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बेकसूर देशों पर हमले का अमरीकी इतिहास, लेकिन इस बार एपस्टीन...
सुनील कुमार ने लिखा है
01-Mar-2026 4:14 PM
बेकसूर देशों पर हमले का अमरीकी इतिहास, लेकिन इस बार एपस्टीन...

आज जिस वक्त मैं यह लिखने बैठा हूं, ईरान पर अमरीकी और इजराइली हमले चल रहे हैं। मुस्लिमों के लिए रमजान का महीना चल रहा है, जो उनके लिए साल का सबसे पवित्र त्यौहार रहता है, और ऐसे में जगह-जगह लाशें बिखरी हुई हैं। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता, और सरकार के नीति निर्धारक आयतुल्लाह अली खामेनेई की अमरीकी बमबारी में मौत हो चुकी है, और अपने करीब आधा लाख सैनिकों की खाड़ी के देशों में मौजूदगी को भी खतरे में डालकर अमरीका इस जंग को आगे बढ़ाते चल रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में अपने पिछले एक राष्ट्रपति बराक ओबामा की ईरान के साथ की गई परमाणु संधि को तोड़ दिया था, और इसके साथ ही  अब ईरान पर हमला करने के लिए उसने एक बहाना ढूंढ लिया था। जबकि अमरीकी खुफिया मामलों की मुखिया, ट्रम्प की करीबी, तुलसी गेबार्ड का ताजा बयान है कि ईरान परमाणु बम बनाने के करीब पहुंचा हुआ हो, ऐसे कोई संकेत या खुफिया जानकारी नहीं है।

अमरीका के इतिहास को देखें, तो आज सुबह वहां के एक डेमोक्रेटिक सांसद बर्नी सैंडर्स का ताजा बयान देखने की जरूरत है जिन्होंने ईरान पर किए गए अमरीकी हमले का खुला विरोध करते हुए कहा है कि ट्रम्प को एक और बेदिमाग जंग अमरीकी जनता पर थोपने का मौका नहीं देना चाहिए। उन्होंने अमरीकी हमले को लेकर कहा है- अमरीकी जनता को वियतनाम के बारे में झूठ कहा गया, उसे इराक के बारे में झूठ कहा गया, और उसे आज फिर ईरान के बारे में झूठ कहा जा रहा है। इन सबके दाम आम अमरीकी नागरिक चुकाएंगे। उन्होंने इस अमरीकी हमले को एक पूरी तरह से गैरकानूनी, और असंवैधानिक ठहराया है, और कहा है कि अमरीकी संविधान इस बारे में एकदम साफ है कि कोई राष्ट्रपति अपनी मनमानी से जंग शुरू नहीं कर सकता, यह हक अमरीकी संसद के पास है। उन्होंने सांसदों से अपील की कि तुरंत ही संसद का सत्र बुलाया जाए, और जंग के अधिकार के लंबित प्रस्ताव पर वोट करवाया जाए। उन्होंने कहा कि यह हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों के एकदम खिलाफ है, और सर्वशक्तिमान की मनमानी कोई जायज हक नहीं रहती। उन्होंने साफ-साफ कहा कि ट्रम्प को अमरीका को ऐसे बेदिमाग जंग में घसीटने की इजाजत नहीं देना चाहिए।

मैं अभी ईरान के ताजा तनावों तक इस बात को सीमित रखना नहीं चाहता। अमरीका के हमलावर इतिहास पर एक नजर डालने पर साफ दिखता है कि दुनिया के किसी देश में साम्यवाद पनप न सके, जम न सके, या बढ़ न सके, इसलिए अमरीका ने जाने कितने ही फौजी हमले किए। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के शीत युद्ध के दौरान अमरीका ने वियतनाम पर हमला किया, और उस पर द्वितीय विश्वयुद्ध से भी ज्यादा बम बरसाए। एक अंदाज यह है कि 25-30 लाख वियतनामी लोग मारे गए, और अमरीका ने नापाम बम से लेकर एजेंट ऑरेंज तक रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए, जिससे आज भी वहां पैदा होने वाली पीढ़ी बहुत बुरी तरह शारीरिक दिक्कतों के साथ पैदा हो रही है। दस बरस से ज्यादा की इस जंग में अमरीका आधा लाख से अधिक सैनिकों को खोकर, हारकर पीछे हटा। कम्युनिज्म रोकने के बहाने से अमरीका ने वियतनाम पर हमला किया था, जो कि इसलिए नाजायज था कि वियतनाम ने कभी अमरीका पर हमला नहीं किया था।

इस दौरान अमरीका ने अड़ोस-पड़ोस के देशों पर खूब बमबारी की, लाओस पर अमरीका ने 20 लाख टन बम बरसाए, जिसमें वहां के दो लाख से अधिक नागरिक मारे गए। कम्बोडिया पर अमरीका ने पांच लाख टन बन बरसाए, और वहां भी दो-तीन लाख लोग मारे गए। ये देश अमरीका के लिए कोई खतरा नहीं थे, इन पर हमला पूरी तरह नाजायज और गैरजरूरी दोनों ही था। इसी तरह उत्तर और दक्षिण कोरिया के आपसी संघर्ष में अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र के बैनरतले फौजी कार्रवाई की, जिसमें 20-30 लाख कोरियाई नागरिक मारे गए।

ईरान में अमरीकी दखल का एक पुराना इतिहास भी है। 1953 में सीआईए ने वहां के प्रधानमंत्री को उखाड़ फेंका, क्योंकि उसने एक ब्रिटिश ऑयल कंपनी का राष्ट्रीयकरण किया था जिससे अमरीकी कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचा था। इसके बाद अमरीका ने अपने पिट्ठू शाह मोहम्मद रजा पहलवी को वहां सत्ता पर स्थापित किया, लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति में वहां से शाह और अमरीका दोनों को उखाड़ फेंका। लोगों को 2003 में अमरीका के इराक पर हमले को याद रखना चाहिए जिसमें अमरीका ने यह झूठा दावा किया था कि सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के हथियार हैं। बाद में जब अमरीका ने इराक पर कब्जा किया, सद्दाम हुसैन को एक फर्जी अदालती सुनवाई का नाटक करते हुए मार डाला, तब जाकर यह पता लगा कि इराक के पास एक मुर्गी मारने जितना भी जनसंहार का हथियार नहीं था। यह पूरा हमला इस इलाके को अस्थिर करने के लिए, और तेल के कारोबार पर कब्जा करने के लिए किया गया था।

न्यूयॉर्क पर ओसामा-बिन-लादेन के हवाई हमले के बाद अमरीका ने अफगानिस्तान में तालिबानों पर हमला किया, 2001 से 2021 तक वहां अपना फौजी कब्जा रखा, लेकिन ढाई हजार अमरीकी सैनिकों, और ढाई लाख अफगानी लोगों की मौत के बाद अमरीका अफगानिस्तान को छोडक़र जान बचाकर भाग निकला। न्यूयॉर्क पर हमला अल-कायदा ने किया था, न कि अफगानिस्तान ने, और अब यह पूरा देश तबाह करके अमरीका तो भाग गया, लेकिन वहां की महिलाओं की जिंदगी 20 बरस पहले के मुकाबले भी नर्क हो गई है।

अमरीका के हमलों, और सरकार पलटने की लिस्ट बहुत लंबी है। वह लीबिया, सीरिया, यमन, ग्वाटेमाला, चीली, निकरागुआ, सोमालिया, ग्रेनाडा,  पनामा, और अब वेनेजुएला तक बिखरी हुई है। इनमें से किसी भी जगह अमरीकी हमलों ने उस देश का भला नहीं किया, वहां की जनता को कोई बेहतर सरकार नहीं दी, सिर्फ अपनी गुंडागर्दी दिखाई, उस देश के वामपंथ को खत्म करने की कोशिश की, या वहां के प्राकृतिक साधनों पर कब्जा करने की। लोग अब याद कर रहे हैं कि अमरीका ने किस तरह दुनिया पर ऐसे बम बरसाए, जो कि इतिहास में सिर्फ उसी ने बरसाए हैं। लोगों को हिरोशिमा-नागासाकी कैसे भूल सकता है?

दुनिया का यह सबसे बड़ा गुंडा अब फिर चारों तरफ कारोबारी, और फौजी मोर्चे पर परले दर्जे की गंडागर्दी कर रहा है, और बदअमनी से दुनिया में लाखों जिंदगियां छीन रहा है। मध्य-पूर्व और खाड़ी के देशों में वह अपने गिरोह के उस इलाके के रंगदार, इजराइल को बढ़ावा देने के लिए ईरान पर यह ताजा हमला कर रहा है, और जिस मौके पर मुस्लिम देशों में धार्मिक भावनाएं उभार पर रहती हैं, ट्रम्प बम बरसा रहा है।

अभी कुछ महीने पहले ही ईरान के परमाणु ठिकानों पर बरसाए गए बमों की तबाही से ईरान अभी उबरा भी नहीं था, कि यह ताजा हमला ट्रम्प ने कर दिया। इस बारे में यह समझने की जरूरत है कि एपस्टीन फाइल्स में नाबालिग लड़कियों के साथ सेक्स को लेकर ट्रम्प का नाम जितने खुलासे से हजारों बार सामने आ रहा है, उस तरफ से ध्यान बंटाने के लिए ट्रम्प के इस पास इस बमबारी के अलावा और कोई दूसरा जरिया भी नहीं था। पहले ही दिन की बमबारी में ईरान में बच्चियों के एक स्कूल पर बम बरसाए गए हैं, जिनमें सौ-पचास छोटी-छोटी बच्चियों की मौत हो चुकी है। इस सिलसिले को इसी तरह समझने की जरूरत है कि एक बलात्कारी खबरों से अपने नाम को हटाने के लिए सैकड़ों और हजारों मौतों की मदद ले रहा है कि वे खबरें तो उसके अपने सेक्सकांड की खबरों को दबा ही देंगी।   (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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