संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कानून हाथ में लेना बुरा, या उसे पैरोंतले रौंदना?
सुनील कुमार ने लिखा है
19-Apr-2026 3:33 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : कानून हाथ में लेना बुरा, या उसे पैरोंतले रौंदना?

उत्तर भारत का एक वीडियो आया है जिसमें सडक़ किनारे किसी घर के सामने अपनी माँ के साथ खड़ी एक लडक़ी के पास दुपहिया रोककर नशे में चूर दो नौजवान उससे उसका रेट पूछते हैं। वह लडक़ी वीडियो में दिख नहीं रही है क्योंकि वही यह वीडियो बना रही है, जिसमें वह दुपहिया का नंबर भी रिकॉर्ड कर रही है, दोनों नौजवानों के चेहरे, और उनकी गंदी बकवास सब कुछ रिकॉर्ड कर रही है। बाद में पता लगता है कि इनमें से एक नौजवान एक भूतपूर्व मंत्री का बेटा है। गाड़ी का नंबर भी रहता है, चेहरे भी खूब अच्छी तरह दर्ज हैं, गिरफ्तारी होती है, और एक-दो घंटों में ही जमानत पर रिहाई हो जाती है। यह मामला देश में इन दिनों चल रहे कुछ दूसरे मामलों के मुकाबले बड़ा छोटा लगता है। महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक कस्बे में इन दिनों तीन-चार मुस्लिम नौजवानों ने जिस तरह बताया जा रहा है कि पौने दो सौ से अधिक लड़कियों को फांसा, उनके वीडियो बनाए, ब्लैकमेल किया, उन पर बलात्कार किया, और अब ये सब सुबूत सहित पुलिस की कैद में हैं। इन्हीं दिनों कर्नाटक के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार, देवेगौड़ा कुनबे का चिराग, देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री का पोता सैकड़ों महिलाओं के साथ सेक्स हजारों वीडियो सहित कैद है, बीते बरस अगस्त में एमपी-एमएलए अभियुक्तों के लिए बनी एक विशेष अदालत ने प्रज्जवल रेवन्ना को उम्रकैद सुनाई है, इसके खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो चुकी है, और वह बेंगलुरू की जेल में सजा काट रहा है। उसके वीडियो तो हजारों मिले हैं, लेकिन शिकायत करने कुल चार महिलाएं सामने आई थीं, और इनमें से एक में ही अभी सजा हुई है।

देश भर में जगह-जगह न सिर्फ पेशेवर मुजरिमों, बल्कि तरह-तरह के नेताओं, और राजनीतिक या ताकतवर परिवारों के कपूतों के किए हुए बलात्कार सामने आते हैं, और ऐसे में एक घटना याद पड़ती है, जो काफी पुरानी है, लेकिन जो याद दिलाती है कि जब सरकार और अदालत इंसाफ नहीं कर पाते, तब फिर लोग कानून किस तरह अपने हाथ में लेते हैं। इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल महाराष्ट्र में नागपुर की एक जिला अदालत की 2004 की है। वहां पर 40 से अधिक बलात्कार और हत्याओं का आरोपी अक्कू यादव खड़ा था, पुलिस उसे 13 साल से बचाते आ रही थी, लेकिन कस्तूरबा नगर की थकी हुई महिलाओं ने उसे गिरफ्तार करवाकर दम लिया था। जब उन्हें यह लग रहा था कि यह अदालत से जमानत पर छूटकर आएगा, और फिर मोहल्ले, और इलाके में जिससे चाहे उससे बलात्कार करेगा, तो चार सौ महिलाएं अदालत में घुसीं, वे मिर्च पावडर, सब्जी काटने वाले चाकू, और पत्थर लेकर गई थीं। उन्होंने अदालत के भीतर ही उस पर हमला किया, और उसे चाकुओं से गोद डाला। उन महिलाओं का तनाव इस बात से देखा जा सकता था कि उन्होंने उसके मर्दाने शरीर का वह हिस्सा ही काटकर अलग कर दिया जिससे वह बलात्कार करता था। यह मामला अदालत में चलते रहा, किसी ने इन महिलाओं के खिलाफ गवाही नहीं दी, और सारी महिलाएं छूट गईं। दस बरस लगे, लेकिन अदालत ने इन महिलाओं को बरी करते हुए यह माना कि अपराधी के आतंक, और पुलिस की सांठगांठ ने उन्हें इस सामूहिक आक्रोश के लिए मजबूर किया था।

2015 में नागालैंड में जेल की दीवार तोडक़र भीड़ ने बलात्कार के एक  आरोपी को बाहर निकाला, उसे शहर में घुमाया, और मार डाला। भीड़ का तर्क था कि अगर आज इसे नहीं मारा, तो कल यह जमानत पर बाहर आकर यही काम करेगा। एक दूसरा मामला बिहार के पूर्णिया में 2021 का है, वहां एक व्यक्ति पर एक बच्ची के साथ बलात्कार का आरोप था। गांव के लोगों ने पुलिस के आने के पहले अपनी खुली अदालत शुरू की, हजारों की भीड़ के बीच पहुंची पुलिस बेबस खड़ी रही, और भीड़ ने पुलिस की मौजूदगी में ही आरोपी को मार डाला, उनका तर्क था कि पुलिस ले जाएगी, तो दो साल बाद यह छूटकर फिर गांव में घूमेगा, और यही हरकत करेगा। इसके कुछ पहले 2018 का एक मामला अरूणाचल प्रदेश के ईटानगर का है। वहां दो लोगों पर एक मासूम के साथ बलात्कार करने, और उसे मार डालने का आरोप था। वे पुलिस हिरासत में थे, भीड़ ने पुलिस थाने पर हमला किया, लॉकअप के ताले तोड़े, दोनों आरोपियों को खींचकर बाजार के बीच ले गए, पुलिस की गोलियां भी भीड़ को नहीं रोक पाईं, दोनों को लोगों ने सडक़ पर ही मार डाला, क्योंकि पुलिस और अदालत पर उनका अधिक भरोसा नहीं रह गया था।

ऐसे में जब नेताओं के कपूत घंटों में जमानत पाकर बाहर आ जाते हैं, तो वे जनता का इंसाफ पर से भरोसा कुछ और हद तक खत्म कर देते हैं। ऐसी ही ताजा जमानत वाले उत्तर भारत में जाने कितने ही नेता बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला को और धमकाते हुए, उसके परिवार के लोगों का कत्ल करते हुए, उसके वकील को मार डालते हुए, गवाहों को मार डालते हुए पकड़ाते भी हैं, और छूट भी जाते हैं। कोई इक्का-दुक्का आसाराम या रेवन्ना को सजा होती है, बाकी तो जांच, सुबूत, गवाह, सबको कमजोर करते हुए, महंगे वकीलों के मार्फत जमानत और रिहाई खरीदते हुए, फिर आतंक फैलाने के लिए आ जाते हैं। यह सिलसिला आम लोगों में यह बात साफ कर देता है कि खास के हाथों बलात्कार का शिकार होना ही उनकी नियति है। नागपुर के कस्तूरबा नगर की महिलाओं को भी मोहल्ले में हो चुके 40 बलात्कारों के बाद जब यह समझ में आया कि इतने बड़े मवाली का पुलिस कुछ नहीं बिगाडऩे वाली है, तब उन्होंने अदालत के भीतर घुसकर उसका कत्ल किया। कानून अपने हाथ में लेना बहुत अच्छी बात नहीं है, लेकिन जब ताकतवर लोग कानून को पैरोंतले रौंदते हुए अपनी ताकत की नुमाइश करते हैं, तो आम लोगों के पास इंसाफ पाने का क्या सचमुच ही कोई और जरिया रह जाता है? लोकतंत्र में इस बात को समझना आसान नहीं रहता, कि जब कुछ ताकतवर पैर कानून को अपने पैरोंतले रौंदते हैं, तब हिंसा के शिकार लोग अगर कानून को अपने हाथों में लेते हैं, तो इन दोनों में अधिक बड़ा जुर्म कौन सा है? क्या इंसाफ दिलाने में बरसों और पीढिय़ों तक आमतौर पर नाकाम रहने वाले कानून को पैरोंतले रौंदा जाना देखना जिनकी नियति हो गई है, क्या कानून अपने हाथों में लेना उन बेबस और मजबूर, कमजोर और थके हुए लोगों का जुर्म कहलाएगा?

हम किसी भी किस्म की हिंसा के सख्त खिलाफ हैं, लेकिन सामाजिक हकीकत यह है कि बेतहाशा जुर्म या जुल्म के खिलाफ जब आम लोगों की भीड़ उठ खड़ी होती है, तो वह कुछ अधिक ही खड़ी हो जाती है। ऐसी भीड़ का औसत कद इंसानी कद से खासा अधिक बड़ा हो जाता है, उसके पंजों में औसत इंसानी पंजों से खासी अधिक पकड़ आ जाती है, और वह जो सजा देती है, वह अदालत से मिलने की कमजोर संभावना वाली सजा के मुकाबले खासी अधिक कड़ी भी रहती है। इसलिए गैरमुजरिम आम जनता के कानून हाथ में लेने की नौबत न आए, तो ही बेहतर रहेगा। अब इस नौबत को टालने का काम जनता तो नहीं कर सकती, लोकतंत्र के तीनों दंभी स्तंभ चाहें तो यह काम कर सकते हैं।  

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