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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : चुनौतियां नहीं, बस्तर को लेकर अमित शाह ने उठाया एक और बीड़ा..
20-May-2026 6:02 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : चुनौतियां नहीं, बस्तर को लेकर अमित शाह ने उठाया एक और बीड़ा..

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भारत की मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक हुई, जो कि यूपी, एमपी, छत्तीसगढ़, और उत्तराखंड, इन चार राज्यों की परिषद है और बारी-बारी से इनमें यह बैठक होती है। केंद्रीय गृहमंत्री परिषद के स्थायी अध्यक्ष रहते हैं और वे ही जगह तय करते हैं। जाहिर है कि इस बार की बैठक उन्होंने बस्तर में ही छांटी होगी क्योंकि बस्तर में अमित शाह की गृहमंत्री के रूप में देश की सबसे बड़ी कामयाबी दर्ज है उन्होंने बस्तर से नक्सल हिंसा के खात्मे की तारीख की घोषणा कुछ इस तरह तय की थी कि जैसे मानो किसी कार के एसेंबली प्लांट से गाड़ी निकलने की तारीख बताई गई हो। पूरी तरह से अनिश्चितता से घिरा हुआ नक्सल मोर्चा अमित शाह की तय की हुई तारीख तक हिंसामुक्त हो जाएगा, यह किसने सोचा था? पुलिस और सुरक्षाबल, जिन पर यह जिम्मा था, घोषणा के दिन तो खुद उन्हें भी अंदाज नहीं था कि वे ऐसा अभूतपूर्व काम कर पाएंगे। लेकिन केंद्र और राज्य सरकार दोनों को इसकी वाहवाही जाती है कि उन्होंने जो कहा, सो किया।

इसलिए इस बार की मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक बस्तर में रखी गई, और जिन चार राज्यों के मुख्यमंत्री इसमें शामिल हुए, वे चारों ही भाजपा के थे। देशभर के नक्शे पर खिले हुए कमल से भी अमित शाह का आत्मविश्वास इस बैठक में बहुत ऊंचा था, और उन्होंने अब सुरक्षा इंतजामों की घटती जरूरत के साथ-साथ विकास की बढ़ती जरूरत को जोडक़र कुछ महत्वपूर्ण बातें इस आयोजन में की हैं। उन्होंने कहा कि बस्तर सुरक्षा कैंपों में से एक तिहाई कैंप वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा के रूप में विकसित होंगे। इन केंद्रों को बैकिंग, डिजिटल सेवाओं, स्कूल आंगनबाड़ी, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनाया जाएगा। यह पहली नजर में ही एक अच्छा फैसला इसलिए लगता है कि नक्सल हिंसा मुक्त होने के बाद सुरक्षा व्यवस्था का जो ढांचा बस्तर में अब रह गया है, उसे समेटने के बजाय उसका इस्तेमाल विकास, जनसेवा, और सरकारी कामकाज में इस तरह से किया जाना चाहिए कि इन इलाकों में नक्सल हिंसा की वजह से जो विकास नहीं हो पाया था, वह अब तेजी से हो सके। इन इलाकों में बने हुए कुछ नए, और कुछ पुराने जिलों का ढांचा बनने में भी कुछ समय लग सकता है, लेकिन अगर एक साथ करीब दो दर्जन सुरक्षा कैम्प इन इलाकों में सरकारी कामकाज और जनकल्याण के केन्द्र की तरह इस्तेमाल होने लगेंगे, तो इससे लोगों में बदले हुए वातावरण के प्रति भरोसा तेजी से बढ़ सकेगा। ये कैम्प जाहिर है कि सबसे बुरी तरह नक्सल प्रभावित इलाकों में सबसे अधिक थे, और ऐसे ही इलाकों में सरकार का रोज का कामकाज पिछड़ा हुआ रहता था। बीते बरसों में धीरे-धीरे सुरक्षा बल आसपास के गांवों का भरोसा जीतने के लिए कुछ किस्म के जनसुविधा और जनसेवा के काम भी करने लगे थे। सुरक्षा कैम्पों में लोगों का इलाज होने लगा था, कई जगह राशन दुकानें भी इन्हीं सुरक्षा शिविरों में चलती थीं। अब जब यहां से अर्धसैनिक बलों की वापिसी होगी, तब इन्हीं जगहों पर जनसुविधा का काम बढ़ाया जा सकता है, और अभी अमित शाह ने जो कहा है, उसका मतलब भी यही दिखता है।

गृहमंत्री के अलावा अमित शाह का जो दूसरा रूप सामने आया, वह सहकारिता मंत्री का है। केन्द्र सरकार में ये दो बिल्कुल अलग-अलग मिजाज के विभाग हैं, और अमित शाह के पास इन दोनों का एक साथ रहने का कोई तर्क समझ नहीं आता था। अब उन्होंने देश के सबसे बड़े सहकारिता-मॉडल, गुजरात के अमूल की तरह छत्तीसगढ़ के बस्तर में दुधारू पशुपालन को बढ़ावा देने की एक बड़ी योजना घोषित की है। इसके तहत हर आदिवासी परिवार को एक गाय और एक भैंस देने की बात उन्होंने की है। उन्होंने यह भी कहा है कि गुजरात के आणंद में जो दुग्ध सहकारिता का बड़ा सफल प्रयोग दशकों से चल रहा है, उसी मॉडल की तरह बस्तर में दुधारू पशुओं के साथ-साथ मिल्क-नेटवर्क भी विकसित किया जाएगा। यह अभियान किसी भी तरह नक्सल हिंसा खत्म करने से कम चुनौतीपूर्ण, या कम महत्वपूर्ण नहीं है। बस्तर में आबादी बहुत बिखरी हुई है, और यहां के लोगों के बीच दुधारू पशुपालन की कोई पुरानी परंपरा भी नहीं रही है। यहां पर पशुओं को खिलाने के लिए पत्ते या दूसरे चारे का इंतजाम हो सकता है, अधिक आसान हो, लेकिन उनके पैदा किए हुए दूध के उत्पादक उपयोग का इंतजाम जब तक नहीं होगा, यह पशुपालन उनकी बहुत मदद नहीं कर सकेगा। इसलिए इस बहुत महत्वाकांक्षी घोषणा के साथ भी हम एक बड़ी चुनौती खड़ी देखते हैं कि बस्तर के नक्सल हिंसा प्रभावित इलाके जो कि दसियों हजार वर्ग किलोमीटर  का इलाका बस्तर में नक्सल प्रभावित रहा है, जिनमें आधा दर्जन से ज्यादा जिले थे। अब अमित शाह यह बोल गए हैं कि वे बस्तर को देश का सबसे विकसित संभाग बनाएंगे, तो यह चुनौती किसी और की दी हुई नहीं है, यह उनका अपना खुद का उठाया हुआ बीड़ा है। बस्तर के इलाके में करीब 40 हजार वर्ग किलोमीटर का हिस्सा नक्सल प्रभावित था। अब इसे न सिर्फ विकास की मूलधारा में लाना है, बल्कि यहां की आबादी के लिए आर्थिक गतिविधियां भी इतनी शुरू करना है कि बस्तर एक बहुत विकसित संभाग बन सके। यह विकास सिर्फ केन्द्र या राज्य सरकार के बजट से नहीं हो सकेगा, बस्तर की करीब 25 लाख आबादी 2011 की जनगणना में थी, जो कि अब काफी बढ़ चुकी होगी, और इस आबादी को जंगल और देहात के बीच हो सकने वाले कामों से जोडक़र ही यह संभाग छलांग लगा सकेगा। केन्द्र और राज्य की मौजूदा सरकारों ने नक्सल हिंसा तकरीबन पूरी तरह खत्म कर देने का एक अविश्वसनीय काम कर दिखाया है। और यह काम भी किसी और की दी हुई चुनौती की वजह से नहीं किया गया था, अमित शाह ने खुद होकर यह बीड़ा उठाया था। इसलिए इसे सबसे विकसित संभाग बनाने की उनकी घोषणा भी उनकी नक्सल मोर्चे की कामयाबी का एक विस्तार ही रहेगी। अभी केन्द्र और राज्य दोनों जगह उनकी पार्टी की ही सरकारें कुछ और बरस का कार्यकाल देखने वाली हैं, और विकास का मौका उनके सामने है, यह वक्त ही बताएगा कि वे इसमें कितने कामयाब होंगे।

बस्तर में छत्तीसगढ़ की आबादी का चाहे एक छोटा हिस्सा रहता हो, क्षेत्रफल में बस्तर छत्तीसगढ़ का करीब एक तिहाई हिस्सा है। यहां पर देश की कुछ सबसे महत्वपूर्ण लोहा-खदानें भी हैं। ऐसे में केन्द्र सरकार की कंपनी, एनएमडीसी, के सबसे बड़े कामकाज के चलते हुए बस्तर के विकास में उसका भी योगदान रहता है। अब केन्द्र और राज्य सरकारों को अपने बजट में बस्तर के लिए अधिक इंतजाम करना पड़ेगा, और उसकी मदद से बस्तर को सबसे विकसित संभाग बनाने का इरादा आगे बढ़ सकता है।

केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के लिए नक्सल मोर्चे पर असाधारण कामयाबी एक बहुत बड़ी निजी तसल्ली की बात भी है, और गृहमंत्री के रूप में यह शायद देश में उनकी सबसे बड़ी सफलता भी है। बस्तर में इस हिंसामुक्ति की सफलता का, अब विकास की तरफ विस्तार एक स्वाभाविक तर्कसंगत बात लगती है, और देश अब बस्तर को पहले के मुकाबले कुछ अधिक उत्सुकता से देखेगा कि हिंसामुक्त इलाके में विकास किस तरह लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है। 

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