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हाईकोर्ट ने कहा- शिकायत में देरी के आधार पर एफआईआर समाप्त नहीं की जा सकती
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 12 जून। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्कूली छात्रा की शिकायत पर पॉक्सो अधिनियम के तहत शिक्षक के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग ठुकरा दी है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि मामला एक नाबालिग छात्रा से जुड़ा है और प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का संकेत देता है, इसलिए जांच के शुरुआती चरण में कानूनी प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।
मामला उत्तर छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले स्थित भटगांव शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का है। याचिकाकर्ता हरकेश कुमार जायसवाल वर्ष 2008 से विद्यालय में जीव विज्ञान व्याख्याता के रूप में कार्यरत है।
भटगांव पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 75(1)(3) तथा पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 8 के तहत एफआईआर दर्ज की थी। इसके बाद शिक्षक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर को निरस्त करने की मांग की थी।
याचिका में शिक्षक की ओर से दावा किया गया कि शिकायत दुर्भावनावश दर्ज कराई गई है। उनके वकील ने अदालत को बताया कि शिक्षक पिछले 17 वर्षों से सेवा में हैं और उनके खिलाफ पहले कभी किसी प्रकार की शिकायत नहीं हुई।
याचिका में यह भी कहा गया कि 1 अप्रैल 2026 को शिक्षक अपने बच्चों की नीट परीक्षा की तैयारी में सहायता करने के लिए राजस्थान के कोटा शहर में थे। आरोप लगाया गया कि विभागीय और व्यक्तिगत रंजिश के चलते एक सहकर्मी ने कुछ छात्रों और अभिभावकों को उकसाकर झूठी शिकायत दर्ज कराई।
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह भी तर्क रखा कि कथित घटना 16 फरवरी 2026 की बताई गई है, जबकि रिपोर्ट लगभग 50 दिन बाद 6 अप्रैल 2026 को दर्ज कराई गई। इसलिए पूरे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। साथ ही यह भी कहा गया कि भीड़भाड़ वाली कक्षा में इस प्रकार की घटना होना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
राज्य सरकार की ओर से उप शासकीय अधिवक्ता सौम्या राय ने अदालत में कहा कि मामला नाबालिग छात्रा के यौन उत्पीड़न से जुड़ा है। ऐसे गंभीर मामलों में केवल एफआईआर दर्ज होने में हुई देरी को आधार बनाकर पूरी कार्रवाई समाप्त नहीं की जा सकती। मामले की सच्चाई निष्पक्ष पुलिस जांच के बाद ही सामने आ सकेगी।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मामला प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का प्रतीत होता है। अदालत ने यह भी माना कि लगाए गए आरोप इस स्तर पर पूरी तरह असंभव या अविश्वसनीय नहीं कहे जा सकते।
इस आधार पर खंडपीठ ने एफआईआर निरस्त करने की मांग खारिज कर दी। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी की आशंका है, तो वह कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपायों का सहारा लेने के लिए स्वतंत्र है।


