श्री अग्रसेनधाम रायपुर में 13 अक्टूबर तक प्रतिदिन होंगे चार सत्र
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 9 अक्टूबर। जीवन विद्या शिविर में प्रबोधक श्री सोमदेव त्यागी ने कहा कि बच्चों को डांट फटकार करके सिखाना चाहते हैं। हम बच्चों को सुधारने के लिये मारते पिटते हैं। पर यही सही नहीं है। पशुओं को मार कर ट्रेड किया जा सकता है पर मानव प्यार चाहता है। छोटा बच्चा भी चाहता है कि उसे गलती पर डांटा न जाए, बल्कि स्नेहपूर्वक समझाये।
अभ्युदय संस्थान अछोटी व्दारा आयोजित जीवन विद्या शिविर के तीसरे दिन बच्चों के सीखने की प्रवृत्ति पर चर्चा हुई।
श्री त्यागी ने कहा कि मां बाप किसी पुरानी मान्यता से ऐसा करते हैं, यहां मान्यता बदलने की जरूरत है। दूसरो के अंक की तुलना करके मां बाप अपनी भ्रमित मान्यता को बच्चों के ऊपर थोपते हैं। यदि मां बाप की मान्यता में है कि कठोरता से बोलने से बच्चे सुधरते हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में यह मान्यता ठीक नहीं है। कठोरता से बोलने पर बच्चे रूढ़ होते जा रहे हैं। बड़े होकर उनके स्वभाव में कठोरता दिखने लगती है। बच्चे गलती नहीं करना चाहते, उन्हें सही का पता नहीं है इसलिये गलती कर देते हैं।
परमाणु से लेकर ग्रह-नक्षत्र नियम सेचलते हैं तो मानव क्यों है इतना अव्यवस्थित
श्री सोमदेवत्यागी ने कहा कि यह अस्तित्व याना पूरी सृष्टि किसी नियम से संचालित है। जब परमाणु से लेकर सारे ग्रह-गैलेक्सी नियम से चल रहे हैं। धरती से लेकर वनस्पति जगत और प्राणी संसार तक सभी नियम नहीं तोड़ते हैं फिर इस सृष्टि की अनमोल और सर्वोकृष्ट रचना मानव इतना उलझा हुआ और समस्याग्रस्त क्यों लगता है। इसका कारण है कि मैं स्वयंको नहीं पहचानता हूं। जहां नियम का विरोध होता है, वहा दु:ख होता है। मैं रोटी,कपड़ा, मकान को ही अपना सबकुछ मानता हूं। रूप, धन, पद और बल को ही मैं सबकुछ मानताहूं। यह सारी चीजों सीमित हैं। ये सभी मेरे शरीर के लिए तो आवश्यक है पर मुझे तृप्तिनहीं दे पाती। इसका कारण है कि मैं असीमित सुख चाहता हूं।
असीमित शांति चाहता हूं।असीमित आनंद चाहता हूं। जबकि इंद्रिय और धन-पद सीमित वस्तु है। इससे असीमित कीपूर्ति नहीं हो पाती है। रूप, बल, पद और धन परिवर्तनशील है। यह हमेशा बदलते रहताहै। इसलिए आज सबसे धनवान व्यक्ति भी अशांत है, धन के प्रति उसकी लालसा कम ही नहीं होती। जो किसी पद में है, वह से छोडऩा नहीं चाहता बल्कि और बड़े पद की लालसा बनीरहती है। इसके लिए वह सारे अनैतिक कार्य करने से गुरेज नहीं करता है। वास्तविकतामें मानव एक चैतन्य इकाई है, जिसे असीमित सुख,शांति, संतोष, आनंद की तलाश है। यह भौतिकवस्तु से नहीं मिल सकती। मैं स्वयं में विश्वास के साथ होता हूं। सम्मान के साथहोता हूं तभी निरंतर सुखी होता हूं, संतोष और आनंद में होता हूं। उन्होंने कहा किहर मनुष्य अपने महत्व को जानकर तृप्त होता है, उसकी उपयोगिता ही उसका महत्व है। जबहम किसी दूसरे के लिए उपयोगी हो पाते हैं तो खुद को सुखी महसूस करते हैं।