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-गरिकिपाटि उमाकांत
तेलंगाना के भद्राद्री कोतागुडेम ज़िले के अश्वरावुपेटा मंडल में एक ऊंची पहाड़ी पर घने जंगल में पिछले 25 सालों से एक आदिवासी परिवार अकेला रह रहा है.
इस परिवार में सिर्फ़ तीन सदस्य हैं- दंपती और उनका बेटा
पहाड़ी पर स्थित इस जंगल से लगभग तीन किलोमीटर नीचे पैदल चलने पर ही इंसानी बसावट का कोई निशान दिखाई देता है.
आज की ज़िंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुके फोन और बिजली जैसी सुविधाएं वहां नहीं हैं. लेकिन, इसके बावजूद यह परिवार वहाँ रह रहा है.
आख़िर वे तीनों वहीं क्यों रहते हैं? उनका रोज़मर्रा का जीवन कैसा है? और 25 वर्षों से जंगल न छोड़ने वाले इस परिवार के बारे में अधिकारी क्या कहते हैं?
आदिवासियों की पूजनीय देवी गुब्बाला मंगम्मा का मंदिर तेलंगाना के अश्वरावुपेटा मंडल और आंध्र प्रदेश के बुट्टायगुडेम मंडल की सीमा पर स्थित है.
उस मंदिर के आगे स्थित पहाड़ियों और घने जंगलों का पूरा क्षेत्र तेलंगाना के कंथलम वन क्षेत्र में आता है.
गुब्बाला मंगम्मा मंदिर में शाम छह बजे के बाद लोगों की आवाजाही बंद हो जाती है.
मंदिर से लगभग तीन किलोमीटर ऊपर पहाड़ी पर घने जंगल में पहले 40 आदिवासी परिवार बसे हुए थे. इस गांव को गोगुलापुडी कहा जाता था.
1990 से ही अधिकारी उन परिवारों को यहाँ से हटाने की कोशिश में थे. ऐसा करने के पीछे उनका तर्क था कि यहां बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जा सकतीं.
हालांकि, वहां के लोगों ने शुरू में पहाड़ी से नीचे आने और जंगल से बाहर आने से इनकार कर दिया, लेकिन आईटीडीए के अधिकारियों ने बार-बार उन्हें नीचे आने के लिए मनाने की कोशिश की थी.
अधिकारियों का कहना था कि लोगों को कम से कम अपने बच्चों की शिक्षा के लिए नीचे आना चाहिए. उनका तर्क था कि जंगल में बिजली, पीने का साफ़ पानी और बच्चों के लिए शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान नहीं की जा सकती हैं.
ये परिवार साल 2000 में कवादिगुंडला पंचायत क्षेत्र के कोथकन्नई गुडेम इलाक़े में पहाड़ी की तलहटी में बनाए गए पुनर्वास कॉलोनी में रहने आ गए.
पहाड़ी की तलहटी में बसी बस्ती का नाम गोगुलापुडी रखा गया, जो उसी जगह का नाम था, जहाँ वे पहाड़ी पर जंगल में रहते थे.
उन 40 परिवारों में से 39 परिवार तो नीचे आ गए, लेकिन गुरुगुंटला रेड्डैया ने नीचे आने से इनकार कर दिया. उनकी पत्नी लक्ष्मी और बेटा गंगिरेड्डी उनके साथ वहीं रह गए.
25 साल से जंगल में अकेले रह रहा है परिवार
अधिकारियों को लगा था कि समय बीतने के साथ रेड्डैया अपना मन बदल लेंगे.
उन्हें लगा था कि वो (रेड्डैया) अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों को मिल रही सुविधाओं और विकास को देखकर नीचे रहने आएंगे लेकिन वर्षों बीत गए और अब तक ऐसा नहीं हो पाया है.
रेड्डैया की पत्नी लक्ष्मी कहती हैं कि उनके पति जहां रहेंगे, वो वहीं रहेंगी. उनके बेटे गंगिरेड्डी का कहना है कि वो अपने माता-पिता के साथ ही रहेंगे.
इस परिवार से बात करने के लिए बीबीसी की टीम पहाड़ी पर गई और रेड्डैया की पत्नी लक्ष्मी और उनके बेटे गंगिरेड्डी से बात की.
जब हमने उनसे जानना चाहा कि वो अपना जीवन बिना बिजली के जंगल में कैसे गुज़र-बसर करते हैं तो लक्ष्मी का कहना था, "दिन में सूरज होता है, रात में चांद और तारे. सर्दियों में जब भी अंधेरा होता है, हम अलाव जलाते हैं. यहां हर तरह की सूखी घास मिलती है."
वो कहती हैं, "मुझे दिन और रात के घंटे अंदाज़ा तो होता है लेकिन मुझे यह नहीं पता कि आज कौन सा दिन है. मैं आपको यह भी नहीं बता सकती कि अभी कितना समय हुआ है."
जब बीबीसी की टीम ने उनसे पूछा कि इस घने जंगल में उन्हें डर नहीं लगता तो लक्ष्मी और गंगिरेड्डी का कहना था, "कोई डर नहीं. कोई चिंता नहीं. हम आग जलाते हैं, आग सुबह तक जलती रहती है. कोई जानवर कुछ नहीं करेगा. वे यहीं रहेंगे. हम भी यहीं रहेंगे. सांप भी कुछ नहीं करेंगे. इस सबकी हमें आदत है."
उन्होंने बताया कि वो यहां चावल, ज्वार और बाजरा के साथ-साथ सब्जियां भी उगाते हैं.
लक्ष्मी ने कहा, "हम अनाज सिर्फ़ खाने के लिए उगाते हैं. हम अपनी ज़रूरत के हिसाब से उगाते हैं. हमें पास की नदी से पानी मिल जाता है. इसमें गर्मियों में भी पानी रहता है और बारिश के समय तो ये पानी से लबालब भरा हुआ होता है."
"हमें बीमारी का कुछ नहीं पता"
लक्ष्मी ने बताया कि उनके कुल नौ बच्चे हुए थे, जिनमें से सात की मौत हो गई और अब केवल दो ही जीवित हैं. उन्होंने कहा कि उन दो में से एक बेटा है और दूसरी बेटी.
उन्होंने बताया कि उन्होंने बेटी की शादी कर दी है और वो पहाड़ के नीचे रहती हैं.
वहीं, जब तबीयत ख़राब होती है तो क्या करते हैं, जैसे सवाल के जवाब में गंगिरेड्डी बताते हैं, "हमें बुखार-बीमारी कुछ नहीं पता. अगर शरीर ठीक न लगे तो हम देसी दवाइयाँ ले लेते हैं."
जब उनसे पूछा गया कि ये दवाइयां कहां से आती हैं, तो गंगिरेड्डी ने कहा, "पेड़ों से ही. फल और पत्ते तोड़कर खा लेते हैं, कुछ नहीं होता."
हालांकि, लक्ष्मी कहती हैं कि उन्हें इन दिनों ठीक से दिखाई नहीं देता. वो लाठी पकड़कर चलती हैं.
उनका कहना है, "खैर ये कोई बात नहीं है."
परिवार के पास पांच झोपड़ियां
इस परिवार के पास यहां जंगल में पांच झोपड़ियां हैं.
लक्ष्मी ने बताया कि तीन लोगों के रहने के लिए अलग-अलग एक-एक झोपड़ी है. इसके अलावा मुर्गियों और कुत्ते के लिए एक झोपड़ी है और लकड़ी-जलावन को बारिश से बचाने के लिए एक अलग झोपड़ी बनाई गई है.
इस तरह उन्होंने कुल पाँच झोपड़ियाँ बनाई हैं.
जब उनसे पूछा गया कि बारिश होने पर क्या घर में पानी नहीं टपकता, तो गंगिरेड्डी कहा, "नहीं… ऊपर यह बैनर डाल देते हैं."
उन्होंने बताया कि मंदिर के पास त्योहारों के मौक़े पर लगाए जाने वाले फ्लेक्सी बैनर लाकर उसे झोपड़ियों पर डाल देते हैं.
लक्ष्मी कहती हैं, "गंगिरेड्डी पढ़ा-लिखा नहीं है, उसकी शादी भी नहीं हुई है. हम पहाड़ के नीचे नहीं उतरे, इसलिए वह पढ़ नहीं पाया. वह शादी भी नहीं करना चाहता और हमारे साथ ही रहता है."
इस बारे में गंगिरेड्डी ने कहा, "अगर लड़की पहाड़ पर आए तभी मैं शादी करूंगा, मैं नीचे नहीं उतरूंगा."
कभी मंदिर से आगे नहीं गए
पहाड़ के निचले हिस्से के वन क्षेत्र में स्थित गुब्बाला मंगम्मा मंदिर तक ही पिता रेड्डैया और बेटा गंगिरेड्डी आते-जाते हैं.
गंगिरेड्डी ने बीबीसी से कहा कि वे उस मंदिर से आगे जीवन में कभी नहीं गए हैं.
उन्होंने कहा, "मंदिर तक ही जाते हैं, उससे आगे नीचे नहीं उतरते. किसी भी काम के लिए हम नीचे नहीं जाते."
कावडिगुंडला पंचायत के अंतर्गत आने वाली आदिवासी पुनर्वास कॉलोनी के पंचायत सचिव मोतीलाल ने बीबीसी को बताया कि सरकार ने इन्हें आधार और राशन कार्ड देने की कोशिश की, लेकिन इन दोनों ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया.
गंगिरेड्डी ने बीबीसी से कहा, "उन कार्डों के लिए तस्वीर की ज़रूरत होती है और ऐसे में हमें नीचे आने को कहा गया था. हम नीचे नहीं उतरते. हमें वे कार्ड नहीं चाहिए, इसलिए पापा और मैंने उन्हें नहीं लिया."
लक्ष्मी के पास है आधार और राशन कार्ड
वहीं, लक्ष्मी बताती हैं कि वो अपनी बेटी से मिलने नीचे जाती हैं.
उन्होंने कहा, "मैं तो पहाड़ से नीचे उतरकर बेटी के पास जाती रहती हूं. मैं तो कॉलोनी गोगुलपुडी जाकर अपने रिश्तेदारों से भी मिलती हूं. जब मैंने फोटो खिंचवाई, तो उसी कॉलोनी के पते पर मुझे आधार और राशन कार्ड दे दिए गए. कभी-कभी मैं पहाड़ से नीचे उतरकर राशन भी ले आती हूं. लेकिन मेरा बेटा और मेरे पति-दोनों कहीं नहीं जाते. वे उस मंदिर से आगे नहीं जाते जबकि मैं आती-जाती रहती हूं."
जब उनसे पूछा गया कि पहाड़ के नीचे गुब्बाला मंगम्मा मंदिर से पांच किलोमीटर दूर बनाई गई कॉलोनी में आपका परिवार क्यों नहीं गया, तो लक्ष्मी ने कहा, "मेरे पति को इच्छा नहीं थी. मैंने भी चलने को कहा, लेकिन वे सुनते नहीं हैं. अगर वे मान जाते तो हम नीचे उतर जाते. हमारे बेटे की भी इच्छा नहीं है, इसलिए हम यहीं रह रहे हैं."
लक्ष्मी ने बताया कि उनके पति का कहना है कि उनका जन्म इसी जंगल में हुआ है और वे यहीं मरेंगे, नीचे नहीं उतरेंगे.
बीबीसी की टीम जब जंगल में उस घर के पास पहुंची, तो रेड्डैया वहां से बिना मिले ही चले गए.
इस बारे में पूछने पर लक्ष्मी ने बताया कि जीवन में कभी पहाड़ से नीचे नहीं उतरने वाले उनके पति को ये डर अब सताने लगा है कि कोई अधिकारी आएगा और उन्हें नीचे उतार देगा.
लक्ष्मी बताती हैं कि इस डर की वजह से रेड्डैया दिन भर घर नहीं आते, वो शाम ढलने के बाद ही घर पहुंचते हैं.
पिछले पच्चीस वर्षों से यह परिवार जंगल में अकेले रह रहा है. यह बात हाल ही में सामने आई है.
इसके बाद प्रशासन के साथ-साथ एक-दो मीडिया चैनल भी पिछले कुछ दिनों से उस वन क्षेत्र में आने लगे हैं.
लक्ष्मी कहती हैं, "लोग आ रहे हैं न… लोगों को देखकर वह डरकर भाग गया. रात में आएगा. उसे डर है कि कहीं उसे नीचे ले जाकर कुछ न कर दे. अब जंगल में अगर किसी को देखता है तो डर के मारे पत्थर फेंक देता है."
'कम से कम टीन की शेड ही डाल दीजिए'
गोगुलपुडी के युवाओं का कहना है कि रेड्डैया को जबरदस्ती नीचे लाने पर भी वह शांति से नहीं रह पाएंगे. इसलिए बेहतर होगा कि उनके घर पर ही सोलर पावर की व्यवस्था कर दी जाए और घर के चारों ओर बाड़ लगा दी जाए.
गोगुलपुडी के युवक मंगिरेड्डी ने बीबीसी से कहा, "हमारे दादा-परदादा के समय से ही हम इस जंगल में रहते आए हैं. साल 2000 में आईटीडीए के लोग हमें नीचे ले गए थे. रेड्डैया को कितना भी समझाइए, अब अगर उन्हें जबरन नीचे भी ले जाया गया तो वह वहां शांति से नहीं रह पाएंगे. सरकार अगर उन्हें यहीं कोई सुविधा दे दे, सोलर पावर लगा दे और पूरी झोपड़ी के चारों ओर बाड़ लगा दे तो सुरक्षा रहेगी."
गोगुलपुडी निवासी गुरुगुंटला बाबूरेड्डी का मानना है कि वह जब सात साल के थे, तब इस जंगल से नीचे आकर पढ़ाई की और डिग्री ली. उनका कहना है कि रेड्डैया का परिवार भी अगर नीचे आ जाए तो अच्छा होगा.
गोगुलपुडी हैबिटेशन के अंतर्गत आने वाले कावडिगुंडला पंचायत के सरपंच लक्ष्मणराव और सचिव मोतीलाल ने बीबीसी को बताया कि वे रेड्डैया के परिवार को नीचे लाने के लिए अपनी ओर से प्रयास कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "हम उन्हें किसी भी तरह की सुविधा देने के लिए तैयार हैं, लेकिन वे उसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हैं. खासकर रेड्डैया और उनका बेटा लोगों के बीच आने से कतराते हैं. जब हम आते हैं, तो वे जंगल के अंदर चले जाते हैं और छिप जाते हैं. फिर भी हम अपनी कोशिश जारी रखेंगे."
'उन्हें जंगल में रहने का अधिकार है…'
रेड्डैया को जानने वाले लोगों का कहना है कि अगर उन्हें (रेड्डैया) जंगल से बाहर लाया भी गया तो शांति से नहीं रह पाएंगे
इमेज कैप्शन,रेड्डैया को जानने वाले लोगों का कहना है कि अगर उन्हें (रेड्डैया) जंगल से बाहर लाया भी गया तो शांति से नहीं रह पाएंगे
अधिकारी बताते हैं कि उन्हें इस बात की जानकारी है कि आदिवासी जनजाति कोंडारेड्डी से जुड़े रेड्डैया का परिवार जंगल में अकेले रहता है.
भद्राद्री कोठागुडेम ज़िले के वन विभाग अधिकारी किष्टा गौड़ ने बीबीसी से कहा, "उनकी इच्छा के बिना उन्हें जंगल से नीचे नहीं लाया जा सकता,"
उन्होंने यह भी कहा कि वहां न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध कराना आईटीडीए की ज़िम्मेदारी है.
इस मामले पर बात करने के लिए बीबीसी ने आईटीडीए (इंटिग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट एजेंसी) के पीओ (प्रोजेक्ट ऑफ़िसर) राहुल से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका.
हालांकि, इस इलाक़े में पहले पुनर्वास कार्यों से जुड़े रहे और फ़िलहाल आईटीडीए भद्राचलम में ट्राइबल म्यूज़ियम के इंचार्ज के तौर पर काम कर रहे वीरास्वामी ने बीबीसी से बात की.
वीरास्वामी ने कहा, "हमारे ज़िले के जंगलों में कहीं-कहीं बिखरे हुए घर ज़रूर हैं, लेकिन वहां नज़र के दायरे में लोग दिखाई देते रहते हैं. आम तौर पर कम से कम 15–20 परिवार साथ रहते हैं. लेकिन यहां सिर्फ रेड्डैया का परिवार ही अकेला रहता है. हमने कई बार कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. वैसे भी ज़बरदस्ती नीचे नहीं ला सकते. यह ज़रूर देखना होगा कि क्या टीन की शेड लगाने की कोई संभावना है." (bbc.com/hindi)


