धमतरी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
कुरूद, 9 नवंबर। दीप पर्व पर तर नाह नारी मोर नर नारी ओ सुवा मोर जैसे पारंपरिक लोकगीत के साथ सामूहिक पंडक़ी नृत्य करती महिलाओं की टोली दुकानों और घरों के आगे सुआ नृत्य करते नजर आ रही हंै। मिलने वाले ईनाम के बदले गीत के माध्यम से आशीष देने वाली बालिकाओं एवं महिला समूह छत्तीसगढ़ी परंपरा को आगे बढ़ाने का काम कर रही हंै।
गौरतलब है कि पाश्चात्य सभ्यता का तामझाम हमारे पारंपरिक तीज-त्यौहार पर ग्रहण की तरह छाने लगा है। गांव में अब नाचा गम्मत की जगह डीजे की भडक़ाऊ फिल्मी डांस ने ले ली है। बढ़ते शहरीकरण के चलते ग्रामीण व्यवस्था का दम घुटने लगा है। ऐसे में गांव की बालिका और पारंपरिक परिधानों से सजी महिलाएं जब टोकरी में मिट्टी के बने रंग-बिरंगे तोते को बीच में रख गोलाकार सुआ नृत्य करती हैं, तो छत्तीसगढ़ी संस्कृति की गहराई का अंदाजा लगता है। ग्रामीण क्षेत्र से सुआ नृत्य करने आई माला, सुशिल्या,मानबाई, कामीन, श्यामा, केसरी बाई, तारिणी, आदि ने बताया कि गांव घर से विरासत में मिली इस परंपरा को कायम रखने वे हर साल दीपावली में सुआ नृत्य करने कुरुद आती हैं। बदले में उन्हें अनाज और चंद रूपये मिलते है जिन्हें वे आपस में बांट त्यौहार की खुशियां खरीदती हैं। लेकिन इस बार धान कटाई और चुनाव मौसम एक साथ पडऩे से हमारी कुछ सदस्य उस काम में व्यस्त हो गई है, इसलिए इस बार सुआ नृत्य करने वाली टोली कम ही नजर आ रही है।
इसी तरह दीपावली पर्व में गौरी-गौरा उत्साह का भी अलग महत्व है। लक्ष्मी पूजा के सप्ताह भर पहले गौरा चौक में मोहल्लेवासी रात में इकठ्ठा होते हैं। दफड़ा, निसान बाजा और मोहरी की धुन में महिलाएं गौरा जगाने गीत गाती हैं। लक्ष्मी पूजा की रात करसा परघाई करने बाजे-गाजे के साथ महिलाओं की टोली घर-घर जाती है। अगले दिन शोभायात्रा निकाल गौरा विसर्जन किया जाता है,
परन्तु इस बार ग्रहण के चलते एक दिन बाद विसर्जन करने की बात हो रही है।


