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अबूझमाड़ के युवाओं की बदली दुनिया
'छत्तीसगढ़' संवाददा
कोण्डागांव, 12 जून। एक समय ऐसा था जब अबूझमाड़ का नाम सुनते ही लोगों के मन में घने जंगल, दुर्गम रास्ते और नक्सलियों का प्रभाव याद आता था। नारायणपुर जिले के इसी अबूझमाड़ क्षेत्र के पांच आदिवासी युवाओं ने हाल ही में ऐसी दुनिया देखी, जिसके बारे में उन्होंने पहले केवल सुना था। पहली बार सिनेमा हॉल देखा, स्विमिंग पूल में नहाए, नारियल के पेड़ देखे और अब हाथ में हुनर लेकर अपने गांव लौट रहे हैं।
41वीं वाहिनी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल (आईटीबीपी) द्वारा आयोजित 14 दिवसीय नि:शुल्क आवासीय साइकिल रिपेयरिंग प्रशिक्षण कार्यक्रम ने इन युवाओं के जीवन में नई उम्मीद जगाई है। प्रशिक्षण के लिए कोण्डागांव पहुंचे युवाओं ने बताया कि, नक्सल प्रभाव के कारण वे कभी अपने गांवों से बाहर नहीं निकल पाए थे। अब जब परिस्थितियां बदली हैं तो उन्हें पहली बार शहर की सुविधाओं और अवसरों को करीब से देखने का मौका मिला।
नेलांगूर गांव के युवक वंजाराम उसेंडी ने बताया कि, आईटीबीपी उन्हें साइकिल मरम्मत का प्रशिक्षण देने के लिए कोण्डागांव लेकर आई। यहां उन्हें रहने, खाने और प्रशिक्षण की सुविधा तो मिली ही, साथ ही सिनेमा दिखाया गया और विभिन्न स्थानों का भ्रमण भी कराया गया। वंजाराम ने बताया कि, उन्होंने जीवन में पहली बार थिएटर में फिल्म देखी और पहली बार नारियल का पेड़ भी देखा। स्विमिंग पूल में नहाने का अनुभव भी उनके लिए बिल्कुल नया था।
वहीं पदमकोट क्षेत्र के रैनु सोनू वड्डे ने कहा कि, पहले उनके क्षेत्र में आने-जाने की सुविधाएं भी बेहद सीमित थीं। अब गांव में सड़क, कैंप और अन्य सुविधाएं पहुंचने लगी हैं। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें साइकिल मरम्मत का कौशल सीखने का अवसर मिला। साथ ही कपड़े, टूल किट और अन्य आवश्यक सामग्री भी दी गई। उन्होंने कहा कि अब वह अपने गांव में साइकिल रिपेयरिंग का काम शुरू कर स्वरोजगार की दिशा में आगे बढऩा चाहते हैं।
कोण्डागांव के राज सायकिल स्टोर संचालक व प्रशिक्षक योगेश अरोरा ने बताया कि अबूझमाड़ के युवाओं ने प्रशिक्षण के दौरान काफी रुचि दिखाई। नियमित अभ्यास के साथ वे अच्छे साइकिल मैकेनिक बन सकते हैं और स्वयं का रोजगार स्थापित कर सकते हैं।
आईटीबीपी 41वीं वाहिनी के इंस्पेक्टर राहुल यादव ने बताया कि माड़ क्षेत्र में नक्सल प्रभाव कम होने के बाद अब युवाओं को रोजगार और कौशल विकास से जोडऩे पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसी उद्देश्य से पांच युवाओं का चयन कर उन्हें 14 दिनों का साइकिल मरम्मत प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें केवल तकनीकी ज्ञान ही नहीं, बल्कि विभिन्न आजीविका गतिविधियों और शहरी जीवन से भी परिचित कराया गया।
प्रशिक्षण पूर्ण होने पर प्रत्येक प्रतिभागी को साइकिल रिपेयरिंग टूल किट और अन्य आवश्यक सामग्री प्रदान की गई, ताकि वे गांव लौटकर तुरंत काम शुरू कर सकें। कभी नक्सलियों के गढ़ के रूप में पहचान रखने वाले अबूझमाड़ के इन युवाओं की आंखों में अब डर नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और आगे बढऩे के सपने दिखाई दे रहे हैं। यह बदलाव केवल पांच युवाओं की कहानी नहीं, बल्कि उस बदलते अबूझमाड़ की तस्वीर है जो अब बंदूक की आवाज से नहीं, बल्कि विकास और आत्मनिर्भरता की नई राह से पहचाना जाना चाहता है।


