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नई दिल्ली, 22 दिसंबर। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया है कि भारत के न्यूक्लियर लाइबिलिटी क़ानून में हालिया बदलाव अमेरिका के हितों को ध्यान में रखकर किए गए। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस दावे के समर्थन में अमेरिका के एक रक्षा क़ानून का हवाला दिया है, जिस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में हस्ताक्षर किए हैं।
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि अमेरिका का नेशनल डिफ़ेन्स ऑथराइज़ेशन एक्ट (एनडीएए) 2026 भारत के साथ न्यूक्लियर लाइबिलिटी नियमों पर एक संयुक्त परामर्श तंत्र बनाने का स्पष्ट संकेत देता है। उनके मुताबिक, यही वजह है कि मोदी सरकार ने संसद में शांति विधेयक को जल्दबाज़ी में पारित कराया।
अमेरिकी क़ानून में भारत का सीधा ज़िक्र
कांग्रेस नेता ने बताया कि 3100 से अधिक पन्नों वाले अमेरिकी रक्षा क़ानून के एक हिस्से में “यूनाइटेड स्टेट्स–इंडिया जॉइंट असेसमेंट ऑन न्यूक्लियर लाइबिलिटी रूल्स” का उल्लेख है। इस प्रावधान के तहत अमेरिकी विदेश मंत्री को यह ज़िम्मेदारी दी गई है कि वे
– भारत–अमेरिका स्ट्रैटेजिक सिक्योरिटी डायलॉग के भीतर एक स्थायी परामर्श तंत्र बनाए रखें
– वर्ष 2008 के भारत–अमेरिका सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट के क्रियान्वयन की समीक्षा करें
– और भारत के डोमेस्टिक न्यूक्लियर लाइबिलिटी नियमों को “इंटरनेशनल नॉर्म्स” के अनुरूप लाने के तरीक़ों पर काम करें
रमेश का कहना है कि इससे साफ़ होता है कि भारत में न्यूक्लियर लाइबिलिटी क़ानून में बदलाव घरेलू ज़रूरतों से ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय दबावों के चलते किए गए।
‘शांति विधेयक’ पर कांग्रेस की आपत्ति
कांग्रेस के अनुसार, हाल ही में संसद से पारित सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ़ न्यूक्लियर एनर्जी फ़ॉर ट्रांसफ़ॉर्मिंग इंडिया विधेयक, 2025, यानी शांति विधेयक, ने वर्ष 2010 के सिविल लाइबिलिटी फ़ॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट के कई अहम प्रावधानों को कमज़ोर कर दिया है।
जयराम रमेश ने कहा कि 2010 का न्यूक्लियर लाइबिलिटी क़ानून संसद में सर्वसम्मति से पारित हुआ था और उसी क़ानून की वजह से भारत–अमेरिका परमाणु समझौता पूरी तरह लागू नहीं हो पाया था, क्योंकि उसमें सप्लायर की ज़िम्मेदारी तय की गई थी।
उन्होंने तंज़ कसते हुए कहा,
“अब साफ़ हो गया है कि प्रधानमंत्री ने शांति विधेयक को संसद में इतनी तेज़ी से क्यों पास कराया। यह शांति एक्ट नहीं, बल्कि ट्रम्प एक्ट है।”
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार का कहना है कि शांति विधेयक का मक़सद
– भारत की फ़ॉसिल फ़्यूल्स पर निर्भरता कम करना
– परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार करना
– और सिविल न्यूक्लियर सेक्टर में प्राइवेट पार्टिसिपेशन को बढ़ावा देना है
सरकार के अनुसार, इससे देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मज़बूत होगी।
राज्यसभा में तीखा विरोध
शांति विधेयक के राज्यसभा से पारित होने के दौरान जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि इतने संवेदनशील और दूरगामी असर वाले मुद्दे पर सरकार ने न तो पर्याप्त चर्चा कराई और न ही विशेषज्ञों से सलाह ली।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय जनता पार्टी सरकार ने वही रुख़ छोड़ दिया है, जो उसके वरिष्ठ नेताओं ने 2010 में न्यूक्लियर लाइबिलिटी क़ानून के समय अपनाया था।
शशि थरूर की चेतावनी
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने संसद में इस विधेयक का ज़ोरदार विरोध करते हुए इसे “प्राइवेटाइज़्ड न्यूक्लियर एनर्जी की ओर ख़तरनाक छलांग” बताया।
उन्होंने सवाल उठाया कि
– लाइबिलिटी की सीमा क्यों तय की गई
– दुर्घटना की स्थिति में टैक्स देने वालों पर बोझ क्यों डाला जा रहा है
– और क्या परमाणु हादसे के पीड़ितों को अदालत में जाने का पूरा हक़ मिलेगा
स्वदेशी रिएक्टर बनाम विदेशी कंपनियाँ
जयराम रमेश ने सरकार से यह भी कहा कि भारत को अलग-अलग विदेशी कंपनियों के डिज़ाइन अपनाने के बजाय अपने स्वदेशी 700 मेगावॉट न्यूक्लियर रिएक्टरों को मानकीकृत करना चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह क़ानून पूरी तरह वेंडर-ड्रिवन रहा, तो इसका अंजाम भी तीन कृषि क़ानूनों जैसा हो सकता है। (एजेंसी)


