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एसईसीएल के खिलाफ कंस्ट्रक्शन कंपनी की याचिका खारिज
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 14 मई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ किया है कि किसी अनुबंध में मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) की शर्त होने मात्र से वैधानिक कर या सेस से जुड़े विवादों का समाधान मध्यस्थ के जरिए नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने कहा कि जब मामला किसी विशेष कानून के तहत उत्पन्न देनदारी से जुड़ा हो, तब संबंधित पक्ष को उसी कानून के तहत निर्धारित मंच पर जाना होगा।
मामला एसईसीएल के गेवरा ओपन कास्ट प्रोजेक्ट में वर्कशॉप और स्टोर निर्माण कार्य से जुड़ा है। यह ठेका कोलकाता की कंपनी एसके सामंता एंड कंपनी को दिया गया था। निर्माण कार्य के भुगतान से एसईसीएल ने 1 प्रतिशत राशि कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर सेस के रूप में काट ली थी। कंपनी ने इस कटौती को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
कंपनी का तर्क था कि उसका कार्य खनन क्षेत्र में किया गया, इसलिए उस पर माइंस एक्ट लागू होता है। ऐसे में बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एक्ट के तहत सेस की कटौती वैध नहीं है। कंपनी ने कटौती की गई राशि वापस दिलाने के लिए मध्यस्थ नियुक्त करने की भी मांग की थी।
दूसरी ओर एसईसीएल ने अदालत को बताया कि उसने केवल संग्रहण एजेंसी के रूप में काम किया और काटी गई राशि राज्य सरकार के खाते में जमा कर दी गई है। इसलिए रिफंड देने की जिम्मेदारी एसईसीएल की नहीं बनती। वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि कंपनी ने कोयला खनन नहीं बल्कि निर्माण कार्य किया था, इसलिए सेस कटौती पूरी तरह उचित थी।
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी को टेंडर भरते समय ही यह जानकारी थी कि भुगतान से 1 प्रतिशत सेस काटा जाएगा। कंपनी ने सभी शर्तें स्वीकार कर अनुबंध किया था, इसलिए बाद में इसे विवाद का मुद्दा नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि सेस की वसूली केवल दो निजी पक्षों के बीच का वित्तीय लेनदेन नहीं, बल्कि वैधानिक दायित्व है। ऐसे मामलों का समाधान केवल मध्यस्थता प्रक्रिया के जरिए नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने कंपनी की याचिका खारिज कर दी।


