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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : भविष्य की दुनिया में किसकी भूमिका के लिए कैसी लगेगी तैयारी, बताया सीजेआई ने..
सुनील कुमार ने लिखा है
16-Apr-2026 4:43 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : भविष्य की दुनिया में किसकी भूमिका के लिए कैसी लगेगी तैयारी, बताया सीजेआई ने..

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अभी दिल्ली में एक व्याख्यान में कहा कि 50 साल बाद की भारतीय न्यायपालिका कैसी दिखेगी, यह एक गंभीर सवाल है। उन्होंने कहा कि उस वक्त के जज आज के जजों से अलग होंगे, और उनके ज्ञान, उनकी समझ की जरूरतें भी अलग होंगी। उन्होंने कहा कि भविष्य के जज केवल कानूनी विशेषज्ञ तक सीमित नहीं रह पाएंगे, उन्हें उस वक्त अदालतों के सामने आने वाले मामलों को समझने के लिए कानून की किताबों, और पुराने फैसलों से कहीं आगे की समझ की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि भविष्य के जजों का अलग-अलग बहुत से दायरों का जानकार होना जरूरी होगा, उन्हें विज्ञान, तकनीक, समाजशास्त्र, नैतिकता, पर्यावरण, और मानव व्यवहार की गहराई समझनी होगी। जस्टिस सूर्यकांत ने कुछ मिसालें देते हुए कहा कि जब जीवन को प्रयोगशाला में इंजीनियरिंग से बनाया जाएगा, तो कानूनी जिम्मेदारी का सवाल उठेगा। उस ‘निर्मित’ का मालिक कौन होगा, उसे क्या अधिकार होंगे? डिजिटल और एआई मुद्दों से विवाद बढ़ेंगे, और जजों को इनको समझने के लिए एक तकनीकी समझ लगेगी। आने वाले बरसों में जलवायु परिवर्तन, और पर्यावरण के मामले बहुत बढ़ेंगे। इन मिसालों के अलावा जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को इमारतों या भूगोल की सीमाओं तक कैद नहीं रहना चाहिए, न्याय लोगों तक पहुंचना चाहिए, न्याय के लिए लोगों को अदालतों तक आने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

हम सिर्फ जजों के बारे में, या भविष्य के जजों के बारे में आज की बात को सीमित रखना नहीं चाहते। जस्टिस सूर्यकांत की बात तो महज एक मिसाल है, कोई अदालत अकेले ही 2050 के बरस में नहीं पहुंचेगी, उसके साथ-साथ पूरा समाज भी आगे बढ़ेगा, संसद, सरकार, मीडिया, विज्ञान, टेक्नॉलॉजी, और जटिल समाज-व्यवस्था, ये सब भी अभी से लेकर चौथाई सदी का सफर पूरा करके बिल्कुल ही नए-नए किस्म के हो जाएंगे। इसलिए उस वक्त न सिर्फ अदालतों में बेहतर, और अधिक समझ वाले जज लगेंगे, बल्कि समाज के अलग-अलग दायरों में भी लोगों को अधिक शिक्षित रहना होगा। इस शिक्षा का मतलब महज स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई से नहीं है, हालांकि उससे भी है। एक वक्त था जब 5वीं पास मुख्यमंत्री भी देश के सबसे काबिल मुख्यमंत्री हो सकते थे, लेकिन अब वक्त बदल गया है, अब देश और दुनिया को बेहतर समझने के लिए टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल जरूरी हो चुका है। नेताओं को, पत्रकारों और दूसरे किसी भी पेशे के लोगों को कम्प्यूटर, और एआई, इंटरनेट और डिजिटल दुनिया, इन सबसे वाकिफ रहना पहले के मुकाबले बहुत अधिक जरूरी आज भी हो चुका है। हर दिन यह जरूरत बढ़ती जा रही है, और चौथाई सदी बाद कैसी हालत रहेगी, यह समझ से परे है। आज भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बहुत सारे मामले ऑनलाईन सुने जाते हैं, शायद एक-दो बरस के भीतर ही एक आभासी अदालत खड़ी हो जाएगी, जिसमें आभासी जज बैठे होंगे, और आज की वीडियो कांफ्रेंस की तरह उस अदालत में वकीलों की होलोग्राफिक त्रिआयामी छवि खड़ी होकर बहस करती रहेगी। यह तकनीक आज भी मौजूद है, और इसका इस्तेमाल महज वक्त की बात है।

लेकिन हम अदालत तक सीमित रहना नहीं चाहते। आने वाले वक्त के लिए लोगों को इसलिए भी तैयार हो जाना चाहिए, क्योंकि आज बहुत से लोगों के लिए जो भविष्य है, वह तो आज ही बहुत से लोगों का वर्तमान भी है। आज दुनिया का एक हिस्सा जिस तकनीक का इस्तेमाल करता है, वह बहुत से लोगों के लिए एक विज्ञानकथा किस्म की है। इसलिए रात-दिन जंगल के हिरण की तरह छलांगें लगाकर आगे बढ़ती हुई तकनीक के बारे में सोच पाने की काबिलीयत नेताओं में भी लगेगी, पत्रकारों में भी लगेगी, और पेशेवर लोगों के बाकी दायरों में भी लगेगी। दुनिया में करोड़ों रोजगार खत्म होंगे, और शायद कुछ लाख नए रोजगार खड़े भी होंगे। इस बात को लिखते हमें महीनों हो चुके हैं कि आज एआई का खतरा उन अधिकतर कामों पर मंडरा रहा है, जो कम्प्यूटरों पर किए जाते हैं, मोबाइल फोन पर किए जाते हैं, जिनके लिए कुछ बोलना या सुनना पड़ता है, जिनके लिए की-बोर्ड की जरूरत पड़ती है, ऐसे सारे के सारे काम आज खतरे में हैं। इसलिए 25 बरस बाद की नौबत को सोच और समझ पाने की ताकत नेताओं के अलावा किसी भी देश-प्रदेश के बड़े अफसरों, योजनाशास्त्रियों को तो होनी ही चाहिए, जिन समाजों में अभी तक थिंक टैंकों का चलन खत्म नहीं किया गया है, वहां पर ऐसे थिंक टैंक सदस्यों को भी एक बेहतर कल्पनाशीलता की जरूरत पड़ेगी।

एआई से परे भी जेनेटिक इंजीनियरिंग, शिक्षा और इलाज की नई तकनीकें, रोबोटिक्स, मशीन-मानव के आपसी रिश्ते, सोशल मीडिया और आभासी जीवन जैसे हजार और मुद्दे सामने रहेंगे जिन्हें समझना आम लोगों के लिए भी जरूरी रहेगा, और जो लोग जिम्मेदारी के बड़े ओहदों पर बैठे होंगे, उन्हें तो इन सब चीजों की अधिक समझ जरूरी होगी ही होगी। इसलिए आज जिम्मेदारी के जिस दायरे में शिक्षा को बिल्कुल ही गैरजरूरी रखा गया है, उस राजनीति में भी लोगों के लिए न्यूनतम योग्यता को लागू करना किसी भी तरह से शैक्षणिक तबके की तानाशाही नहीं रहेगी। नेताओं की नई पीढ़ी को इस बात के लिए तैयार हो जाना चाहिए कि आने वाले भविष्य की अनगिनत नई चुनौतियों के बीच अगर वे राजनीति करना चाहते हैं, तो उन्हें विज्ञान और तकनीक की, ज्ञान और समझ की एक न्यूनतम योग्यता तो रखनी होगी। यह सिलसिला पुराने अंदाज के कई नेताओं को अटपटा लग सकता है, लेकिन बहुत भविष्य की जरूरत नहीं है, आज भी यह नौबत है कि तकनीक से बेहतर लैस लोग न सिर्फ सरकार चलाने, बल्कि विपक्ष में भी काम करने के लिए अधिक तैयार हैं। टेक्नॉलॉजी अकेले ही समझ नहीं बनती, लेकिन समझ के लिए टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल बहुत से कामों को बहुत आसान कर देता है, और आज भी दुनिया में मुकाबला इतना बढ़ चुका है कि जो लोग कम तैयार हैं, वे पिछड़ते चले जा रहे हैं, न सिर्फ राजनीति में, बल्कि कारोबार में भी, अपने पेशे में भी। आज भी कम्प्यूटर के सॉफ्टवेयर या प्रोग्राम बनाने वाले लोग अगर हर कुछ वक्त में सामने आने वाली नई कम्प्यूटर-भाषा में शिक्षित नहीं होते हैं, तो वे बहुत जल्दी बाहर हो जाते हैं। राजनीति में भी ऐसी नौबत आने में अधिक समय नहीं है, अखबारनवीसी और मीडिया के दूसरे दायरों में ऐसी नौबत पिछले कुछ बरसों में आ चुका है, स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई, विश्वविद्यालय में शोध कार्य, इन सबमें भी ऐसी नौबत बीते बरसों में आकर बैठ गई है।

सीजेआई की कही बात से आज सिर्फ यह सोचने की जरूरत पड़ रही है कि न सिर्फ भविष्य के जज, बल्कि भविष्य के कोई भी व्यक्ति कहां तक तैयार हो जाएं। विज्ञान और टेक्नॉलॉजी हर किसी के सामने अब आसान, सस्ते, और सुलभ विकल्प सामने रख चुके हैं, लोगों को इनके साथ कदम मिलाकर चलना सीखना चाहिए। 

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