राजनांदगांव
घटिया क्वाालिटी के किट से मिले रिपोर्ट के बाद मामले में शामिल हुई पुलिस
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 31 मई। सोमनी थाना क्षेत्र में एक नाबालिग को रातभर थाना में बिठाकर रखने के मामले में थानेदार अरूण नामदेव और महिला आरक्षक राजश्री सिंह को निलंबित करने के बाद अब स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा हो गया है।
नाबालिग के गर्भवती होने की विधिवत तौर पर पुलिस को सूचना देने के बाद से ही विवाद खड़ा हुआ। पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई के बाद स्वास्थ्य विभाग पर भी जिम्मेदारी करने को लेकर कड़ी कार्रवाई की मांग उठ रही है। नाबालिग के माता-पिता ने सभी दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने के लिए अपनी आवाज मुखर की है। सोमनी सरकारी अस्पताल में नाबालिग के पहले दो बार जांच में गर्भवती होने की पुष्टि हुई। तीसरी बार भी जांच करने में यथावत रिपोर्ट आने के बाद अस्पताल की ओर से पुलिस को सूचना दी गई। यहीं से मामला पुलिस के हाथों में चला गया और एक बड़ा बखेड़ा खड़ा हो गया।
इस संंबंध में घुमका बीएमओ नंदकिशोर टंडन ने ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि तीन बार किट में गर्भवती होने की पुष्टि हुई थी। इसके बाद पुलिस को जानकारी दी गई। उन्होंने कहा कि जीवनदीप समिति की अनुशंसा पर किट की स्थानीय स्तर पर खरीदी हुई है। गुणवत्ता को लेकर वह कहने की स्थिति में नहीं है।
मिली जानकारी के मुताबिक अस्पताल की ओर से सूचना मिलने के बाद थाना प्रभारी अरूण नामदेव और थाना स्टॉफ अचानक युवती को घेरते हुए मानसिक तौर पर प्रताडि़त करने लगे। दरअसल पुलिस कार्रवाई की आड़ में यह जानना चाह रही थी कि नाबालिग का किससे संबंध रहा है। जबकि नाबालिग और उसके परिजन पुलिस से बार-बार गर्भवती होने को लेकर साफ इन्कार करते रहे।
पुलिस ने पीडि़ता को रातभर थाने में बिठाकर रखा और उससे कई तरह से मानसिक और शारीरिक कष्ट दिए। इस बीच स्वास्थ्य विभाग भी पूरी तरह से कटघरे में है। एक जानकारी के मुताबिक सीजीएमएससी (छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कार्पोरेशन) द्वारा लंबे समय से गर्भवती जांच किट की सप्लाई बंद पड़ी है। ऐसे में जीवनदीप समिति की निगरानी में स्थानीय स्तर पर किट की खरीदी का प्रावधान है।
बीएमओ नंदकिशोर टंडन ने स्थानीय स्तर पर खरीदी की मंजूरी दी। एक जानकारी के मुताबिक मेड नामक गर्भवती किट से जांच काफी समय से की जा रही है। ऐसे में नाबालिग को गर्भवती होने की रिपोर्ट सामने आने से किट की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो गए हैं। कुल मिलाकर स्वास्थ्य विभाग को भी इस विवाद को बढ़ावा देने का जिम्मेदार माना जा रहा है।


