संपादकीय
छत्तीसगढ़ में कल सामने आया एक जुर्म एक अजीब किस्म का गंभीर खतरा सामने रखता है। एक ठेकेदार के 16 बरस के नाबालिग बेटे को इंस्टाग्राम पर एक महिला ने दोस्ती के रास्ते आगे बढक़र मोहब्बत में फंसाया, और उसके बाद उसका अपहरण कर लिया। इसके बाद उसके पिता को वीडियो भेजकर एक करोड़ रूपए की फिरौती मांगी गई। एक दिन के भीतर गिरफ्तार कर लिए गए इन आरोपियों में इस महिला का पति भी है, और अपहरण किए गए लडक़े के परिवार का एक करीबी रिश्तेदार भी है। किसी नाबालिग से इस तरह ऑनलाइन दोस्ती करके, परिवार के लोगों के साथ मिलकर उसका अपहरण करके फंसाने वाली किसी महिला का यह पहला ही मामला है, और इसमें उसका पति भी शामिल था, जो कि कुछ चौंकाता भी है। इस वारदात के बहुत से अलग-अलग पहलू हैं, और उन सबके बारे में सोचने की जरूरत है।
ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा बड़ा और प्रमुख देश बना है जिसने 14-15 बरस से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर दाखिला देने के खिलाफ बड़ा कड़ा कानून बनाया है। भारत में भी दक्षिण के एक-दो राज्यों में ऐसी तैयारी चल रही है, लेकिन पूरे देश में जिस बात की जरूरत है, वह अभी नजर नहीं आ रही है। नाबालिग छात्र-छात्राओं को सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों पर फंसाकर, उन्हें हनी ट्रैप में उलझाकर, उन्हें ब्लैकमेल करके वसूली और उगाही करते हुए खुदकुशी तक के लिए मजबूर करने की घटनाएं दुनिया में कई जगह हो रही हैं। अमरीका और योरप के विकसित देशों में नाइजीरिया जैसे देशों में बैठे हुए लोग भी ऐसा साइबर-क्राइम कर रहे हैं। फिर यह सिलसिला सिर्फ नाबालिगों या कम उम्र के लोगों तक सीमित नहीं है, हमने बहुत से अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को इसी तरह हनी ट्रैप में फंसते देखा है जब वे किसी वीडियो कॉल पर किसी अनजान लडक़ी या महिला के न्यौते और उकसावे पर उतावले होकर अपने कपड़े उतार देते हैं, और अपने को कुछ मिनटों के भीतर ही ब्लैकमेल का सामान बना लेते हैं। ऐसे मामले भी भारत में हर दिन सैकड़ों की संख्या में हो रहे हैं, दर्जनों की संख्या में पुलिस तक पहुंच रहे हैं, और इक्का-दुक्का लोग पकड़ा भी रहे हैं। लेकिन इस ताजा वारदात में कुछ और भी पहलू गौर करने लायक हैं।
पहली बात तो यह कि इस साजिश में गिरफ्त में लिए गए लड़क़े का एक एकदम ही करीबी रिश्तेदार भी शामिल था। दूसरी बात यह कि ब्लैकमेल और अपहरण करने वालों में इस नाबालिग लडक़े से करीब 10 बरस बड़ी शादीशुदा युवती भी थी, और उसका पति भी। ये दोनों ही बातें परिवार के कमजोर ढांचे, शून्य नैतिकता, और सजा की तरफ से बेफिक्री की सुबूत हैं। लोग अपने बच्चों को किस-किससे बचाकर रखें? परिवार के लोग, पड़ोसी, शिक्षक-प्रशिक्षक, स्कूल के कुक और गार्ड, हर दर्जे के लोग तो बलात्कारी निकल रहे हैं। तीन-चार बरस के बच्चों से भी बलात्कार हो रहा है, और उनका कत्ल भी कर दिया जा रहा है। अब मां-बाप किस-किस पर, कहां-कहां पर नजर रखें? 14-15 बरस का लडक़ा इंस्टाग्राम पर किससे दोस्ती कर रहा है, इस पर नजर रखना मां-बाप के लिए एक मुश्किल और नामुमकिन काम इसलिए हो जाता है कि कई बच्चे उनके मोबाइल फोन, मोबाइल गेम, और सोशल मीडिया के जीवन में दखल देने वाले मां-बाप को छोडक़र, बगावत में खुदकुशी भी कर रहे हैं। सच तो यह है कि एक-दो पीढ़ी पहले बच्चे मां-बाप से डरे रहते थे, आज मां-बाप बच्चों से डरे रहते हैं, और बच्चे इमोशनल ब्लैकमेलिंग करके मां-बाप से मनचाहे मोबाइल हासिल कर लेते हैं, और उनकी औकात के बाहर की दूसरी सहूलियतें भी। यह सिलसिला मां-बाप को बहुत कमजोर बना देता है, क्योंकि हर दिन कहीं न कहीं की खबर आती है कि मोबाइल पर अधिक वक्त गुजारने से रोकने पर किसी बच्चे ने खुदकुशी कर ली, तो किसी दूसरे बच्चे ने महंगे मोबाइल का पसंदीदा मॉडल न मिलने पर जान दे दी। ऐसे जमाने में सोशल मीडिया पर पहुंचे हुए कम उम्र, नाबालिग बच्चों की गतिविधियों पर मां-बाप कितनी नजर रख सकते हैं? सरकारों को ही सोशल मीडिया पर रोक लगानी होगी कि वे कम उम्र बच्चों को वहां दाखिला न दें। इसके साथ-साथ सरकारें मोबाइल फोन, लैपटॉप जैसे उपकरणों पर भी ऐसी रोक-टोक जोडऩे की शर्त कंपनियों पर लगा सकती हैं कि मां-बाप अगर अपने बच्चों के लिए ये उपकरण ले रहे हैं, तो वे इन पर नजर भी रख सकें। नाबालिग बच्चों की उनके मां-बाप से निजता कोई बड़ा मुद्दा नहीं होना चाहिए। सरकार इन कंपनियों को यह भी कह सकती है कि वे ऐसे मोबाइल फोन और कम्प्यूटर पर यह सूचना दिखाते रहें कि इन उपकरणों पर उनके माता-पिता की निगरानी है। इससे ही नाबालिग बच्चों के कई तरह के खतरे टल सकते हैं। लेकिन इस सिलसिले में जो भी होना है, उसके लिए देश-प्रदेश की सरकारों को ही कानून और नियम बनाने होंगे, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने होंगे। इन सबमें निजता के सवाल उठेंगे, और समाज को उन पर भी चर्चा करनी पड़ेगी।
ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की है, कई और देशों ने इस बात को आगे बढ़ाया है, और हर जिम्मेदार देश को इन मुद्दों पर बहस शुरू करनी चाहिए। आज बाकी तरह की साइबर-धोखाधड़ी, फ्रॉड, और ठगी के अलावा बच्चों को, या बूढ़ों को भी, सेक्स-जाल में फंसाकर ब्लैकमेल करने, उगाही करने के जुर्म धड़ल्ले से चल रहे हैं। बहुत से लोग सामाजिक शर्मिंदगी के डर से पुलिस तक पहुंचते नहीं हैं, और अपनी आखिरी क्षमता तक लुटते चले जाते हैं। इसके लिए सरकार का मौजूदा साइबर-कानून बिल्कुल ही नाकाफी है। अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मैसेंजर सर्विसों, और उपकरणों, इन सबके लिए नए नियम, नए कानून की जरूरत आन खड़ी हुई है। आज भारत के समाज में नाबालिग लडक़े-लड़कियों के बीच जितने तरह के खतरनाक रिश्ते बन रहे हैं, जितने तरह के नाबालिग-जुर्म हो रहे हैं, वह एक बहुत ही खतरनाक नौबत है। लोगों को इसे गंभीरता से लेना चाहिए, देश-प्रदेश के नेता एक अलग बुजुर्ग पीढ़ी के हैं, उन्होंने टेक्नॉलॉजी की आज की पीढ़ी के सिर्फ मोबाइल फोन देखे हैं, लेकिन 21वीं सदी के इस दूसरी चौथाई के सामाजिक रिश्तों का अंदाज भारत के नेताओं को बहुत कम है, और अफसर भी बहुत अधिक सीनियर होते-होते पुरानी पीढ़ी के हो जाते हैं। इसलिए सरकारों को कुछ नई पीढ़ी के जानकार लोगों से सलाह-मशविरा करना चाहिए, और भारत इतना बड़ा ग्राहक-देश है कि यहां की सरकार उपकरणों पर भी अगर कुछ तरह की शर्तें लागू करेगी, तो कंपनियां उन्हें मानेंगी। इसके साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए भी भारत बहुत बड़ा बाजार है, और जनता को जुर्म से बचाने के लिए, नई पीढ़ी को फंसने से बचाने के लिए सरकार को ही पहल करनी होगी।


