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ट्रम्प के दिमाग में झांककर देखना, मनोवैज्ञानिकों के लिए भी डरावना!
सुनील कुमार ने लिखा है
05-Apr-2026 4:34 PM
ट्रम्प के दिमाग में झांककर देखना,  मनोवैज्ञानिकों के लिए भी डरावना!

अपने इस दूसरे कार्यकाल में आने के पहले से डॉनल्ड ट्रम्प की दिमागी हालत की नुमाइश, चाहे-अनचाहे कर रहे थे, वह लोगों को उनके बारे में सोचने को मजबूर कर रही थी। लेकिन अब जब वे दुनिया के सबसे ताकतवर देश के बेताज तानाशाह की तरह पूरी दुनिया को अपनी लाठी से हांक रहे हैं, तो लोग उन्हें कुछ अधिक गौर से देख रहे हैं। लोगों से हमारा मतलब दुनिया के आम लोग नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने वाले लोगों से है, जिनमें से दो सौ लोगों ने एक खुली चिट्ठी लिखकर ट्रम्प के खतरों से अमरीका, और बाकी दुनिया को आगाह किया था। इस चिट्ठी में इन दो सौ मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। लेकिन इस चिट्ठी से परे के और विशेषज्ञों ने भी अपनी राय अलग-अलग जगहों पर सामने रखी है।

आज की इस बात को इस चिट्ठी को लेकर ही आगे बढ़ाएं, तो उन्होंने लिखा था- जनता को चेतावनी देना हम अपना नैतिक दायित्व समझते हैं। डॉनल्ड ट्रम्प के व्यवहार के हजारों घंटों के अवलोकन, और उनके सार्वजनिक कार्यों के विश्लेषण के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि वे देश का नेतृत्व करने के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह अनुपयुक्त हैं।

आगे लिखा गया है- ट्रम्प में मैलिग्नेंंट नार्सिसिज्म के स्पष्ट लक्षण हैं जो कि एक लाइलाज व्यक्तित्व विकार है। यह उन्हें धोखेबाज, विनाशकारी, और खतरनाक बनाता है। उनके भीतर सहानुभूति की कमी है, और वे महज अपनी प्रशंसा और सत्ता के भूखे हैं। मानसिक विकारों की मानक निर्देशिका के आधार पर ट्रम्प समाजविरोधी व्यक्तित्व विकार (डिसऑर्डर) के मानदंडों को पूरा करते हैं। उनके जीवन का पैटर्न सामाजिक मानदंडों, और कानूनों को तोडऩे, बार-बार झूठ बोलने, दूसरों की हिफाजत की परवाह न करने, और अपने गलत किए पर पछतावा न होने का रहा है।

इन्होंने इस चिट्ठी में आगे लिखा है- हम उनके भाषणों और रैलियों में मानसिक गिरावट के लक्षण देख रहे हैं। वे अक्सर काल्पनिक पात्रों को वास्तविक मान लेते हैं, शब्दों को भूल जाते हैं, और असंगत बातें करते हैं। उनकी यह अस्थिरता परमाणु हथियार संपन्न देश के कमांडर-इन-चीफ के लिए अत्यंत जोखिमभरी है। उनकी मानसिक स्थिति उन्हें एक तानाशाह की तरह व्यवहार करने के लिए उकसाती है। वे विरोधियों को अपना दुश्मन मानते हैं, और समाज में नफरत, और डर फैलाकर अपनी सत्ता बचाए रखना चाहते हैं। एक ऐसा व्यक्ति जो वास्तविकता और कल्पना के बीच का अंतर नहीं समझ सकता है, उसे कभी भी परमाणु बटन के पास नहीं होना चाहिए। हमारा स्पष्ट निष्कर्ष है कि ट्रम्प मानसिक रूप से बीमार हैं, और स्वभाव से राष्ट्रपति के कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ हैं। उनकी स्थिति समय के साथ और बिगड़ती जा रही है, जो न केवल अमरीका, बल्कि पूरी दुनिया को एक विनाशकारी तृतीय विश्वयुद्ध की ओर धकेल सकती है।

अमरीका के एक जाने-माने प्रोफेसर, और ‘ड्यूटी टू वॉर्न’ के संस्थापक डॉ.जॉन गार्टनर ने खुलकर कहा है कि ट्रम्प में दुष्ट आत्ममोह के साथ-साथ संज्ञानात्मक गिरावट के स्पष्ट लक्षण दिख रहे हैं, और वे मानसिक रूप से स्वस्थ हालत में इस कार्यकाल को पूरा नहीं कर पाएंगे। दुष्ट आत्ममोह (मैलिग्नेंट नार्सिसिज्म) में चार खतरनाक तत्व जुड़े होते हैं, आत्ममोह, मनोरोग, अदृश्य भय (पैरानोइया) और सैडिज्म (दूसरों को दुख देकर सुख पाना)। अमरीकी मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ट्रम्प किसी भी असहमति को सरकार के भीतर की एक साजिश, या देशद्रोह कहकर खारिज कर देते हैं। और सत्ता पर बने रहने के लिए निरंतर भारी बाहरी तारीफ की उनकी हवस पूरी ही नहीं होती है। ट्रम्प की भतीजी मैरी ट्रम्प जो कि खुद क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक हैं, उन्होंने अभी जनवरी में सीएनएन को एक इंटरव्यू में कहा था कि उनके चाचा की हालत बद से बदतर होती जा रही है। उन्होंने परिवार की पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि ट्रम्प बचपन से ही असुरक्षा, और लगातार उनसे सहमति की भूख के शिकार रहते आए हैं। सत्ता की उनकी आज की लत ने उनकी मौजूदा हालत को और बुरा बना दिया है।

इसी फरवरी में हुए एक भरोसेमंद सर्वे में 61 फीसदी अमरीकियों ने यह माना कि ट्रम्प उम्र के साथ-साथ अब सनकी हो गए हैं। रिपब्लिकन पार्टी के लोगों में भी 30 फीसदी लोग इससे सहमत थे। डॉ.गार्टनर कहते हैं कि ट्रम्प के भाषण में झूठ को सच मानकर बार-बार दोहराना, विषय बदलते रहना, और याददाश्त की कमी साफ दिख रही है। आज अमरीकी मनोवैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी चुनौती अमरीका में प्रचलित गोल्डवॉटर रूल है, जिसके तहत बिना व्यक्तिगत जांच किए हुए किसी की बीमारी पर कोई राय नहीं दी जा सकती। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ईरान युद्ध के दौरान अपने ही साथियों, नैटो देशों के खिलाफ ट्रम्प का हमलावर होना उनके पैरानोइया होने का सुबूत है, जो कि हर किसी को अपना दुश्मन समझने का मानसिक विकार है। विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव हारने पर ट्रम्प ने 6 जनवरी के संसद पर हमले को जिस खुशी के साथ बार-बार टीवी पर देखा था, और जैसी प्रतिक्रिया जाहिर की थी, उससे उनका सैडिस्टिक स्वभाव साफ दिखता है कि वे दूसरों की तकलीफ में खुशी महसूस करते हैं।

कुछ दूसरे न्यूरोसाइंटिस्ट और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ट्रम्प कनफैब्युलेशन के शिकार हैं। यह झूठ बोलने से कुछ अलग मानसिक विकार है जिसके शिकार लोग खुद अपनी बनाई हुई कहानियों पर भरोसा करने लगते हैं, चाहे वे कितनी ही नामुमकिन क्यों न हों। जैसे कि ट्रम्प का बार-बार यह कहना कि उन्होंने अकेले ही जंग जीत ली है। वे इंसिस्टेंस के शिकार हैं, यानी एक ही बात को बार-बार दोहराते हैं, और जंग में अपनी कामयाबी की लिस्ट को बार-बार एक ही लय में दोहराना उनके दिमाग के लूप में फंस जाने का संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प हाइपोमेनिक हैं, यानी वे बहुत कम नींद में भी अत्यधिक ऊर्जा पाते हैं, और यही ऊर्जा उन्हें इम्पल्सिव बनाती है। वे आनन-फानन फैसलों की मुनादी कर देते हैं, न किसी सलाह की परवाह, न नतीजे की फिक्र। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ट्रम्प प्रेजेंट-हेडोनिज्म के शिकार हैं, यानी वे भविष्य के विनाश के बजाय अपनी तात्कालिक जीत और वाहवाही पर ध्यान देते हैं।

यह सब कहने वाले मनोवैज्ञानिक और विश्लेषक यह तो मानते हैं कि गोल्डवॉटर रूल के तहत बिना व्यक्तिगत जांच के बीमारी के बारे में नहीं कहना चाहिए, लेकिन जनता को चेतावनी देने का दायित्व इस नियम से बड़ा है। उनका मानना है कि ट्रम्प इस समय एक अपरिवर्तनीय गिरावट की हालत में है, और उनका दिमाग जटिल रणनीतियों (जैसे वैश्विक मंदी, या सैन्य गठबंधन) को समझने की क्षमता खो चुका है। जाने-माने विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रम्प अब महज एक राजनेता नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक इमरजेंसी हैं। उनका असामान्य दिमाग अब सलाहकारों को सुनने के बजाय जी-हुजूरों के घेरे में रहता है, जिससे उनके फैसले और अधिक घातक होते जा रहे हैं। एक बड़े विश्लेषक का कहना है कि ट्रम्प जितनी रफ्तार से अपना दिमाग, और अपने फैसले बदलते हैं, वह या तो असुरक्षा से उपजा है, या चीजों, और स्थितियों की शिनाख्त और उन्हें समझने की उनकी ताकत कमजोर हो चुकी है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ट्रम्प के इस दिमागी शून्य का फायदा उनके आसपास के जंगखोर लोग उठा रहे हैं, जो अपनी आक्रामक विदेश नीति को बढ़ा रहे हैं, क्योंकि ट्रम्प कुछ समझ पाने में असमर्थ है। डॉ.गार्टनर का मानना है कि कमजोर याददाश्त, और लाइलाज आत्ममुग्धता के चलते ट्रम्प अधिक अनिश्चित, अधिक आक्रामक, और कम समझदार हो चुके हैं, और वे यह कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे।

 

अमरीकी संविधान में राष्ट्रपति को लेकर अमरीकी लोकतंत्र के हाथ रस्सी से मजबूती से बांध रखे हैं। राष्ट्रपति को ऐसी नौबत में भी हटाना वहां पर मुमकिन नहीं है। हमने वहां की संवैधानिक संभावनाओं को देखने की कोशिश की, तो समझ पड़ा कि उपराष्ट्रपति अगर बाकी मंत्रिमंडल की सहमति से यह घोषित करे, कि राष्ट्रपति अब दफ्तर संभालने की दिमागी हालत में नहीं है, तो ऐसी हालत में उपराष्ट्रपति खुद सत्ता संभाल सकते हैं। लेकिन आज के उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस बहुत फूंक-फूंककर चल रहे हैं क्योंकि वे ट्रम्प के खिलाफ ऐसी कोई असाधारण संवैधानिक कार्रवाई करके, ट्रम्प-समर्थकों की नाराजगी झेलना नहीं चाहते हैं। दूसरा विकल्प अमरीकी संसद के पास हैं कि वह राष्ट्रपति की दिमागी हालत को लेकर, और उनके फैसलों को कटघरे में खड़ा करके उनके खिलाफ महाभियोग चलाए। लेकिन आज अमरीकी संसद में रिपब्लिकन पार्टी चाहे अनमने ढंग से, लेकिन ट्रम्प के साथ खड़ी है, और वहां ट्रम्प विरोधी डेमोक्रेट को संख्या की ताकत नहीं मिलने वाली है। अब अमरीकी संसद में एक और विकल्प पर चर्चा हो रही है जिसे राष्ट्रपति की क्षमता को आंकने के एक आयोग का प्रावधान है। अगर संसद इस पर सहमत हो सकती है, तो मनोचिकित्सक, डॉक्टर, और रिटायर्ड नेताओं में से दस सदस्यों का एक आयोग बनाया जाएगा, जो राष्ट्रपति की शारीरिक और मानसिक जांच करेगा, और संसद को रिपोर्ट देगा। यह संवैधानिक विकल्प मंत्रिमंडल के बहुमत की मजबूरी से परे का है, लेकिन ट्रम्प इस फैसले के खिलाफ राष्ट्रपति के असीमित विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं, और अपने निजी चिकित्सक की रिपोर्ट को पेश कर सकते हैं, जो कि अभी कुछ अरसा पहले ट्रम्प को दुनिया का सबसे फिट राष्ट्रपति करार दे चुका है।

ट्रम्प की दिमागी हालत को लेकर फिक्र इसलिए है कि यह बेदिमाग और बददिमाग आदमी हाथ बढ़ाकर परमाणु बटन को दबा सकता है। आज फौज के बहुत से लोग भी इसी फिक्र में डूबे हैं कि छोटी-छोटी बातों को लेकर ट्रम्प जिस तरह देश के सबसे बड़े फौजी और दूसरे सरकारी ओहदों पर बैठे लोगों को बर्खास्त कर रहा है, वैसे में वह परमाणु हथियार इस्तेमाल करने से रोकने वाले को भी बर्खास्त कर सकता है, और ऐसे हथियार चला देने तक तो वह देश में किसी को भी गिरफ्तार भी कर सकता है। आज न सिर्फ अमरीका बारूद के ढेर पर है, बल्कि पूरी दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है, और उससे कुछ दूरी पर बैठा ट्रम्प माचिस और लाइटर से खेल रहा है। बहुत अधिक लोकतंत्र का दावा करने वाला अमरीका आज किस तरह एक मानसिक विचलित, और बीमार तानाशाह के विस्फोटकों पर बैठा हुआ है यह देखना बाकी दुनिया को भी डरावना इसलिए भी लगता है कि अमरीका से बाकी पूरी दुनिया के हित भी गहराई से जुड़े हुए हैं। आगे-आगे देखें, होता है क्या। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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