफी देर हो जाने पर वकीलों और पक्षकारों का धैर्य टूट गया। उन्हें अंदेशा होने लगा कि कहीं पूरा दिन इसी में न निकल जाए और उन्हें अगली तारीख पकड़ा दी जाए। तहसील अदालत भी रोज नहीं लगती, सप्ताह में सिर्फ दो दिन तय हैं।

वकील और पक्षकार तहसील कार्यालय के गेट पर पहुंचकर विरोध जताने लगे। हंगामा सुनकर तहसीलदार साहब बाहर आए, तो वकीलों ने सवाल दागे। कहा- अगर वाकई कोई जरूरी गोपनीय बात करनी है, तो दफ्तर के बाद करें या घर में करें। ऑफिस टाइम में हमें बेवजह इंतजार क्यों कराते हैं? कॉन्फिडेंशियल मीटिंग के नाम पर घंटों तक बाहर खड़ा कर देना हमारी बेइज्जती है। गांव-गांव से काम-धंधा बंद करके पहुंचे लोग भटक रहे हैं। तहसीलदार साहब समझ गए कि मामला बिगड़ रहा है। उन्होंने तत्काल माफी मांगते हुए कहा- आप लोग सही कह रहे हैं, अब जैसा आप चाहेंगे, वैसा ही होगा। जिस व्यक्ति के साथ गोपनीय बैठक चल रही थी दरअसल वे विधायक के प्रतिनिधि ही थे।

प्रदेश में सुशासन तिहार के दौरान सबसे ज्यादा तीन लाख आवेदन राजस्व विभाग से मिले थे। पूरे प्रदेश में सीमांकन, नामांतरण, अतिक्रमण जैसे करीब 1.5 लाख मामले लंबित हैं। देरी के पीछे कई कारण गिनाए जाते हैं- जैसे ऑनलाइन सिस्टम की गड़बड़ी, पटवारी-आरआई की हड़ताल, या भ्रष्टाचार। लेकिन अब सूची में एक और कारण जुड़ गया है। ऑफिस टाइम में अधिकारियों को सत्ताधारी दल के नेता घेरकर बैठे जाते हैं, और जनता बाहर पसीना बहाते अपनी बारी का इंतजार करती रहती है।

भूपेश के मूड का राज

राजीव भवन में कांग्रेस की बैठक में पूर्व सीएम भूपेश बघेल, और प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट के तेवर की काफी चर्चा रही। भूपेश ने तो सीधे-सीधे नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत की सक्रियता पर ही सवाल खड़े कर दिए। भूपेश बघेल ने अनुशासनहीनता के प्रकरणों पर कोई कार्रवाई नहीं करने प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज को भी फटकार लगा दी। वैसे तो पूर्व सीएम थोड़े तुनकमिजाजी माने जाते हैं, और पार्टी के छोटे-बड़े नेता इससे परिचित भी हैं। मगर इस बार बैठक में उनकी नाराजगी की कुछ और वजह बताई जा रही है।

बताते हैं कि बैठक से पहले ही पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भूपेश बघेल उखड़े हुए दिख रहे थे। दरअसल, बघेल पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भी हैं। उनकी नजर पंजाब की लुधियाना वेस्ट विधानसभा सीट के चुनाव नतीजे पर थी। यहां तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। सोमवार को बैठक के पहले चुनाव नतीजे आ गए थे इस वजह से उनका मूड बिगड़ा हुआ था। और जब पायलट ने उन्हें अपनी बातें रखने के लिए कहा, तो पहले वो तैयार नहीं हुए। फिर जोर देने पर पूर्व सीएम ने अपनी बातें रखीं। और बैज, और डॉ. महंत पर अपना गुस्सा निकाल दिया।

नेता प्रतिपक्ष डॉ. महंत के प्रति उनकी नाराजगी कोई नई नहीं है। वो पार्टी की गुटीय राजनीति में महंत के विरोधी माने जाते हैं। मगर बैज पर पुरानी बात को लेकर गुस्सा निकला, तो कई लोग चकित हो गए। पूर्व सीएम कुछ दिन पहले तक बैज के पक्ष में दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बस्तर में दीपक बैज की पदयात्रा में भी शरीक हुए थे। वो ये बताने से नहीं चूके थे कि खुद राहुल गांधी ने पत्र लिखकर बैज की तारीफ की है। फिर ऐसा क्या हुआ कि वो बैज से खफा हो गए?

पार्टी के कुछ नेता बताते हैं कि भूपेश की बैज से नाराजगी की एक और वजह है। वो ये कि दो महीना पहले सीबीआई ने भूपेश के यहां रेड की थी तब पार्टी के पदाधिकारी, और विधायक वहां पहुंचे थे। पार्टी कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन भी किया था। बाद में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए भूपेश ने कहा था कि केन्द्रीय एजेंसियां, विपक्ष के कई और नेताओं के यहां रेड कर सकती है, ऐसे में जहां कहीं भी रेड हो, वहां पहुंचकर अपना विरोध दर्ज करना है। इस पर सबने सहमति दी थी लेकिन पिछले दिनों उनके करीबी विजय भाटिया को ईओडब्ल्यू-एसीबी ने गिरफ्तार किया, तो पार्टी में कोई हलचल नहीं हुई।

दो दिन पहले पूर्व सीएम खुद जेल में बंद पूर्व मंत्री कवासी लखमा, और विजय भाटिया से भी मिलने गए। बाद में उन्होंने मीडिया से चर्चा में भाटिया को समुचित इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं कराने पर जेल प्रशासन को आड़े हाथों लिया। इस पूरे मामले में पीसीसी की चुप्पी से पूर्व सीएम खफा बताए जा रहे हैं। चाहे जो कुछ भी हो, पार्टी की अंदरूनी लड़ाई सडक़ पर आ ही गई।

पायलट ने फटकार दिया

प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट ने मोर्चा-प्रकोष्ठों की बैठक में युवक कांग्रेस आकाश शर्मा को जमकर फटकार लगाई। पायलट का गुस्सा देखकर  बैठक में मौजूद अन्य नेता हक्के-बक्के रह गए।

दरअसल, पायलट 7 जुलाई को रायपुर में प्रस्तावित रैली-सभा की तैयारियों पर चर्चा कर रहे थे। वो बारी-बारी से नेताओं को भीड़ को लेकर टारगेट भी दे रहे थे। आकाश शर्मा ने कह दिया कि वो 10-15 हजार की भीड़ ला सकते हैं, लेकिन पार्टी संसाधन मुहैया कराए, तो इससे ज्यादा भीड़ जुटा सकते हैं। इस पर पायलट भडक़ गए, उन्होंने कहा कि आपको विधानसभा टिकट दी गई थी, तो क्या आपसे पैसे मांगे गए थे। आप संसाधन क्यों मांग रहे हो। पायलट यही नहीं रुके, उन्होंने कहा कि आप लोग सक्षम हैं, और मैंने तो यहां तक सुना है सबसे ज्यादा वसूली तुम्ही करते हो। पायलट ने गुस्से में दीपक बैज से कह दिया कि इन्हें मंच पर जगह भी न दी जाए।

बताते हैं कि पायलट विधानसभा चुनाव के समय से आकाश शर्मा से खफा चल रहे हैं। टिकट से पहले आकाश शर्मा ने 7 सीआर खर्च करने का  वादा किया था, लेकिन खर्च काफी कम किए। लंबी मार्जिन से हार के पीछे कांग्रेस प्रत्याशी द्वारा खर्च कम करने की बात भी आई है। कार्यकर्ता प्रचार के दौरान साधन-संसाधन कमी का रोना रोते रहे। यह बात प्रदेश प्रभारी, और अन्य नेताओं तक पहुंची थी, और जब मौका मिला, तो पायलट ने भरी बैठक में आकाश शर्मा को सुना दिया।

सरकारी रसोइया था या इनामी नक्सली?

बीते 10 जून को बस्तर पुलिस ने एक प्रेस नोट जारी कर बताया कि टाइगर रिजर्व में सात माओवादी मारे गए हैं, जिनमें सुधाकर और भास्कर जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं। पर इन्हीं में से एक नाम, महेश कुडिय़ाम है। इसे लेकर गांव वाले और परिजन दूसरा ही दावा कररहे हैं। उनका कहना है कि महेश के स्कूल का सरकारी रसोइया था। उसके सात छोटे-छोटे बच्चे हैं। उसके खाते में हर महीने सरकार से मानदेय आता था।

परिजनों की बात को पूरी तरह सच मान लेना शायद जल्दबाजी होगी, लेकिन बस्तर में यह कोई अनजाना आरोप नहीं है। अतीत में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जब निर्दोष मारे गए। खुद सुरक्षा बलों ने कई मामलों में माना कि उनकी गलती से निर्दोषों की जान गई। ताजा मामले में गांव वालों का यह मान लेना कि मुठभेड़ में मारे गए शेष छह लोग वाकई सक्रिय माओवादी थे, यह बताता है कि वे नक्सलियों की भाषा तो नहीं बोल रहे हैं।  मार्च 2026 तक नक्सल समस्या को जड़ से खत्म कर दिया जाएगा। सुरक्षा बलों के पास अब केवल 9 माह बचे हैं। क्या लक्ष्य हासिल करने की हड़बड़ी में ऐसी और मौतों को देखने के लिए तैयार रहना होगा, जिनको लेकर पुलिस और ग्रामीणों के दावे अलग-अलग हों।


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