संपादकीय
यूपी की एक खबर है कि एक महिला अपने बच्चे का इलाज कराने के लिए एक मस्जिद में मौलवी के पास गई, वहां मौलवी और एक दूसरे नौजवान ने उसे कुछ नशीली चीज पिलाकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। अब उसकी शिकायत पर रिपोर्ट दर्ज करके पुलिस ने जांच शुरू की है। इस महिला का कहना है कि उसका इकलौता बड़ा बेटा बीमार रहता है, और गांव के ही एक नौजवान ने उसे मौलवी से झाड़-फूंक कराने की सलाह दी। फिर वह नौजवान उन दोनों को मोटरसाइकिल पर गांव की मस्जिद ले गया। वहां मौलवी ने कुछ पिलाकर उसे बेहोश किया, दोनों लोगों ने उससे बलात्कार किया, उसके वीडियो बनाए, तस्वीरें खींची, और धमकी दी कि अगर किसी को बताया तो यह वीडियो फैला देंगे, और जान से मार देंगे। घर पहुंचकर पीडि़ता ने पति को यह सब बताया, और फिर पुलिस में शिकायत की गई। देश भर से, जगह-जगह से ऐसी शिकायतें आती हैं कि कहीं किसी तांत्रिक के पास इलाज के लिए जाने पर, तो कहीं किसी बैगा-गुनिया के पास झाड़-फूंक के लिए जाने पर वे लोग बलात्कार करते हैं, छोटे-छोटे बच्चों का भी देह-शोषण करते हैं। जहां कहीं धर्म या आध्यात्म के नाम पर अंधविश्वास के दर्जे की आस्था हो जाती है, वहां ऐसे खतरे खड़े हो जाते हैं। यह किसी एक धर्म की बात नहीं है, बहुत सारे धर्मों में ऐसा होता है। अब इससे लोगों के बचने का क्या इलाज हो सकता है?
जहां तक इलाज के नाम पर शोषण की बात है, तो इसकी जिम्मेदारी सरकार पर आती है जिसका काम इलाज का पर्याप्त इंतजाम करना है। यह बात बिल्कुल साफ है कि जहां-जहां भरोसेमंद और सुविधापूर्ण आधुनिक चिकित्सा सुविधा रहती है, वहां धीरे-धीरे अंधविश्वास जाने लगता है, और लोग आस्था चिकित्सा को छोडऩे लगते हैं। लेकिन जहां अस्पताल नहीं है, इमारत है तो डॉक्टर नहीं है, डॉक्टर है तो नर्स नहीं है, मशीनें खराब हैं, दवाइयां हैं नहीं, तो फिर लोगों के पास मजबूरी में निजी चिकित्सा सुविधाओं तक जाना रह जाता है, और कई लोग ऐसे रहते हैं जो प्राइवेट डॉक्टरों या अस्पतालों का खर्च नहीं उठा पाते, और वैसे लोग जादू-टोना, झाड़-फूंक, मंत्र-ताबीज जैसी चीजों की तरफ चले जाते हैं। आज ही छत्तीसगढ़ की एक खबर है कि एक पिछड़े हुए जिले में एक जंगली बिल्ली ने एक बुजुर्ग महिला को जख्मी कर दिया था, वह अस्पताल जाने के बजाय झाड़-फूंक कराती रह गई, और अब रैबीज के लक्षणों सहित मर गई। जंगली जानवर से भी रैबीज का संक्रमण हो सकता है, इसका अंदाज भी बहुत से लोगों को नहीं होगा, और गरीब बूढ़ी महिला अस्पताल जाकर भी हो सकता है कि रैबीज का इंजेक्शन न पा सके, जिसकी कमी पूरे प्रदेश में चल रही है, और हाईकोर्ट तक इस पर तल्ख टिप्पणियां कर चुका है।
मौत या बलात्कार जैसी खबरें आने पर लोगों का ध्यान इस तरफ जाता है, लेकिन दूसरी तरफ हर गली-मोहल्ले में बिना चिकित्सकीय शिक्षा के, तरह-तरह के फर्जी कोर्स किए हुए लोग, या फर्जी कोर्स भी न किए हुए लोग दवाखाना खोलकर बैठते हैं, कई जगहों पर तो ऐसे लोग नकली अस्पताल भी चलाते हैं। हैरानी की एक खबर यह थी कि गुजरात जैसे विकसित और संपन्न राज्य में बिना डॉक्टरों के एक नकली अस्पताल ही चल रहा था। कमोबेश ऐसी घटनाएं पूरे देश में होती हैं, और कहीं-कहीं तो यूट्यूब पर वीडियो देखकर भी किसी स्वास्थ्य कर्मचारी ने सर्जरी कर डाली, और मौत हो जाने पर फरार हो गया। देश में मोटेतौर पर चिकित्सा व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, कुछ गिने-चुने एम्स जैसे केन्द्रीय संस्थान अलग-अलग राज्यों में केन्द्र सरकार चलाती है, लेकिन मरीजों का 90 फीसदी हिस्सा राज्य के अपने इंतजाम पर ही जाता है। हम छत्तीसगढ़ में देख रहे हैं कि किस तरह यहां दवा खरीदी से लेकर चिकित्सा सेवा के बाकी हर पहलू में बीते बरसों का भ्रष्टाचार सिर चढक़र बोल रहा है। आखिर ऐसा भ्रष्टाचार गरीब मरीजों के हक पर डाके के अलावा और क्या है? फिर किसी एक पार्टी की सरकार के रहते हुए ऐसा होता हो, और दूसरी पार्टी की सरकार रहते हुए न हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। इस छत्तीसगढ़ में बीते 25 बरस में हमने हर सरकार में स्वास्थ्य विभाग में ऐसा ही परले दर्जे का भ्रष्टाचार देखा है, और शायद यही वजह है कि स्वास्थ्य मंत्री रहे हुए अधिकतर नेता अगला चुनाव हार भी चुके हैं।
खैर, हम छत्तीसगढ़ में उलझना नहीं चाहते, क्योंकि यह पूरे देश का मुद्दा है। और चिकित्सा सेवा की नामौजूदगी के अलावा लोगों का अंधविश्वास, उनकी अंधश्रद्धा, धर्मान्धता, जैसे कई और पहलू जब जुड़ जाते हैं, तो कहीं चंगाई सभाएं होने लगती हैं, कहीं लोग ताबीज या धागा बांधने लगते हैं, कहीं पर तंत्र-मंत्र, और हवन होने लगते हैं, और बलात्कारियों को थके-हारे, बीमार, मानसिक रूप से विचलित शिकार मिल जाते हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि किस तरह आसाराम नाम के बलात्कारी ने अपने भक्त परिवार की नाबालिग बच्ची से बलात्कार किया था, और वह इतना पुख्ता मामला था कि वह सुप्रीम कोर्ट तक देश के सबसे नामी-गिरामी वकीलों को खड़ा करके भी नहीं बच पाया। लोगों को अपनी पसंद की मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धति पर विश्वास करना चाहिए, न कि किसी तरह के झाड़-फूंक किस्म के टोटके पर। दूसरी बात यह कि इलाज की जरूरत हो, या किसी और किस्म की, शारीरिक, आर्थिक, मानसिक परेशानी हो, कभी अपने परिवार के लोगों को ढोंगियों को समर्पित नहीं करना चाहिए। हर किसी को एक वैज्ञानिक नजरिया विकसित करना चाहिए। कब धर्म और आध्यात्म अपनी सीमाओं को लांघकर अंधविश्वास में दाखिल हो जाते हैं, और देह-शोषण करने लगते हैं, इसकी कोई दिखने वाली लक्ष्मण रेखा नहीं है। लोगों को खुद ही सावधान रहना चाहिए।


