दुर्ग
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
दुर्ग, 4 सितंबर। ऋषभ नगर स्थित नवकार भवन में शांत क्रांति संघ के आयोजकत्व में जारी चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला के तहत आज की सभा को संबोधित करते हुए महासती साध्वी प्रभावती ने कहा कि लोभी को धन और अभिमानी को प्रशंसा कम ही लगती है। लोभी व्यक्ति को कितना भी धन मिल जाये वह कभी संतुष्ट नहीं होता। इसी तरह अहंकार से भरे हुए व्यक्ति की कितनी भी तारीफ कर ली जाए उसे संतुष्टि नहीं मिलती। भगवान ने कहा है कि जो प्राप्त है उसे पर्याप्त मानते हुए संतुष्ट हो जाना चाहिए और संतुष्ट होकर धर्म ध्यान को अंगीकार कर लेना चाहिए। ऐसा करने से शेष जीवन सुख और शांति से बीतेगा। अन्यथा इच्छा आकांक्षा का तो कोई अंत ही नहीं है।
साध्वी ने कहा कि अधिक धन कमा कर संचय कर लेने के बाद भी मनुष्य की चिंता कम होने के बजाय और बढ़ जाती है, क्योंकि संचित धन की रक्षा सुरक्षा को लेकर व्यक्ति चिंतित रहता है। अत्यधिक धन अर्जन के प्रसंग पर साध्वी ने कहा कि हर व्यक्ति पूर्व जन्म की पुणवानी साथ ले कर जनमता है, इसके साथ वर्तमान जीवन का पुरुषार्थ जब मिल जाता है तभी वह धनी मानी बन पाता है। पुण्यवानी नहीं रहेगी तो व्यक्ति कितना भी परिश्रम कर ले वह अपेक्षित परिमाण में धनार्जन नहीं कर पाता। कभी धन कमा भी लिया तो लक्ष्मी उसके पास टिकती नहीं। आपने सुझाया कि दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए धर्म-साधना, जप-तप का सहारा लेना ही श्रेयस्कर रहता है।
धर्म के रास्ते पर चल कर ही पुण्यवानी का संचय किया जा सकता है। साध्वी ने सीख दी कि धन का नहीं वरन धर्म का लोभ करना चाहिए। धर्म कितना भी करें, उससे व्यक्ति कभी संतुष्ट ना हो, क्योंकि धन की अधिक मात्रा आपका सुख चैन छीन लेता है जबकि धर्म का कितना भी संचय कर लिया जाए वह सुख और शांति ही देगा।
4 सितंबर से पर्यूषण पर्व प्रारम्भ होने की जानकारी देते हुए साध्वी ने ने कहा कि पर्यूषण पर्व के दौरान अधिक से अधिक धर्म-ध्यान, जप व तपस्या करना चाहिए। इससे कर्मों की निजर्रा होती है। भगवान ने चातुर्मास और उसके भीतर पर्यूषण दिवसों को निवृत्ति के लिए व्यवस्था दी है। इस व्यवस्था का अधिक से अधिक लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए।


