धमतरी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
कुरुद, 4 नवंबर। नाम वापसी के बाद कुरुद विधान सभा क्षेत्र में चुनावी रंग चढ़ाने दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का पूरा फोकस गांवों में है। प्रत्याशी सुबह से रात तक बैठकें लेकर मतदाताओं को साधने के जतन में व्यस्त हैं। कार्यकर्ता सम्मेलन के अलावा अभी तक किसी भी दल का कोई स्टार प्रचारक यहां नहीं पहुंचा है। गांव के किसान धान कटाई और नगर के लोग दीपावली की तैयारियों में लगे हैं, लेकिन समर्थक सोशल मीडिया में अपने नेता के जीत का दावा बढ़-चढक़र अपना नंबर बढ़ाने में लगे हैं।
गौरतलब है कि इस बार कुरुद का चुनाव औरा इसलिए खास है कि दोनों प्रत्याशी एक ही बिरादरी के हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है। साहू बाहुल्य क्षेत्र होने के बावजूद करीब 9500 साहू समाज के मतदाता इस बार दर्शक दीर्घा में बैठे नजर आ रहे है।
इसके पूर्व कांग्रेस ने एकाद अपवाद को छोडक़र हमेशा यहां से साहू प्रत्याशी को मौका दिया था, पर इस बार लीक से हटकर अजय चन्द्राकर के काट के लिए तारिणी चंद्राकर को मौका दिया है। लेकिन भाजपा ने इस सीट पर कभी भी सोशल इंजीनियरिंग के हिसाब से प्रत्याशी तय नहीं किया। इसके बावजूद वह दो दशक से क्षेत्र में काबिज है। इससे साबित होता है कि क्षेत्रीय मतदाताओं ने कभी भी जातिगत आधार पर मतदान नहीं किया है।
इस बार बहुसंख्यक आबादी का झुकाव किस पार्टी के पक्ष में होगा यह तो परिणाम आने के बाद पता चलेगा। लेकिन कुरुद विधानसभा के चुनाव समर में अब तक जैसी हवा चल रही है उसे देख ऐसा लगता है दोनों दलों से मुद्दे गायब रहेंगे। क्योंकि दोनों प्रत्याशी के तरफ से व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप से ही राजनीति की शुरूआत हुई है। कोई किसी को माफिया बता रहा है, सोशल मीडिया में गाली गलौज के वीडियो,ऑडियो जारी हो रहे हैं। कोई किसी को भ्रष्टाचारी कह रहा है। इसलिए मुद्दों को छोडक़र आपसी वैमनस्यता पर ज्यादा बात हो रही है। ये कुरुद विधानसभा की तासीर नहीं है, यहां आपसी भाईचारा हमेशा रहा है?। लेकिन इस बार की हवा कुछ और ही संकेत दे रही है।
वर्तमान में दोनों प्रमुख दल आपसी रार और दरार से जूझ रहे हंै। मान मनौव्वल का दौर बीत जाने के बावजूद कांग्रेस और भाजपा के स्टार और स्थापित नेता अभी भी चुनावी परिदृश्य से ओझल है। इस चुनाव में ऐसे रुठे नेताओं की भूमिका को लेकर दोनों प्रत्याशी टेंशन में हैं। भाजपा कांग्रेस के अलावा कहने को तो इस सीट पर इस बार भी बसपा, जेसीसी जैसी पार्टियों सहित पंद्रह उम्मीदवार चुनाव लडक़र विधायक बनना चाहते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि हार जीत का फैसला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होता रहा है। बाहरहाल चुनावी बिसात में जारी शह और मात के इस खेल को क्षेत्रिय मतदाता बड़े शांत मुद्रा में देख रहा है। जो भी हो इस बार का चुनाव यहां बहुत ही रोमांचक होगा इसमें किसी को कोई शक नहीं है।


