संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट में पिछले कुछ दिनों से कैसी गजब की दिलचस्प बहस चल रही है कि उसे सुनने के लिए तरह-तरह के ईश्वर भी ऊपर टकटकी लगाकर बैठे होंगे, और कानों के पीछे हाथ टिकाकर ध्यान से सुन रहे होंगे। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले को लेकर 9 जजों की संवैधानिक बेंच पिछले दस दिनों से सुनवाई कर रही है, और वह इस एक मंदिर से ऊपर उठकर आस्था और संविधान की बहस का आज तक का शायद सबसे बड़ा मामला बन गया है। अब बहस इस पर नहीं टिकी है कि एक नागरिक के रूप में, एक हिन्दू के रूप में महिला का इस मंदिर में दाखिल होने का हक मंदिर की परंपराओं के ऊपर है, या परंपराएं महिला के मौलिक अधिकार के ऊपर हैं। बहस अब इससे बढक़र यहां पहुंच गई है कि क्या अदालत को धर्म के अंदरुनी मामलों में घुसने का हक है भी या नहीं? और चूंकि यह बहस बहुत से बड़े-बड़े जानकार वकीलों, और सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के बीच चल रही है, इसलिए इसमें हर दिन हर टिप्पणी को लेकर नए पहलू सामने आते हैं। मीडिया के अलग-अलग हिस्से इन टिप्पणियों को लेकर अपनी पसंद और प्राथमिकता के मुताबिक सुर्खियां बनाते हैं, जिन्हें पढक़र एक पुरानी लाईन याद आती है, जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
अभी चूंकि यह मामला चल ही रहा है, इसलिए हर पहलू से बहस जारी है, और यह बहस कुछ लंबी भी चल सकती है क्योंकि यह बड़ी संवैधानिक पीठ है, और यह इस एक मंदिर से परे भी जिन संवैधानिक सवालों पर गौर कर रही है, वे लंबे भविष्य तक इस देश में धार्मिक आस्था और मौलिक अधिकारों की परिभाषाएं तय करेंगे। अदालत इस बात पर गौर कर रही है कि क्या किसी व्यक्ति का समानता का अधिकार, किसी धार्मिक संप्रदाय की अपनी परंपरा को मानने की आजादी से बड़ा है? इस सवाल को इस संदर्भ में समझने की जरूरत है कि केरल के सबरीमाला मंदिर में दस बरस से पचास बरस तक की महिलाओं को दाखिला नहीं है क्योंकि मंदिर की परंपराएं यह मानती हैं कि वहां के देवता आजीवन ब्रम्हचारी रहे हैं, और उनके सामने माहवारी की उम्र वाली महिलाओं को नहीं जाना चाहिए। एक दूसरा सवाल अदालत के सामने यह है कि क्या जज यह तय कर सकते हैं कि किस धर्म के लिए कौन सी प्रथा अनिवार्य है, और कौन सी नहीं? क्या अदालत को धर्मशास्त्री की भूमिका निभानी चाहिए, या यह फैसला उस धर्म के विद्वानों पर छोड़ देना चाहिए? एक और दिलचस्प सवाल अदालत के सामने यह आया है कि छुआछूत का मतलब क्या सिर्फ जातिगत भेदभाव होता है, या माहवारी के दिनों के आधार पर महिलाओं को मंदिरों से बाहर रखना भी इसी दायरे में आता है? एक और सवाल अदालत के सामने यह है कि नैतिक किसे कहा जाए, जो समाज की नजर में सही है, उसे कहा जाए, या जो संविधान की प्रस्तावना में लिखा है, उसे कहा जाए? अदालत यह तय करने की कोशिश कर रही है कि क्या धार्मिक नैतिकता को संवैधानिक नैतिकता के सामने झुकना होगा, या इसका उल्टा अधिक जायज होगा? फिर इस मंदिर को लेकर एक सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि भगवान अयप्पा के भक्त क्या एक अलग संप्रदाय हैं? अगर हाँ, तो क्या उन्हें अपने मंदिर के नियम खुद तय करने का हक है, जिसमें सरकार या अदालत दखल नहीं दे सकते? इससे जुड़ा हुआ सवाल यह है कि जो व्यक्ति इस धर्म, या इस मंदिर के भक्तों के एक काल्पनिक संप्रदाय की परंपराओं का पालन नहीं करते, क्या वे अदालत आकर उस धर्म या संप्रदाय की प्रथाओं को चुनौती दे सकते हैं? अदालत के सामने एक सवाल यह भी है कि अदालत और धर्म के बीच लक्ष्मण रेखा कहां पर है? क्या अदालतें किसी धर्म की निजी आस्था की समीक्षा कर सकती हैं? क्या आस्था को तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है, या आस्था अपने आपमें तर्क से परे, और तर्क से ऊपर है?
अब हमें 2018 का इसी मामले में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला याद करना पड़ेगा। पांच जजों की एक बेंच के सामने सबरीमाला का ही मामला आया था जिसमें 4:1 के बहुमत से फैसला आया था, और एकमात्र महिला जज ने ही बाकी बहुमत के खिलाफ राय दी थी। जस्टिस दीपक मिश्रा उस वक्त मुख्य न्यायाधीश थे, और वे क्रांतिकारी बदलाव के पक्ष में थे। एक दूसरे जज, जस्टिस ए.एम.खानविलकर भी बहुमत के साथ थे। जस्टिस आर.एफ.नरीमन ने यह कड़ा रूख अपनाया था कि संविधान ही सर्वोच्च है। और जस्टिस डी.वाई.चन्द्रचूड़ ने इसे छुआछूत और पितृसत्तात्मक सामाजिक परंपराओं से जोडक़र देखा था। अकेली महिला जज जस्टिस इन्दू मल्होत्रा ऐसी थीं जिनका तर्क था कि अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी धार्मिक परंपरा सही है, और कौन सी गलत। इस फैसले की लैंगिक-व्याख्या भी जरूरी है कि चार पुरूष जजों ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का रास्ता खोला था, और बेंच की अकेली महिला जज ने परंपरा और आस्था का हवाला देकर महिलाओं को इस मंदिर के बाहर रोका था। अब 2026 की 9 जजों की बेंच 2018 के उस पांच जजों के फैसले की समीक्षा कर रही है कि उस फैसले में धार्मिक स्वतंत्रता को नजरअंदाज तो नहीं कर दिया गया था।
अभी यह मामला चल ही रहा है, और बड़े-बड़े दिग्गज वकील भी अदालत के सामने संविधान की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं। हम उनमें से किसी को भी कम नहीं आंकते, क्योंकि कुछ तो ऐसे संविधान विशेषज्ञ वकील हैं, जिनकी व्याख्याओं से मौजूदा जजों को भी कई चीजें समझने और सीखने मिलती हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर जाकर जज और प्रमुख वरिष्ठ वकीलों में से कोई भी कम या अधिक ज्ञानी नहीं रह जाते, बल्कि बहस से इन दोनों ही पहलुओं को कई चीजें समझने का मौका मिलता है। हमने पहले भी कुछ ऐसे वरिष्ठ वकीलों को देखा है कि जो अदालत में जब जिरह करते थे, तो देश के मुख्य न्यायाधीश भी सीखने-समझने के अंदाज में बैठकर उन्हें सुनते थे, और इस बात को औपचारिक मंच से कहते भी थे। आज का यह मामला न सिर्फ एक मंदिर का है, न सिर्फ हिन्दुओं का है, बल्कि मस्जिदों, पारसी उपासना स्थलों, और कुछ दूसरे संप्रदायों के लिए भी एक नजीर बनने जा रहा है। हालांकि जब वकील अदालत में जिरह करते हैं, वे अनिवार्य रूप से अपनी निजी सोच सामने नहीं रखते, वे अपने मुवक्किल के पक्ष में दिए जा सकने वाले तर्कों को लेकर बहस करते हैं, क्योंकि उनकी जिम्मेदारी इंसाफ की न होकर अपने मुवक्किल के हितों को बचाने और बढ़ाने की रहती है। इसलिए आज जब बड़े-बड़े दिग्गज वकील सरकार की तरफ से, मंदिर ट्रस्ट की तरफ से, या कि सुधारवादी याचिकाकर्ताओं की तरफ से आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच की सीमा रेखा तय करने में लगे हैं, तो नास्तिकों के लिए भी यह एक बड़ी दिलचस्प बहस बनी हुई है। देश में इतनी बड़ी संविधानपीठ कम ही बनती है, और इतने व्यापक महत्व और असर के मुद्दे पर बहस कम ही होती है जितनी कि नागरिक अधिकारों, मौलिक अधिकारों, और आस्था के बीच के टकराव को लेकर चल रही है। बहस में यह बात भी सामने आ रही है कि अगर धर्म को विज्ञान या पूर्ण तर्क की कसौटी पर कसा जाएगा, तो दुनिया के सारे धर्म गायब हो जाएंगे। एक वकील ने कहा कि क्या ईश्वर के अस्तित्व को, या आध्यात्मिक अनुभव को वैज्ञानिक रूप से साबित करने को कहा जा सकता है? इसलिए जिन मान्यताओं को बाहरी दुनिया अंधविश्वास कह सकती है, उन्हें भी कानून के तहत संरक्षण मिलना चाहिए क्योंकि वे आस्था का हिस्सा हैं।
आखिर में कल की एक ताजा टिप्पणी की चर्चा करने की जरूरत है जिसमें यह सवाल उठा है कि क्या ऐसे आस्था के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए, सवाल करते हुए, और फैसला देते हुए जजों को अपनी व्यक्तिगत आस्था से ऊपर उठने की जरूरत रहती है, या वे अपनी निजी आस्था पर भी टिके रह सकते हैं? कैसा दिलचस्प सवाल है, कैसी दिलचस्प चुनौती है! इस पूरे सिलसिले को लोगों को ध्यान से सुनना चाहिए, पढऩा चाहिए, क्योंकि यह महज सबरीमाला मंदिर की बात नहीं है, अब जो फैसला आएगा, वह पूरे देश पर, तमाम धर्मों पर भी लागू होगा, और औरत-मर्द के, ट्रांसजेंडरों के, दलितों और सवर्णों के, दूसरे धर्म के लोगों के, कई तरह के अधिकार इससे तय होंगे। देखते रहिए।


