आजकल
भारत सरकार के मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं के ताजा आंकड़े हैरान-परेशान करने वाले हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक देश में दस फीसदी लोग मानसिक उलझनों और दिक्कतों के शिकार हैं, और इनमें से 90 फीसदी को सही इलाज नहीं मिलता, क्योंकि उसकी क्षमता ही नहीं है। हालत यह है कि पिछले पांच साल में केन्द्र सरकार ने जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए जो बजट मंजूर किया था, राज्यों ने उसका आधा भी इस्तेमाल नहीं किया, और समाज तरह-तरह की हिंसा झेल रहा है, आत्मघाती कुंठाओं का शिकार है, हिंसा के आंकड़ों से परे लोग मानसिक समस्याओं को झेल रहे हैं जो कि दिखती नहीं है, और राज्यों की दिलचस्पी उन्हें मिले बजट को खर्च करने में भी नहीं है। 2020 से 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि किसी भी बरस राज्य केन्द्रीय बजट का आधा भी खर्च नहीं कर पाए। लेकिन इन सबसे और भयानक बात यह है कि देश में मनोचिकित्सकों को उंगलियों पर गिना जा सकता है। 140 करोड़ आबादी के लिए कुल 8-10 हजार मनोचिकित्सक ही उपलब्ध हैं, और इनमें से भी अधिकतर की मौजूदगी चुनिंदा शहरी इलाकों तक सीमित है। यह आखिरी का तर्क सरकारी आंकड़ों पर आधारित नहीं है, लेकिन हमारे नजरी सर्वे से ऐसा दिखता है। दुनिया में एक लाख मरीजों पर वैश्विक औसत 1.3 मनोचिकित्सकों का है, और इस औसत में दुनिया के सबसे कमजोर और फटेहाल देश भी शामिल हैं। लेकिन भारत में यह औसत लाख मरीजों पर 0.75, यानी पौन मनोचिकित्सक का है। आंकड़ों में एक आखिरी आंकड़ा गिनाना और जरूरी है, वह है मध्यप्रदेश में एक लाख आबादी के लिए सिर्फ 0.05 मनोचिकित्सक हैं, जबकि केरल में उनकी गिनती प्रति लाख 1.2 है, जो कि वैश्विक स्तर के एकदम करीब है।
अब देश में सबसे ज्यादा शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश केरल को देखें, तो वहां देश का दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के मुकाबले औसतन 24 गुना मनोचिकित्सक प्रति लाख आबादी पर हैं। अब हम यह सोचते हैं कि मध्यप्रदेश में मनोचिकित्सा को अवांछित, या अवैध संतान क्यों मान लिया गया है? क्यों ऐसा मान लिया गया है कि यह शायद कोई पश्चिमी प्रभाव है, और भारतीय संस्कृति वाले प्रदेश में मनोचिकित्सकों को इतना गैरजरूरी कैसे मान लिया गया है? जिस केरल और असम में अभी चुनाव होने जा रहे हैं, वहां असम में यह आंकड़ा 0.29 प्रति लाख है, और केरल में 1.20, यानी सीधे-सीधे चार गुना। और असम में भी मध्यप्रदेश की तरह भाजपा की सरकार है। छत्तीसगढ़ के आंकड़े और अधिक फिक्र पैदा करते हैं, जो कि असम से भी आधे से कम हैं, इस राज्य में प्रति लाख आबादी पर 0.14 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं। राजस्थान में 0.10!
हम कोई राजनीतिक विश्लेषण किए बिना यह समझना चाहते हैं कि कौन से ऐसे राज्य हैं जिनका भरोसा मनोचिकित्सा पर है, जो उसे जरूरी समझते हैं, और कौन से ऐसे राज्य हैं जो चिकित्सा विज्ञान की इस शाखा की तरफ से पूरी तरह बेपरवाह हैं? ऐसा लगता है कि कुछ राज्यों में गैरचिकित्सकीय तौर-तरीकों पर कुछ अधिक ही भरोसा है। वहां यह मान लिया जाता है कि पूजा-पाठ, दूसरे कुछ किस्म की धार्मिक उपासना, झाड़-फूंक, धागा-ताबीज जैसी चीजों से ही मनोचिकित्सा बेहतर हो जाती है। चारों तरफ एक धार्मिक माहौल बना दिया जाता है, चारों तरफ धार्मिक प्रवचन चलते हैं, इन प्रवचनों को इतनी अधिक राजनीतिक और सामाजिक मान्यता दे दी जाती है, कि किसी और इलाज की जरूरत नहीं रह जाती। क्या यह 21वीं सदी के 26वें बरस में एक सही फैसला है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कई दशक पहले दुनिया के कुछ सबसे पिछड़े देशों में वहां के झाड़-फूंक, और बैगा-गुनिया के इलाज को यह कहते हुए अनौपचारिक मान्यता दी थी कि जहां पर और किसी भी तरह का इलाज उपलब्ध नहीं है, वहां पर वह इसे ही आस्था चिकित्सा मान लेगा। मतलब यह कि जब और कोई भी इलाज उपलब्ध नहीं है, तो लोगों को झाड़-फूंक से ही एक मानसिक शांति मिले कि उनका कोई इलाज हो गया है। लेकिन जिस छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद के 25 बरसों में बजट आकार 5 हजार करोड़ से बढक़र 170 हजार करोड़ हो गया है, वहां भी मनोचिकित्सकों की उपलब्धता वैश्विक स्तर के 10 फीसदी भी नहीं हैं, और केरल के मुकाबले तकरीबन 10 फीसदी ही है। पूरे दुनिया में महंगे निर्माण के लिए मार्बल और ग्रेनाइट भेजने वाले राजस्थान में इससे भी और कम, प्रति एक लाख 0.10 मनोचिकित्सक हैं, और हम मध्यप्रदेश में देश का सबसे नीचा औसत 0.05 प्रति लाख आबादी गिना ही चुके हैं।
भारत में आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में झाड़-फूंक जैसी तथाकथित आस्था चिकित्सा का चलन है। शहर और गांवों में धर्म और आध्यात्म के नाम पर, योग और चमत्कार के नाम पर चिकित्सा करने, मानसिक समस्याओं को सुलझाने का दावा करने वाले बलात्कारी बाबा, लुटेरे तांत्रिक, और अलग-अलग धर्मों के दूसरे-दूसरे चोगों वाले चंगाई बाबा मौजूद हैं। यह बात जाहिर है कि जब लोगों को शिक्षित-प्रशिक्षित मनोचिकित्सक हासिल नहीं होते, या वे उनकी क्षमता के बाहर के रहते हैं, तो वे पाखंडियों के झांसे और चंगुल में फंसते हैं, क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं रहता। समाज में मनोचिकित्सा की जरूरत वाले लोगों के आंकड़े सामने नहीं आते हैं, क्योंकि हत्या-आत्महत्या, और बलात्कार जैसे जुर्म से ही लोग यह मानते हैं कि किसी को मानसिक चिकित्सा की जरूरत है, या बहुत से मामलों में तो ऐसे जुर्म हो जाने के बाद भी उन्हें किसी मानसिक उलझन या समस्या से जोडक़र नहीं देखते। जब धर्म, आध्यात्म, भक्ति, करिश्मा, चमत्कार, जादू-टोना, पर लोगों का भरोसा होने लगे, तो सरकार भी एक किस्म से अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है। अंधविश्वास का यह सामाजिक ढांचा सरकार को मुफ्त में भी मिलता है, उसे न इमारतें बनानी पड़तीं, न चिकित्सक-कर्मचारी रखने पड़ते, न अखबारों में पद खाली होने, या ड्यूटी पर न पहुंचने की खबरें नहीं आतीं। सरकार को बड़ी सहूलियत रहती है।
लेकिन देश के चिकित्सकीय ढांचे में इस विकराल कमी की वजह से आबादी का एक पर्याप्त बड़ा हिस्सा जिस तरह की मानसिक चुनौतियों को झेलता है, उससे देश की खुशहाली भी प्रभावित होती है, और उत्पादकता भी। किसी देश को अगर अपनी अर्थव्यवस्था भी विकसित करनी है, तो मानसिक रूप से स्वस्थ कामगार उसके अधिक काम के रहेंगे, मानसिक सेहतमंद लोग बेहतर ग्राहक भी बनेंगे, और सरकार का कानून व्यवस्था का ढांचा भी मानसिक उलझनों से उपजी हिंसा का बोझ नहीं झेलेगा। लेकिन सरकार के फैसले आंकड़ों पर आधारित होते हैं, और जब तक किसी की मानसिक स्थिति हत्यारी या आत्मघाती न हो जाए, सरकार उसे अपनी समस्या नहीं मानती। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हाईकोर्ट कई बार मानसिक चिकित्सा को लेकर फिक्र जाहिर कर चुका है। देश में लोकतंत्र की मानसिक स्थिति ही ठीक नहीं रह गई है, और उसे विचलित होने से बचाने की ताकत सुप्रीम कोर्ट के पास भी नहीं है। ऐसे में किया क्या जाए? केरल में छत्तीसगढ़ से मनोचिकित्सकों का अनुपात साढ़े 8 गुना अधिक है। क्या यह छत्तीसगढ़ के लिए फिक्र की बात नहीं होनी चाहिए? और मध्यप्रदेश तो 24 गुना नीचे है, वह तो सिर्फ आस्था पर चलता प्रदेश दिख रहा है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


