महासमुन्द
यह बहुत मजबूत होता है, इसलिए मांग सबसे अधिक
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
महासमुंद, 25 अगस्त। महासमुन्द जिले के विकासखण्ड की ग्राम पंचायत ओंकारबंद की जय मां खल्लारी स्वसहायता समूह से जुड़ी रुखमणी पारधी, शिवबती खेती किसानी के साथ-साथ छिंद के पत्ते से झाड़ू, चटाई एवं अन्य घरेलू सामग्री बनाने का काम करती हमै। वे कहती हैं कि इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।
वे कहती हैं कि जंगल, खेतों की मेढ़ या तालाबों की मेढ़ पर छिंद का पेड़ मिल ही जाता है। चूंकि इसके पत्ते की नोक कांटेनुमा होती है, इसलिए इसे बहुत सुरक्षित ढंग से काटकर घर लाने के बाद ही आकार देते हैं। डलिया, टोकरी, झाड़ू, के अलावा शादी सीजन में मौरी बनाने का काम भी छिंद के पत्तों से किया जाता है।
मालूम हो कि महासमुंद जिले में प्राकृतिक झाड़ू का अपना एक खास महत्व एवं स्थान है। यहां कुछ विशेष प्रकार की झाड़ुओं का चलन है। इसमें सबसे अधिक लोकप्रिय घास, छिंद के पत्ते आदि से बनने वाले झाड़ू प्रमुख हैं। झाड़ूू उन उत्पादों की श्रेणी में आता है, जिसकी मांग वर्ष भर लगभग एक जैसी ही बनी रहती है। वैसे तो शहरों में सबसे अधिक मांग सिंक झाड़ू हार्ड ब्रूम एवं फूल झाड़ू सॉफ्ट ब्रूम का है। किंतु ग्रामीण इलाकों में आज भी छिंद पत्ते की झाड़ू की मांग सबसे अधिक है। यह बहुत मजबूत होता है और मिट्टी के घरों की सफाई बहुत बढिय़ा होती है। इस सबसेे इतर यह सभी झाड़ुओं से कम कीमत पर उपलब्ध हो जाती है। इन झाड़ुओं का निर्माण अधिकतर पारधी समाज की महिलाएं ही करती हैं।
हालांकि बदलते हुए समय के साथ बिजली से चालित उपकरण भी चलन में आ गए हैं, जो साफ. सफाई को अधिक सरल बना देते हैं। लेकिन झाड़ू आज भी सबसे सस्ता एवं सुलभ संसाधन है। महासमुंद जिले की ग्रामीण महिलाएं अपने रोजमर्रा कामकाज एवं खेती किसानी के साथ प्राकृतिक छिंद के पत्ते से विभिन्न आकर की झाड़ू बनाती है। यह उनका पारम्परिक व्यवसाय है। अब यह राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान से जुडक़र जिले की कई महिलाओं के लिए आय का जरिया भनी हुई हैं। जिले की इच्छुक महिलाओं को छिंद से झाड़ू बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
रुखमणी कहती है-इससे अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। जंगल, खेतों-तालाबों की मेढ़ या अन्य जगह पर लगे छींद के पेड़ से पत्ते लाती है। लाने में कठिनाई होती है। तोड़े गए कटीले पत्तों को सिर पर ढोकर लाना पड़ता है। पत्ते तोडऩे के लिए हंसिया आदि का उपयोग करती है। बारिश में दूरस्थ अंचल के जंगल से पत्ते लाने में कई बाधाएं आती है। इसके अलावा पत्ते सूखने में भी समस्या आती है। इसलिए छिंद के पत्ते इक_े करने और सुखाने का काम मई के अंत तक कर लेते हैं। वैसे झाड़ू बनाने का काम कुछ दिन बारिश को छोड़ कर बारह महीने होता है।
इसी तरह शिवबती कहती हैं-जिले के गांवों में कमरे, आंगन, दलान आदि कच्ची होती है। जिस पर खजूर के झाड़ू से सफाई करने में आसानी होती है। इसी कारण हाट-बाजारों से यह आसानी से बिक जाती हैं। एक झाड़ू की कीमत 25 रुपए से 50 रुपए तक है। लेकिन मेहनत को देखते हुए कम है। खेती किसानी के साथ-साथ 5से 6 हजार रुपए तक की कमाई महीने में आसानी से हो जाती है। बस आपके झाड़ू की क्वालिटी अच्छी होनी चाहिए।
दोनों का मानना है कि झाड़ू को कई तरह से बनाया जा सकता है। आपको तय करना है कि आप किस तरह का झाड़ू बनाना चाहते हैं। हम तो सडक़ के किनारे और हाट बाजारों में झाड़ू की ढेरी लगाकर अपने झाड़ू बेच लेती हैं। झाड़ू बनाने से लेकर उसे बांधने तक सारा काम खजूर के पत्ते से ही किया जाता है। झाड़ू बांधने के लिए पत्तों से ही बारीक सुतली के तरह की डोरी बनाकर इस्तेमाल किया जाता है। इस काम को करने के लिए बहुत अधिक जगह की जरूरत भी नहीं है। सबसे खास बात यह है कि इसके लिए विशेष तरह की ट्रेनिंग आदि भी जरूरत नहीं है और न ही कोई ख़ास पूंजी चाहिए। प्रकृति से लेकर ही आजीविका के लिए कोशिश होती है।


