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नयी दिल्ली, 15 जून। उच्चतम न्यायालय ने पंजाब में बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून, 2009 को लागू नहीं किये जाने का आरोप लगाने संबंधी याचिका पर सोमवार को केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा।
याचिका में केंद्र सरकार को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह पंजाब सरकार से इस कानून के प्रावधानों का प्रभावकारी और लगातार अनुपालन सुनिश्चित कराए।
इन प्रावधानों में निजी स्कूलों की पहली कक्षा में कमजोर और वंचित वर्गों के कम से कम 25 प्रतिशत बच्चों को दाखिला देना भी शामिल है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा, ‘‘क्या आप ऐसे कुछ स्कूलों की पहचान कर पाए हैं जो ऐसा नहीं कर रहे हैं?’’
न्यायालय में पेश हुए याचिकाकर्ता ने दावा किया कि पंजाब में पिछले 15 वर्षों से इस कानून के प्रावधानों को लागू नहीं किया जा रहा है।
उन्होंने उच्चतम न्यायालय के 2012 के उस फैसले का जिक्र किया, जिसमें इस कानून की वैधता को बरकरार रखा गया है।
पीठ ने राज्य सरकार की ओर से पूर्व में दाखिल किये गए एक हलफनामे का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के 450 से अधिक छात्रों को निजी स्कूलों में दाखिला दिया गया।
याचिकाकर्ता ने कहा कि यह संख्या लगभग 50,000 होनी चाहिए थी, क्योंकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हर साल प्रवेश स्तर पर लगभग दो लाख छात्रों का दाखिला होता है।
पीठ ने कहा, ‘‘हम नोटिस जारी कर रहे हैं।’’
न्यायालय ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वह कम से कम एक जिले में सर्वेक्षण करके पता लगाए कि वहां कितने निजी स्कूल हैं और उनमें से कितने स्कूल इस कानून के प्रावधानों को लागू नहीं कर रहे हैं।
याचिका में, केंद्र सरकार से यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह पंजाब में उक्त कानून की धारा 12(1)(सी) के पालन की लगातार निगरानी और उसे सुनिश्चित करने के लिए एक पारदर्शी, समय-सीमा वाली और सत्यापित किये जाने योग्य व्यवस्था बनाए।
आरटीई कानून की धारा 12, मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिए स्कूल की जिम्मेदारी तय करती है। (भाषा)


