राजनांदगांव

एक साल में पार्षदों को मिला मात्र तीन बार मानदेय!
15-Feb-2026 8:08 PM
एक साल में पार्षदों को मिला मात्र तीन बार मानदेय!

डबल इंजन की सरकार के बाद भी आर्थिक तंगी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 15 फरवरी।
राजनांदगांव नगर-निगम के पार्षद मानदेय के लिए तरस रहे हैं। एक  साल में पार्षदों को सिर्फ तीन मर्तबा ही मानदेय दिया गया है। गत् वर्ष 15 फरवरी 2025 को भाजपा निकाय चुनाव में शानदार जीत हासिल करने के बाद शहरी सत्ता में वापस लौटी थी। 51 पार्षदों वाली निगम में पैसे को लेकर एक संकट खड़ा हो गया है।
डबल इंजन की सरकार होने के बाद भी निगम प्रशासन को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। बताया जाता है कि कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के पार्षद मानदेय नहीं मिलने से ज्यादा तनाव में है। वजह यह है कि निगम में भाजपा की सरकार होने से पार्षदों से लोगों की ज्यादा अपेक्षाएं है। जबकि कांग्रेस पार्षद विपक्ष में होने के हवाला देकर लोगों से आसानी से बचकर निकल रहे हैं। निगम के पार्षदों को हर माह 15 हजार रुपए मानदेय देने का प्रावधान है। गुजरे एक साल में पार्षदों को तीन बार 15 हजार रुपए यानी अब तक मात्र 45 हजार रुपए ही मिला है। भाजपा पार्षदों की ओर से मेयर  मधुसूदन यादव व नगर निगम आयुक्त से कई बार नियमित रूप से मानदेय दिए जाने पर चर्चा और दबाव बनाया गया है। निगम की हालत यह है कि कर्मियों को भी तय समय पर वेतन देने में हाथ-पांव फूल रहे हैं।  
बताया जा रहा है कि कर्मचारियों का भी निगम प्रशासन को लेकर रूख नाराजगी भरा है। इसके अलावा मैदानी अमले की मुख्य कड़ी सफाई कर्मियों को भी तकरीबन 3 माह से वेतन नसीब नहीं हुआ है। निगम प्रशासन के पास पैसे की कमी का असर सीधे शहर की साफ-सफाई एवं अन्य बुनियादी सुविधाओं पर पड़ता दिख रहा है।
राजनांदगांव नगर निगम का स्थापना व्यय 100 प्रतिशत से ज्यादा हो  गया है। यही कारण है कि निकाय की स्थिति आर्थिक रूप से दिन-ब-दिन पतली होती जा रही है। वार्ड पार्षद जैसे-तैसे अपना काम चला रहे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा पार्षदों को सामाजिक कार्यों से लेकर अन्य जरूरतमंदों को आर्थिक लाभ देने में अब परेशानी खड़ी हो गई है। भाजपा पार्षदों ने अपनी स्थिति को लेकर कई बार मेयर व आयुक्त के समक्ष दुखड़ा रोया है। फिलहाल निगम की आय से ज्यादा खर्च होने के कारण वित्तीय बोझ बढ़ता ही जा रहा है। निगम प्रशासन सीधे पैसे की कमी बताकर कई जरूरी कामों पर खर्च करने में रूचि नहीं ले रहा है।


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