संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : देखो ये दीवानों तुम ये काम न करो, राम का नाम बदनाम न करो
सुनील कुमार ने लिखा है
11-Jan-2026 1:24 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : देखो ये दीवानों तुम ये काम न करो, राम का नाम बदनाम न करो

छत्तीसगढ़ के एक प्रायमरी स्कूल के प्रश्न पत्र में किसी के कुत्ते के नाम के विकल्पों में शेरू के साथ-साथ एक नाम राम दे दिए जाने से बवाल खड़ा हो गया है। सरकार ने आनन-फानन कड़ी कार्रवाई की, और इससे जुड़ी हुई एक प्रधानअध्यापिका को सस्पेंड कर दिया, और एक संविदा शिक्षिका की नौकरी खत्म कर दी। इसके अलावा दो अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी किया गया है। मुद्दा एक हद तक जायज था क्योंकि भारत में कुत्ते के नाम के रूप में राम का नाम अकल्पनीय है। बीते दशकों में देश में मुर्दों और शवयात्रा से परे भी राम का नाम इतनी जगह इतनी तरह गूंजा हुआ है, कि एक बूढ़े के गोलियों से छलनी बदन निकला हे राम दब ही गया है। ऐसे देश में कुत्ते, या किसी अपमानजनक समझे जाने वाले जानवर के लिए राम का नाम देना परले दर्जे की बेवकूफी और गैरजिम्मेदारी की बात है। राम का नाम एक वक्त सार्वजनिक जीवन की नैतिक मर्यादाओं के लिए था, पिता की आज्ञा पर चौदह बरस बनवास पर चले जाने के अनुशासन का था, सौतेली मां के भी बेमिसाल सम्मान का था, और राजा को संदेह से ऊपर रखने के लिए पत्नी को भी घर से निकाल देने वाली नैतिकता का था। इनमें से कोई भी बात आज राम के नामलेवा लोगों पर लागू नहीं होती है, लेकिन चाहे हथियार की तरह ही क्यों न हो, राम का नाम अभी भी भारत में पूजनीय तो बना ही हुआ है। और भारत के इस हिन्दीभाषी प्रदेश में ऐसी चूक बहुत बड़ी लापरवाही, या बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी के बिना नहीं हो सकती थी। गनीमत यही है कि इस पूरे सिलसिले में जितनी शिक्षिकाओं, या प्राचार्य-शिक्षा अधिकारी के नाम आए हैं, वे सारे के सारे रामनामी हिन्दू सम्प्रदाय के हैं, अगर वे किसी और धर्म के होते, तो एक अलग किस्म का बवाल अब तक खड़ा हो गया रहता।

ऐसी छोटी-मोटी गलतियां अलग-अलग जगहों पर होती रहती हैं, और उन्हें लेकर बवाल कुछ बड़े तब हो जाते हैं जब इन गलतियों से लोगों को धार्मिक भावनाएं आहत होने का बहाना मिल जाता है, या कुछ मामलों में सचमुच ही धार्मिक भावनाएं आहत होने लगती हैं। फिर अब आज के वक्त लोगों का धार्मिक बर्दाश्त पूरी तरह जवाब दे चुका है, और लोग किसी मानवीय चूक को भी माफी के लायक मानने से मना कर देते हैं। हालत यह है कि अपने धर्म के प्रति जिस दर्जे की असहनशीलता लोगों में भर गई है, दूसरे धर्मों के प्रति उसी दर्जे की अपमान की भावना भी लोगों के मन में उमड़ती-घुमड़ती रहती है। धर्म जिसे कि एक आस्था के स्तर पर रहना चाहिए, वह आज जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया लगता है। बहुत से लोगों के लिए धर्म के मुद्दे के बाद बचे हुए वक्त में बन सके तो कोई और काम कर लेने का रूख दिखता है, वरना धर्म काफी है।

स्कूल के एक पर्चे में हुई चूक को लेकर आज यह मांग उठ रही है कि इसके लिए जिम्मेदार शिक्षकों, और अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर की जाए। जिन पार्टियों के नेता यह मांग कर रहे हैं, उन्हें इसी छत्तीसगढ़ के दुर्ग संभागीय मुख्यालय में शहर के बीच खुली ‘हिटलर’ नाम की कपड़ों की दुकान नहीं दिखती। दुनिया के सबसे बड़े हत्यारे के नाम पर फख्र से दुकान खोलकर कारोबार किया जा रहा है, और सभी धर्मों और राजनीतिक विचारधाराओं के लोग इसे आसानी और मजे से बर्दाश्त किए चल रहे हैं, बर्दाश्त कहना भी कुछ ज्यादती होगी, लोगों को हिटलर नाम की दुकान के सामने से दिन भर आते-जाते भी कुछ नहीं लगता होगा, क्योंकि दुनिया के इतिहास में चाहे जो दर्ज हो, हिन्दुस्तानी वोटरों को हिटलर के नाम से न लुभाया जा सकता, न भडक़ाया जा सकता, और फिर इन्हीं दो वजहों से ऐसे किसी नाम पर लोग अपना वक्त क्यों जाया करें?

जिसे भाषा संवेदना कहती है, संवेदनशीलता कहती है, या भावना कहती है, वह सब आज ऐसे निरर्थक शब्द हो गए हैं कि अगर उनका कोई धार्मिक या चुनावी इस्तेमाल नहीं हो सकता, तो उनकी जिंदगी में कोई अहमियत नहीं है। ऐसा लगता है कि पिछली कई सदियों से सभ्यता का जो विकास चल रहा था, उसने कम से कम हाल के दशकों में एक रिवर्स गियर लगा लिया है, और वह विकास अब लौट चला है। आ अब लौट चलें वाले गाने की तरह, सभ्यता अब विकसित होना बंद करके वापिस लौट रही है। यह बात सिर्फ हिन्दुस्तान में नहीं है, बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में विकसित हो चुकी सभ्यता के मूल्य अब पुरानी दवा की तरह एक्सपायर हो चुके हैं, और उन मूल्यों का आज कोई काम नहीं रह गया है। एक-एक करके दुनिया के बहुत से देश बर्दाश्त खोते जा रहे हैं, दूसरे देशों के लिए, उन देशों के लोगों के लिए, और उन लोगों के धर्मों के लिए। लोग बर्दाश्त खोते जा रहे हैं, दूसरों के अस्तित्व को भी देखने के लिए। खासकर पिछले एक बरस में अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने अलावा, अपने देश के अलावा, बाकी पूरी दुनिया के लिए जैसी हिंसक हिकारत दिखाई है, उससे भी सभ्यता 21वीं सदी से पीछे मुडक़र गुफा की तरफ बढ़ चली है। दिलचस्प बात यह है कि ट्रम्प के दुबारा अमरीका संभालने के पहले ही दुनिया के कई दूसरे देशों में यह सिलसिला शुरू हो चुका था, इसलिए हम वापिसी की इस सफर का पूरा श्रेय ट्रम्प को नहीं दे सकते, वापिसी के इस नोबेल के ट्रम्प के साथ कई और संयुक्त विजेता भी हैं।

सभ्यता के सफर, विकास, और अब वापिसी का हाल यह है कि अभी पौन सदी पहले ही हिटलर के हाथों जो नस्लवादी जनसंहार यहूदियों ने झेला था, आज वही काम वे फिलीस्तीनियों के साथ कर रहे हैं, और दुनिया के सबसे बड़े मवाली की ताकत भी इसमें उनके साथ है, महज ट्रम्प की निजी ताकत नहीं, पिछले डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति की ताकत भी इसी और ऐसे इजराइल के साथ थी। यह सिलसिला भयानक इसलिए है कि सभ्यता के विकास की जो रफ्तार थी, वह कछुए सी धीमी थी। और हासिल हो चुके विकास के विनाश की जो रफ्तार है, वह जंगली हिरण की तरह छलांगें लगाकर तेज होती चल रही है। इस रफ्तार में किसी माफी की कोई जगह नहीं है, सभ्यता के विनाश वाले नाथूराम को न महज माफी, बल्कि स्तुति भी मिल रही है, और अगर पर्चा सेट करने में किसी शिक्षिका से एक गलती हो गई है, तो उसके लिए उसके खिलाफ एफआईआर की मांग हो रही है। सार्वजनिक जीवन के मूल्यों में ऐसी विसंगति, और ऐसे विरोधाभास को पहचानने की समझ सभ्यता की वापिसी के बीच मुमकिन नहीं है। अभी ट्रेन के गुफा तक पहुंचने के वक्त की घोषणा नहीं हुई है, इंतजार करें।

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