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न्याय की मांग पर बिलासपुर से नागपुर तक निकाला गया था कैंडल मार्च, ऑनलाइन पिटिशन लगी, पीएमओ ने ली थी जानकारी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 16 जनवरी। दस साल पुराने युवा व्यवसायी गौरांग बोबड़े की मौत के मामले में हत्या के सभी आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया है। अदालत ने पाया है कि अभियोजन पक्ष मौत के कारण और हत्या के आरोप को साबित नहीं कर पाया है। नौवें अपर सत्र न्यायाधीश आगम कुमार कश्यप ने मौत को 30 फीट ऊंची सीढ़ियों से गिरने के कारण हुआ स्वाभाविक हादसा माना और आरोपियों को संदेह का लाभ दिया है।
शहर के एक बड़े बिल्डर श्रीरंग बोबड़े के 20 वर्षीय बेटे और पुणे से एमबीए कर रहे गौरांगा ने 21 जुलाई 2016 की रात अपने दोस्तों के साथ मैग्नेटो मॉल स्थित टीडीएस बार में पार्टी की। गौरांग पुराने बस स्टैंड इलाके के निवासी थे और हाल ही में छुट्टियों में घर आए थे। उनके साथ किंशुक अग्रवाल, अंकित मल्होत्रा, करण जायसवाल और करण खुशलानी सभी शहर के प्रभावशाली बिजनेसमैन परिवारों के युवा दोस्त भी थे।
रात करीब 2:45 बजे सभी बार से नीचे जाने लगे। सर्विस लिफ्ट ऑपरेटर ने लिफ्ट से जाने की सलाह दी, लेकिन वे सीढ़ियों से उतरने लगे। इसी दौरान गौरांग का पैर फिसला और वह लगभग 30 फीट नीचे बेसमेंट में गिर पड़े। दोस्तों ने उन्हें तुरंत जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अगले दिन सिविल लाइन पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की।
पुलिस ने शुरू में मामले को धारा 304 भाग-2 के तहत एफआईआर दर्ज की। इसमें आरोप था कि दोस्तों की लापरवाही से गौरांग की मौत हुई। लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मल्टीपल इंजरीज सामने आईं। एक गंभीर नेक इंजरी, ट्विस्टेड हैंड (मल्टीपल फ्रैक्चर), आई इंजरी, चेहरे पर खरोंचें और खून के निशान पाए गए। गौरांग की बहन वेदांती बोबड़े ने आरोप लगाया कि यह हत्या थी, जिसमें दोस्तों ने उसे बुरी तरह पीटा और सीढ़ियों से धक्का दिया। बेसमेंट में गौरांग का जूता था पर मोजा गायब था। उसके सिर के बाल उखड़े मिले, जो पिटाई की ओर इशारा करते थे।
सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पुलिस ने बाद में धारा 302 (हत्या) जोड़ी। अभियोजन का मुख्य आरोप था कि आरोपी दोस्तों ने गौरांग को सीढ़ियों से धक्का दिया, जिससे उसकी मौत हुई। डॉक्टरों की रिपोर्ट में कहा गया कि इंजरीज धक्का दिए जाने से मेल खाती हैं। पुलिस ने चारों को गिरफ्तार किया और चालान पेश किया, लेकिन जांच में कई कमियां रहीं। जैसे सीसीटीवी फुटेज की स्पष्टता और गवाहों की विश्वसनीयता। हाईकोर्ट ने भी जमानत की सुनवाई के दौरान पुलिस जांच पर सवाल उठाए थे।
सत्र न्यायालय में करीब 9 साल तक ट्रायल चला। आरोपी किंशुक अग्रवाल, करण खुशलानी, करण जायसवाल और अंकित मल्होत्रा शहर के प्रमुख बिजनेस घरानों से ताल्लुक रखते थे। ये सभी गौरांग के दोस्त थे और परिवारों का राजनीतिक और व्यावसायिक प्रभाव है। किंशुक अग्रवाल का परिवार शहर में व्यापार से जुड़ा था, करण खुशलानी और करण जायसवाल के परिवार भी बिजनेस में सक्रिय थे। अंकित मल्होत्रा का बैकग्राउंड भी इसी तरह का था। इनके परिवारों की प्रभावशाली स्थिति के कारण मामले में सवाल उठे कि जांच प्रभावित हुई हो। आरोपी पक्ष ने हमेशा दावा किया कि यह हादसा था और वे निर्दोष हैं, लेकिन परिवार ने इसे हत्या बताया।
गौरांग की मौत के बाद परिवार और समर्थकों ने न्याय की मांग में बिलासपुर और नागपुर में कैंडल मार्च निकाले। चेंज ओआरजी वेबसाइट पर जस्टिस फॉर गौरांग नाम से पेटिशन शुरू हुई, जिसमें 613 से ज्यादा समर्थक जुड़े और तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह से अपील की गई। फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर भी हैशटैग ट्रेंड हुआ, जहां लोग पुलिस की जांच पर सवाल उठाते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय से भी मुख्य सचिव को पत्र भेजा गया था, जिसमें पूरे मामले की जानकारी मांगी गई थी। इधर, आरोपी पक्ष की ओर से भी जस्टिस फॉर इनोसेंस जैसे ग्रुप बने, जहां दावा किया गया कि आरोपी निर्दोष हैं और जेल में काफी समय बिता चुके हैं। शहरवासियों में यह मामला संवेदनशील विषय बन गया था।


