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-इमरान क़ुरैशी
तमिलनाडु और केरल के राज्यपालों के बाद अब कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने राज्य विधानसभा के संयुक्त सत्र में दिए जाने वाले अपने अभिभाषण की कुछ सामग्री पर आपत्ति जताई है.
यह सत्र बेंगलुरु में गुरुवार से शुरू होना है.
क़ानून मंत्री एचके पाटिल ने पत्रकारों से कहा, "वह अपने अभिभाषण से 11 पैरा हटवाना चाहते हैं, जो कैबिनेट ने तैयार किया है. इन पैरा में केंद्र-राज्य संबंधों, कुछ केंद्रीय नीतियों से राज्य पर पड़ने वाले असर और मनरेगा का ज़िक्र है."
क़ानून मंत्री पाटिल, महाधिवक्ता शशिकिरण शेट्टी और मुख्यमंत्री के क़ानूनी सलाहकार के. पोन्नन्ना के साथ लोक भवन पहुंचे थे.
यह दौरा तब हुआ जब मुख्य सचिव को राज्यपाल कार्यालय से फ़ोन आया कि राज्यपाल को अपने अभिभाषण को लेकर आपत्तियां हैं.
पाटिल ने कहा कि राज्यपाल गहलोत कुछ पैरा हटाना चाहते थे, लेकिन "हमने यह स्पष्ट किया कि संयुक्त सत्र में दिया जाने वाला अभिभाषण कैबिनेट की ओर से तैयार किया जाता है. संविधान का अनुच्छेद 176 साफ़ तौर पर कहता है कि राज्यपाल को सरकार की नीतियां और कार्यक्रम पढ़कर सुनाने होते हैं. संविधान में यह पूरी तरह स्पष्ट है कि यह भाषण अनिवार्य रूप से कैबिनेट ही तैयार करती है."
प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को बताया कि मनरेगा को ख़त्म कर उसकी जगह 'विकसित भारत जी राम जी' क़ानून लाने का सीधा असर राज्य के लोगों पर पड़ रहा है और राज्य सरकार को इस बारे में बोलना होगा और जनता के सामने यह बात रखनी होगी.
पाटिल ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री को जानकारी देगा और फिर राज्यपाल से दोबारा संपर्क करेगा. सरकार ने राज्यपाल को बताया है कि सरकार के रुख़ में कोई बदलाव नहीं है.
इस सवाल पर कि अगर राज्यपाल संयुक्त सत्र को संबोधित करने से इनकार कर देते हैं तो क्या होगा, पाटिल ने कहा, "जब वह स्थिति आएगी, तब उस पर फैसला लिया जाएगा."
जब यही सवाल मुख्यमंत्री के क़ानूनी सलाहकार पोन्नन्ना से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 176 पूरी तरह साफ़ है और इसके मुताबिक़ नए साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा के संयुक्त सत्र को राज्यपाल को संबोधित करना ही होता है.
पूर्व महाधिवक्ता रवि वर्मा कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा, "राज्यपाल को कैबिनेट की सलाह के मुताबिक़ काम करना होता है. कैबिनेट की ओर से तैयार किए गए अभिभाषण पर उन्हें कोई विवेकाधिकार नहीं है, भले ही उसमें केंद्र सरकार की आलोचना ही क्यों न हो. ये सभी स्थापित संवैधानिक मुद्दे हैं. अगर वह इसका पालन नहीं करते हैं, तो यह उनके संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन माना जाएगा." (bbc.com/hindi)


