महासमुन्द
लाखों का मिडिल स्कूल भवन 12-13 साल में जर्जर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
महासमुंद,10 जनवरी। महासमुंद जिले के बसना विकासखंड के ग्राम कपसाखूंटा का शासकीय प्राथमिक विद्यालय एवं शासकीय मिडिल स्कूल में अव्यवस्था, लापरवाही के बीच जर्जर हो चुके दो स्कूल भवनों के खंडहरनुमा तीन कमरे में 87 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैंंंं।
ग्रामीणों के अनुसार ग्राम कपसाखूंटा में शासकीय मिडिल स्कूल की शुरुआत वर्ष 2011-12 में की गई थी। इसके बाद 2012-13 में लाखों रुपए की लागत से मिडिल स्कूल भवन का निर्माण कराया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि नियमानुसार स्कूल भवनों की आयु कम से कम 50 से 60 वर्ष मानी जाती है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वर्ष 2012 में बना यह भवन साल 2025 आते-आते मात्र 12-13 साल में ही जर्जर होकर अनुपयोगी हो गया। भवन की छत से बारिश के दौरान पानी टपकने लगा, लेंटर दब गया और छत का मटेरियल टूटकर नीचे गिरने की घटनाएं सामने आईं। दीवारों में दरारें पड़ गईं। पढ़ाई के दौरान मलबा गिरने से बच्चे भयभीत रहने लगे।
बच्चों की सुरक्षा को लेकर शिकायत मिलने पर जुलाई माह आरईएस के एसडीओ नयन प्रधान ने उक्त भवन का निरीक्षण किया। भवन की जर्जर स्थिति सामने आने के बाद मिडिल स्कूल भवन में शाला संचालन बंद कर दिया गया। लेकिन इसके बाद भी अब तक भवन की मरम्मत नहीं हो सकी। वर्तमान स्थिति यह है कि गांव में एक पुराना प्राथमिक शाला का मुख्य भवन, जिसका आधा हिस्सा खपरैल और आधा हिस्सा अलबेस्टर शीट से ढंका हुआ है, एक प्राथमिक शाला का अतिरिक्त भवन मौजूद है। यानी कुल दो भवनों के मात्र तीन कमरों में ही प्राथमिक शाला और मिडिल स्कूल दोनों संचालित हैं।
इस शासकीय प्राथमिक विद्यालय में 42 छात्र तथा शासकीय मिडिल स्कूल में 45 छात्र इस तरह कुल 87 बच्चे अध्ययनरत हैं। प्राथमिक विद्यालय में 2 शिक्षक और मिडिल स्कूल में 3 शिक्षक पदस्थ हैं। लेकिन भवन की कमी के कारण शिक्षण व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित है। प्राथमिक स्तर पर पहली से पांचवीं तक की कक्षाएं संयुक्त रूप से संचालित की जा रही हैं। जबकि मिडिल स्कूल में, जहां विषयवार और कक्षावार पढ़ाई अनिवार्य होती है, वहां भी दो कमरों में किसी तरह पढ़ाई कराई जा रही है।
बच्चे कह रहे हैं कि एक ही परिसर में कई कक्षाओं की पढ़ाई होने से एकाग्रता भंग होती है। शैक्षणिक माहौल बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि इस अव्यवस्था का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और मानसिक विकास पर पड़ रहा है। समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो शिक्षा का अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसे दावे केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे।


