राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में अजय चतुर्वेदी ने सरगुजा रियासत के गढ़, गढ़ी, दुर्ग और किलों को किया प्रस्तुत
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
अम्बिकापुर, 27 फरवरी। संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व रायपुर, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी गढ़ों का गढ़ छत्तीसगढ़ (दुर्ग और दुर्गीकरण के विशेष संदर्भ) में जिला पुरातत्व संघ सूरजपुर के सदस्य अजय कुमार चतुर्वेदी, राज्यपाल पुरस्कृत व्याख्याता ने ‘सरगुजा रियासत के गढ़ ,गढ़ी, दुर्ग और किलों का ऐतिहासिक अध्ययन’ विषय पर शोध पत्र पढ़ कर सरगुजा अंचल के छुपे इतिहास को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
रायपुर में 26 से 27 फरवरी तक आयोजित राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में अजय कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि सरगुजा अंचल में पहले गोंडवाना और रक्सेल वंशीय राजाओं का राज था। मान्यताओं के अनुसार सूरजपुर जिले का प्रतापपुर, भैयाथान व ओडग़ी का क्षेत्र प्राचीन समय से ही किसी न किसी राजा, या विशेष जनजाति के आधिपत्य वाले प्रमुख गढ़ के तौर पर विख्यात रहा है। समय-समय पर अलग-अलग क्षेत्र में राजाओं ने अपना आधिपत्य कायम रखते हुए अपना साम्राज्य विकसित किया था।
मान्यता है कि गौड़ राजा रमकोला व आसपास क्षेत्र की पहाडिय़ों पर अपने सुरक्षित रहने के स्थान का निर्माण करते हुए समुदाय के साथ रहा करते थे, और एक बड़े भू-भाग में इनका कई क्षेत्रों पर अपना आधिपत्य था। ओडग़ी क्षेत्र में राजा बालेन्दु (बालम राजा) के गढ़ों के अवशेष पहाडिय़ों पर बिखरे हुए हैं।
कुदरगढ़ के संबंध में एक मान्यता प्रचलित है कि मध्य प्रदेश के सीधी जिला के मड़वास का खैरवार क्षत्रिय राजा बालेन्दु कुदरगढ़ी माता बाल देवी का प्रथम सेवक था। राजा बालंद अन्य राजाओं से युद्ध में पराजित होकर शहडोल जिला के बिछी नामक स्थान पर रहता था।
राजा बालंद ने शहडोल से सरगुजा अंचल के कोरिया जिले के चांगभखार, पटना और सूरजपुर जिले के कुदरगढ़ क्षेत्र में अपना अधिकार फैलाया था। कोरिया जिले के पटना क्षेत्र में बालम पोखरा, बालम तालाब, और सोनहत विकासखंड में बालम गढ़ी पहाड़ आज भी देखने को मिलता है।
सूरजपुर जिले के ओडग़ी विकासखंड के कुदरगढ़ पहाड़ पर बालमगढ़, तमोर पिंगला अभ्यारण क्षेत्र के पुतकी गांव के बालमगढ़ पहाड़ी पर गढ़ के अवशेष, चांदनी बिहारपुर क्षेत्र के महोली गांव की गढ़वतिया पहाड़ी पर बालमगढ़ के अवशेष बिखरे पड़े हैं। इन्हीं राजाओं द्वारा निर्मित गढ़ और किलों के अवशेष खंडहर के रूप में पर्वतों और मैदानी क्षेत्रों में सरगुजा अंचल में आज भी देखने को मिलते हैं। पुरानीगढ़ी, भैयाथान में स्थापत्य कला के सबसे प्राचिन नमूने देखने को मिलते हैं।
रघुनाथ पैलेस सरगुजा की शान
अंबिकापुर का रघुनाथ पैलेस की बनावट सरगुजा की शान है। 119वें अर्कसेल वंशीय सरगुजा महाराजा बहादुर रघुनाथशरण सिंह देव (1879-1917) की प्रशस्ति में सरगुजा रियासत के राजकवि कवीन्द्र अम्बिका प्रसाद भट्ट अम्बिकेश द्वारा लिखा गया।
प्रतापपुर राजा की गढ़़ी को शास्त्र विधान के अनुरूप बनाया गया था, जिसे आज भी देखा जा सकता है। राज महल के चारों तरफ सभी देवी-देवताओं के मंदिर बने हुए हैं। इसलिए प्रतापपुर को मंदिरों का नगर कहा जाता हैू।
श्रीगढ़ की पहाड़ी पर निर्मित गढ़ी, गिरि दुर्ग का एक उदाहरण है
अंबिकापुर की श्रीगढ़ की पहाड़ी पर निर्मित गढ़ी, गिरि दुर्ग का एक उदाहरण है। क्योंकि यह महामाया पहाड़ी के श्रीगढ़ में बनाया गया है। इसका उल्लेख सरगुजा रियासत के राजकवि कवीन्द्र अम्बिका प्रसाद भट्ट अम्बिकेश द्वारा सम्पादित अर्कसेल-वंशावली में मिलता है। 106वें अर्कसेल वंशीय सरगुजा महाराजा यशवंत सिंह (1728-1749) की प्रशस्ति में लिखित दोहा में इसका उल्लेख है। अजय कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि जिन जिलों में या शहरों में गढ़ या रियासत रहे हैं, उन पर शोध कर रहा हूं। छत्तीसगढ़ एक ऐसा गढ़ है, जहां अनगिनत गढ़ हैं। जिसे खोज करने की आवश्यकता है।
उन्होंने सरगुजा के बारे में बताया कि सरगुजा क्षेत्र में रक्सल वंशीय राजा, गोंडवाना राजा और बालेंदु राजाओं का भी राज रहा है. इन राजाओं ने वहां की पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में गढ़ बनाकर शासन किये थे और अपना आधिपत्य जमाया था. आज भी सरगुजा के पहाड़ों पर गढ़ के अवशेष मौजूद हैं। इस तरह सम्पूर्ण सरगुजा अंचल में वन क्षेत्र, पहाड़ी क्षेत्र और मैदानी क्षेत्र में गढ़, गढ़ी, दुर्ग और किलों के अवशेष विखरे हुए हैं। इन्हे ढ़ुढ कर सरगुजा के इतिहास को प्रकाशित करने की आवश्यकता है।