रायपुर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 31 अगस्त। रायपुर प्रेस क्लब में दिल्ली से वापस लौटे बस्तर के नक्सल पीडि़तों ने प्रेस वार्ता कर अपनी व्यथा रखी। इन पीडि़तों ने उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बी. सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी का विरोध करते हुए सभी सांसदों से उन्हें समर्थन नहीं करने की अपील की है।
सियाराम रामटेके ने कहा कि यदि सुदर्शन रेड्डी ने यह फैसला नहीं दिया होता, तो संभवत: उनके साथ वो घटना ही नहीं होती। उन्होंने बताया कि वो एक दिव्यांग की जिंदगी जी रहे हैं। सियाराम कहते हैं कि जब उन्हें पता चला कि सुदर्शन रेड्डी उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बनाए गए हैं, तब उन्हें ना सिर्फ आक्रोश आया बल्कि वो आहत भी हुए।
केदारनाथ कश्यप का कहना है कि माओवादियों ने सलवा जुडूम बंद होने के बाद ही उनके भाई की नृशंसता से हत्या की थी। यदि 2011 में सलवा जुडूम के विरुद्ध फैसला नहीं आता तो शायद 2014 तक उनके क्षेत्र से नक्सली भाग चुके होते और उनके भाई के साथ कभी ये हादसा नहीं होता।
नक्सल हिंसा में शहीद हुए जवान मोहन उडक़े की विधवा पत्नी ने बताया कि जब उनके पति बलिदान हुए तब उनके गोद में 3 महीने की बच्ची थी, जिसने कभी अपने पिता को देखा ही नहीं।
चिंगावरम हमले के पीडि़त महादेव दूधी ने बताया कि कैसे माओवादियों ने दंतेवाड़ा से जा रही आम यात्री बस को निशाना बनाया, जिसमें 32 लोग मारे गए। वहीं इस हमले में महादेव ने अपना एक पैर खो दिया। आज वो अपाहिज की जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
बस्तर शाति समिति के जयराम ने कहा कि पीडि़त यही चाहते हैं कि देश सांसद ऐसे किसी भी व्यक्ति का समर्थन ना करें जिन्होंने उनकी जिंदगी को और बस्तर की शांत भूमि को नर्क बना दिया। मंगऊ राम कावड़े का कहना है कि बस्तर में ऐसे हजारों परिवार हैं जो सलवा जुडूम पर प्रतिबंध लगने के कारण प्रताडि़त हुए और नक्सल आतंक का दंश झेला, और आज वो सुदर्शन रेड्डी की इस उम्मीदवारी से बेहद आहत हैं।


