रायपुर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 3 फरवरी। रविवि उप डाकघर में बचत योजना में वित्तीय घोटाले के एक मामले में छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग ने पीडि़त खाताधारकों को करोड़ों रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है।
आयोग के अनुसार, परिवादी अनिल कुमार पाण्डेय, उनकी पत्नी एवं पुत्री द्वारा अगस्त 2016 से नवंबर 2020 के बीच रविशंकर विश्वविद्यालय उप डाकघर में बचत अभिकर्ता भूपेन्द्र पाण्डेय एवं आकांक्षा पाण्डेय के माध्यम से कुल 19 टर्म डिपॉजिट रसीद (ञ्जष्ठक्र) खाते और 2 आवर्ती जमा (क्रष्ठ) खाते खुलवाए गए थे। इन सभी खातों में जमा कुल राशि लगभग 1.97 करोड़ रुपये थी, जो परिवार की वर्षों की मेहनत और बचत का परिणाम थी।
पीडि़त परिवार का आरोप है कि पूर्व में परिपक्व हुए खातों की राशि को पुन: निवेश करने के लिए आवश्यक प्रपत्रों पर उनसे हस्ताक्षर कराए गए और पोस्टमास्टर के नाम से चेक भी जारी कराए गए। इसके बाद उन्हें नई पासबुकें प्रदान की गईं, जिन पर डाकघर की आधिकारिक मुहर और पोस्टमास्टर के हस्ताक्षर अंकित थे। इससे खाताधारकों को यह विश्वास हो गया कि उनकी राशि सुरक्षित है और नियमानुसार निवेशित की जा चुकी है। हालांकि, बाद में यह सामने आया कि एजेंट भूपेंद्र पांडे ने डाकघर के कुछ कर्मचारियों ने आपसी मिलीभगत से खाताधारकों की जानकारी और अनुमति के बिना खातों से भारी रकम का आहरण कर लिया। पीडि़तों ने जब इस अनियमितता को लेकर डाक विभाग में लिखित शिकायत दर्ज कराई, तब भी विभाग की ओर से न तो उन्हें कोई स्पष्ट जानकारी दी गई और न ही संदिग्ध खातों को समय रहते होल्ड किया गया। इस लापरवाही से पीडि़तों को भारी आर्थिक और मानसिक क्षति उठानी पड़ी।
मामले की सुनवाई आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति गौतम चौरडिय़ा एवं सदस्य प्रमोद कुमार वर्मा की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के दस्तावेजों, पासबुक, खाता विवरण और शिकायत रिकॉर्ड का गहन परीक्षण किया गया। आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि पासबुक जारी करना, उस पर पोस्टमास्टर के हस्ताक्षर और डाकघर की मुहर लगना तथा खातों से राशि का आहरण ये सभी प्रक्रियाएं विभागीय कर्मचारियों की संलिप्तता के बिना संभव नहीं हैं। आयोग ने यह भी माना कि एजेंट की भूमिका संदिग्ध होने के बावजूद डाक विभाग द्वारा उसके खिलाफ समय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जो सीधे तौर पर सेवा में गंभीर कमी को दर्शाता है।
सभी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आयोग ने परिवाद को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए परिवादी के 18 टीडीआर खातों की परिपक्वता राशि का भुगतान करने का आदेश पारित किया। आदेश के अनुसार, भारतीय डाक विभाग को 45 दिनों के भीतर पीडि़त परिवार को कुल 1 करोड़ 91 लाख 39 हजार 965 रुपये का भुगतान करना होगा। इसके साथ ही परिवाद प्रस्तुत किए जाने की तिथि 20 नवंबर 2023 से भुगतान की तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी देना होगा। इतना ही नहीं, आयोग ने पीडि़त परिवार को हुई मानसिक पीड़ा, तनाव और उत्पीडऩ को ध्यान में रखते हुए 1 लाख रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में तथा 15 हजार रुपये वाद व्यय के रूप में भी भुगतान करने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने अपने आदेश में यह भी संकेत दिया कि इस प्रकार की घटनाएं आम नागरिकों के डाक व्यवस्था पर भरोसे को गहरा आघात पहुंचाती हैं। राज्य उपभोक्ता आयोग के इस फैसले को डाक विभाग में पारदर्शिता, जवाबदेही और उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय न केवल पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने वाला है, बल्कि भविष्य में इस तरह के घोटालों पर अंकुश लगाने के लिए भी एक मजबूत संदेश देता है।
पत्नी के नाम से एजेंसी लेकर गबन करता रहा पांडे, देनदारी बढ़ी तो जान दे दी
भूपेंद्र पांडे ने पत्नी आकांक्षा पांडे के नाम से अल्प बचत अभिकर्ता के रूप में पंजीकृत किया था। और पूरा कारोबार भूपेंद्र स्वयं करता था। अपने सहयोग के लिए उसने एक सहकर्मी प्रीतम सिंह ठाकुर को भी रखा था। दोनों ने मिलकर यह गड़बड़ी 2014 से 21 तक की। भूपेंद्र,अपने ग्राहकों से हर माह सेविंग की किश्तें लेता लेकिन डाकघर के लेजर में इंट्री व कर केवल पासबुक में एंट्री कर रकम गबन करता रहा। यह एंट्रियां भी डाक कर्मियों के बजाय वह या उसका कर्मचारी करता था। और खाते मेच्योर होने पर विथड्रा भी करता रहा।इस तरह से कुल 50 लोगों के साथ करोड़ों धोखाधड़ी की गई। जब देनदारी बढ़ती गई और बचतकर्ताओं का दबाव बढ़ा तो भुगतान में असक्षम भूपेंद्र ने बिलासपुर में ट्रेन से कटकर जान दे दी। इसके बाद ग्राहकों ने डाक विभाग पर केस किया तो विभाग ने एजेंट की जिम्मेदारी बता पहले तो हाथ खड़े कर दिए थे। उपभोक्ता आयोग का यह फैसला विभाग की भुगतान में हिस्सेदारी साबित करने के लिए काफी है।


