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हाईकोर्ट ने कहा- नियमितीकरण आदेश स्वीकार करने के बाद राहत का अधिकार नहीं
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 15 जून। छ्त्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुंगेली जनपद पंचायत के एक कर्मचारी द्वारा सेवा के शुरुआती 17 वर्षों का कथित अंतर वेतन (एरियर) दिलाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि कर्मचारी ने नियमितीकरण के आदेश को बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लिया था और इसके छह वर्ष बाद न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। देरी का कोई ठोस कारण भी प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए उसे किसी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती।
यह महत्वपूर्ण आदेश न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ ने जिला पंचायत मुंगेली में लेखापाल पद पर कार्यरत रामकुमार दीक्षित की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया।
प्रकरण के अनुसार रामकुमार दीक्षित की नियुक्ति 31 जुलाई 1998 को मुंगेली जनपद पंचायत में सहायक ग्रेड-3 के पद पर हुई थी। लेकिन सामान्य सभा की स्वीकृति नहीं मिलने का हवाला देते हुए 13 नवंबर 1998 को उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी गई।
इस आदेश को उन्होंने तत्कालीन मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। वहां से उन्हें अंतरिम राहत मिली, जिसके चलते वे सेवा में बने रहे। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि बाद में सेवा संबंधी स्थिति स्पष्ट होने पर उनका नियमितीकरण किया गया था। अदालत ने पाया कि उस समय याचिकाकर्ता ने नियमितीकरण आदेश के खिलाफ कोई आपत्ति नहीं की और उसे स्वीकार कर लिया। इसके कई वर्षों बाद उन्होंने सेवा के प्रारंभिक 17 वर्षों के लिए अंतर वेतन और अन्य वित्तीय लाभों की मांग करते हुए याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने लगभग छह वर्ष की देरी के बाद याचिका दायर की, लेकिन इस विलंब के पीछे कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि लंबे समय तक चुप रहने के बाद अचानक वित्तीय लाभ की मांग करना उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि जब किसी कर्मचारी ने संबंधित आदेश को स्वीकार कर लिया हो और वर्षों तक उसे चुनौती न दी हो, तब बाद में राहत की मांग करने का आधार कमजोर हो जाता है।
सभी तथ्यों और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि देरी और नियमितीकरण आदेश को स्वीकार किए जाने की स्थिति में याचिकाकर्ता अंतर वेतन अथवा अन्य संबंधित राहत पाने का पात्र नहीं है।


