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-शुभांगी मिश्रा
दिल्ली के मालवीय नगर में रहने वाली अरुणाचल प्रदेश की तीन युवतियों ने अपने पड़ोसियों के ख़िलाफ़ नस्लवाद की शिकायत दर्ज करवाई है. इन लड़कियों का कहना है कि दिल्ली में उनके ख़िलाफ़ ऐसा व्यवहार पहली बार नहीं हुआ है.
शिकायत करने वाली युवतियों में से एक ने बताया, "उन्होंने एक छोटे से झगड़े में हमारी पूरी कौम को गाली दी. हमने यह केस दर्ज करवाने का निर्णय लिया जिससे भविष्य में किसी नॉर्थ-ईस्टर्न के साथ ऐसा बर्ताव करने से पहले कोई भी दो बार सोचे."
इस युवती का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि उन्हें इंसाफ़ मिलेगा, और इस केस को देखकर लोग पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ नस्लवाद करने से पहले दो बार सोचेंगे.
इन युवतियों ने अपना नाम गोपनीय रखने का निवेदन किया है.
घटना की शुरुआत कैसे हुई
ये युवतियां पिछले सात महीने से दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में किराए के घर में रह रही थीं.
इनमें एक युवती दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट, दूसरी ओटीटी टेकनीशियन हैं और तीसरी सिविल सर्विसेज़ की तैयारी में जुटी हैं.
युवतियों ने बताया कि रविवार 22 फ़रवरी को उन्होंने घर में एसी रिपेयर का काम करवाना चाहा, जिसके लिए दीवार में ड्रिलिंग हुई. ड्रिलिंग से निकला मलबा पहली मंज़िल की बालकनी में जा गिरा, जहाँ पर वहाँ रह रहे निवासियों के एसी कंप्रेसर रखे थे.
इसके बाद पहली मंज़िल के निवासी हर्ष सिंह और रूबी जैन ने कथित तौर पर इलेक्ट्रिशियन के साथ बदतमीज़ी की और चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया.
बाद में एक पुलिस कर्मी भी मौक़े पर पहुंचा था. इसके बाद महिला-पुरुष के ख़िलाफ़ नस्लीय दुर्व्यवहार के तहत क़ानूनी मामला दर्ज किया गया.
थाना मालवीय नगर में निवासी हर्ष सिंह और उनकी पत्नी रूबी जैन के ख़िलाफ़ कथित नस्लीय दुर्व्यवहार और आपराधिक धमकी की घटना के संबंध में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं 79/351(2)/3(5) के अंतर्गत मामला दर्ज कर लिया गया है.
युवतियों ने इस घटना का वीडियो बनाया जो कि वायरल हो गया है.
इस वीडियो में युवतियों को अभियुक्त "मोमो" और "मसाज पार्लर वाली" कहते नज़र आ रहे हैं.
इस घटना को याद करते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट युवती ने बताया, "पड़ोसी ने हमसे कहा कि हम नॉर्थ-ईस्टर्न लोग वहाँ रहने के लायक नहीं हैं और हम मसाज पार्लर चलाने वाले लोग हैं."
हर्ष और रूबी के अधिवक्ता गौरव ने मीडिया को बताया कि ग़ुस्से में प्रयोग किए गए शब्दों के लिए उनके क्लाइंट हर्ष खेद जताते हैं, लेकिन "दिल्ली में छोटी-छोटी बातों पर ऐसा हो जाता है."
नस्लवाद को सामने लाती घटनाएं
यह घटना फिर से दिल्ली में नस्लवाद के मुद्दे पर सवाल उठाती है कि कैसे नॉर्थ-ईस्ट इंडिया के नौजवान रोज़ाना नस्लवादी टिप्पणियों का सामना करते हैं.
अतीत में भी दिल्ली में पूर्वोत्तर भारत के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा के कई मामले सामने आए हैं. ऐसे ही मामलों में 2014 का निडो तानिया केस सबसे प्रमुख है. अरुणाचल के इस स्टूडेंट की नस्लीय टिप्पणी का विरोध करने पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी.
इसके अलावा, 2012 में रिचर्ड लोइताम और 2014 में शालोनी जैसे युवाओं की संदिग्ध परिस्थितियों और हमलों में जान गई थी.
हालांकि अब पूर्वोत्तर के लोग इस नस्लवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते रहे हैं. मौका खोजा, रेबेल, के4खेको जैसे आर्टिस्ट अपने गानों में अपशब्दों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं. 'चिंकी' नाम का गाना भी हाल ही में काफ़ी मशहूर हुआ था.
2019 की फ़िल्म 'एक्सोन' (अनेक) भी नॉर्थ-ईस्ट के लोगों द्वारा दिल्ली में बनाए जाने वाले पारंपरिक खाने और उससे जुड़ी चुनौतियों पर आधारित एक अच्छी फ़िल्म है.
कोविड-19 महामारी के दौरान भी इन नागरिकों को 'कोरोना' कहकर बुलाने और उन पर थूकने जैसी घटनाएं दर्ज की गई थीं.
विरोध की आवाज़ भी हो रही बुलंद
इन बढ़ते मामलों के कारण ही सरकार को 'बेजबरुआ समिति' का गठन करना पड़ा था ताकि पूर्वोत्तर के समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.
जेएनयू में पढ़ने वालीं अरुणाचल प्रदेश की स्टूडेंट यारी नयम ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "यह घटना बहुत गंभीर है और इसे महज़ एक इक्का-दुक्का मामला मान कर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. यह दर्शाता है कि उत्तर-पूर्व के लोगों के ख़िलाफ़ नस्लवाद आज भी समाज में मौजूद है. ऐसे व्यवहार को हतोत्साहित करने के लिए सख़्त सज़ा की ज़रूरत है."
यारी का कहना है कि क़ानूनों, शिक्षा और नीतियों में बदलाव की ज़रूरत है ताकि जागरूकता की शुरुआत कम उम्र से ही हो सके.
बुनियादी स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक, लोगों को यह सिखाया जाना चाहिए कि वे उत्तर-पूर्व को भारत के एक अभिन्न अंग के रूप में देखें.
वो कहती हैं, "अब बहुत हो चुका. इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए हमें जवाबदेही और दीर्घकालिक जागरूकता, दोनों की आवश्यकता है."
नस्लवाद की चुनौती
ओटीटी टेकनीशियन के तौर पर काम करने वाली युवती ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि उनके साथ अक्सर दिल्ली में भेदभाव होता है.
उन्होंने कहा, "ऐसी बातें मैंने दिल्ली में पहली बार नहीं सुनी हैं. मेट्रो में लोग कई बार 'चाइनीज़' कहकर पुकारते हैं, और इसके अलावा भी अपशब्दों का प्रयोग करते हैं."
नॉर्थ-ईस्ट से आए लोगों को घर खोजने में भी दिक्कत होती है. घर मिल भी जाए तो किराया ज़्यादा लगता है और बिजली का बिल भी.
वो कहती हैं, "नॉर्थ-ईस्ट के स्टूडेंट्स या अन्य लोगों से ज़्यादा किराया लेना एक आम बात है. बाक़ी चीज़ें भी महंगी दी जाती हैं. ये लड़कियां बिजली 8-12 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से दे रही थीं, जबकि रेट केवल 3 रुपये है,"
युवतियों की अधिवक्ता लियि मार्ले नोशी ने कहा, "नॉर्थ-ईस्ट के लोगों का उत्पीड़न होता है और बच्चों के पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं होता."
लियि का कहना है कि दिल्ली के कोर्ट में उनके साथ भी भेदभाव और धक्का-मुक्की हुई है, क्योंकि वह नॉर्थ-ईस्ट से हैं.
अब तक नहीं हुई गिरफ़्तारी
दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट का कहना है कि सड़कों पर लोग जान-बूझकर अपशब्दों का प्रयोग करते हैं.
वो कहती हैं, "लोग चाहते हैं कि हम उनकी गालियां सुनें जिससे हमें ठेस पहुंचे. बहुत बुरा लगता है, खासकर जब पढ़े-लिखे लोग ऐसा करते हैं."
केस दर्ज करवाने के बाद युवतियों की पहचान मीडिया में लीक हो गई.
स्टूडेंट कहती हैं, "हमारे घर वाले डर गए हैं. वे हमें वापस बुला रहे हैं. हो सकता है हमें अपनी पढ़ाई छोड़कर वापस जाना पड़े."
लड़कियां रात भर सोशल मीडिया पर वे पेज ढूंढती रहीं जहाँ उनकी पहचान उजागर हुई थी, और वीडियो डिलीट करवाती रहीं.
इस मामले में अभी तक पुलिस ने कोई गिरफ्तारी नहीं की है.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने डीसीपी साउथ दिल्ली अंकित त्यागी को फ़ोन किया लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया.
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.) (bbc.com/hindi)


