धमतरी

सामाजिक बदलाव में मीडिया की भूमिका अहम-यूनिसेफ
30-May-2024 6:17 PM
सामाजिक बदलाव में मीडिया की भूमिका अहम-यूनिसेफ

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

कुरुद, 30 मई। सामाजिक बदलाव में मीडिया की भूमिका, बाल अधिकार एवं जीवन के प्रथम एक हजार दिन का महत्व को रेखांकित करने यूनिसेफ के बैनर तले छत्तीसगढ़ के इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया से जुड़े चुनिंदा पत्रकारों का तीन दिवसीय वर्कशॉप बस्तर के चित्रकोट में आयोजित किया गया। जिसमें विषय विशेषज्ञों ने चाइल्ड राइट्स जैसे कई गंभीर विषयों में सरकार और यूनिसेफ की भूमिका के बारे में जानकारी दी। 

बस्तर की सुरम्य वादियों के बीच इंद्रावती नदी के चित्रकोट जलप्रपात के बिल्कुल करीब स्थित एक लग्जरी रिसोर्ट में 24-26 मई तक तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। पहले दिन अलग-अलग जिलों से पहुंचे पत्रकारों का स्वागत बस्तर ने रिमझिम बारिश से किया।

अगले दो दिन यूनिसेफ के डॉ.बीपी दास, एमएसएसवीपी. मनोज भारती, एमसीसीआर.डी श्याम कुमार ने जीवन के प्रथम एक हजार दिन के महत्व पर गंभीर चर्चा करते हुए कहा कि गर्भावस्था से लेकर जीवन के प्रथम एक हजार दिन व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। इस अवधि में व्यक्ति के स्वास्थ्य, पोषण की स्थिति, उंचाई, शिक्षा,कमाई, खुशी और व्यवहार निर्भर करता है। जीवन के इसी हिस्से में देश के समाजिक, मानव एवं आर्थिक विकास की नींव पड़ती है। जीवन यात्रा के इस शुरुआती दिनों में होने वाली क्षति की भरपाई आजीवन नहीं हो सकती।

 वक्ताओं ने बताया कि इसमें रोकथाम के लिए यूनिसेफ ने 22 इंटरवेंशन तय किया है, जिसे अपना कर हम देश की जीडीपी में 20 फीसदी का इजाफा कर सकते हैं।

 छत्तीसगढ़ के यूनिसेफ हेड जॉब जकारिया ने बाल अधिकार एवं मीडिया की भूमिका पर चर्चा करते हुए बताया कि केंद्र एवं राज्य सरकार के दस विभागों के साथ मिलकर यूनिसेफ की टीम काम करती है। छत्तीसगढ़ में 2006 से यूनिसेफ की स्थापना के बाद से ही प्रदेश के 32 जिलों में महिला एवं बाल अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता, कुपोषण, पेयजल आदि विषयों पर काम जारी है।

उन्होंने बाल अधिकार पर फोकस करते हुए कहा कि मासूम बच्चे अपने अधिकार से अंजान होते हैं, वे बोल नहीं पाते इसलिए उनकी कोई आवाज नहीं होती, ऐसे में मिडिया बच्चों की आवाज बनें और बाल अधिकारों के प्रति संवेदनशील समाज की रचना में अपना योगदान दें।

श्री जकारिया ने माना कि हमारी नीतियां अकेले समाजिक परिवर्तन नहीं ला सकती, यह समाज में एक सक्षम वातावरण बना सकती है। बाल अधिकार तभी समाजिक मानदंड बनेंगे जब समाज उन्हें मान्यता दे और स्वीकार करें। खुली चर्चा में मिडिया पैनलिस्ट की ओर से बस्तर में नक्सली वारदातों में छोटे बच्चों को शामिल बता जेल भेजने जैसी घटनाओं में यूनिसेफ की भूमिका को लेकर किए गए प्रश्न का जवाब देते हुए कहा गया कि यह समस्या बस्तर या भारत देश में ही नहीं बल्कि सीरिया, सूडान, यूक्रेन, अफ्रीका, फिलीस्तीन, अफगानिस्तान जैसे देशों में भी बाल अधिकारों का हनन हो रहा है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर एकरुपता लाकर बाल अधिकार को संरक्षित करने का प्रयास जारी हैं। अलग अलग देशों की आर्थिक एवं कानूनी स्थिति के मुताबिक हम मदद उपलब्ध करा रहे हैं।

बच्चों पर नशा और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव को लेकर उठाएं गये सवाल पर बताया गया कि प्रदेश के 9 जिलों के 9 हजार स्कूलों में नशा और डिजिटल पार्ट्स पर आधारित मेंटल हेल्थ प्रोग्राम- आवो बात करें चलाया जा रहा है, जिसका अब तक बहुत ही सकारात्मक परिणाम मिला है।

 कार्यशाला के अंतिम चरण में एमरजेंसी अफसर विशाल वासवानी ने आपदा प्रबंधन में मीडिया की भूमिका कैसी हो इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी। क्लोजिंग सेरोमनी के तहत सभी प्रतिभागियों को छत्तीसगढ़ का नियाग्रा कहा जाने वाला चित्रकोट वाटरफाल का हस्तचालित नाव में बैठकर भ्रमण कराया गया।

इस वर्कशॉप में यूनिसेफ के आला अधिकारियों के अलावा रायपुर, धमतरी, अम्बिकापुर राजनांदगांव, बलरामपुर और बस्तर क्षेत्र के चुनिंदा पत्रकार शामिल थे।


अन्य पोस्ट