बलौदा बाजार
रोजगार की तलाश में दीगर प्रांत जाने मजबूर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बलौदाबाजार, 4 जनवरी। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में खेती किसानी का कार्य समाप्त होने के बाद लोगों को जीवनयापन की चिंता सताने लगी है। खेती के कार्य मुख्यत: अगस्त से नवंबर तक चलती है, इसके बाद लगभग तीन माह तक ग्रामीणों के पास कोई स्थाई रोजगार नहीं होता।
गरीब तबके के लोग परिवार का खर्चा उठाने के लिए गांव छोडक़र अन्य राज्यों की ओर रोजगार की तलाश में जाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। इन दिनों नगर के बस स्टैंड पर रोजाना बड़ी संख्या में पलायन करने वाले वालों की भीड़ देखी जा सकती है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर रोजगार मूलक कार्य शुरू हो जाए तो वह अपने परिवार के साथ रहकर जीवनयापन कर सकते हैं। लेकिन रोजगार की कमी और बढ़ती आर्थिक चुनौतियों ने उन्हें यह कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया है।
जिले से बाहर जाने वाले खेतिहर प्रवासी मजदूरों की संख्या डेढ़ लाख से भी ज्यादा है, इसमें से सवा लाख तो कोरोना काल में रिकॉर्ड भी किए गए थे।
रोज सैकड़ों मजदूर बाहर जा रहे, स्टेशनों, बस स्टैंड में भीड़
जिले से लगभग रोज ही करीब सैकड़ों लोग कमाने के लिए दूसरी जगह में जाते हैं। यह सिलसिला पिछले 12 13 दिनों में जारी है। बाहर जाने वाले मजदूरों की भीड़ के रायपुर, तिल्दा और भाटापारा रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड में रोज देखी जा सकती है। हजारों लोग बाहर जा चुके हैं, बचे हुए फसल बेचने के बाद जाएंगे। यह आंकड़ा फिर इस साल एक लाख से ऊपर जा सकता है। कसडोल विकासखंड के गांव से ज्यादा लोग बाहर जा रहे हैं। कोलिहा, कोससारा, नांदिया, परसदा, डोंगरीडीह, डोगरा, तिल्दा, बाजारभाटा, गंगई, सुनसुनिया आदि गांवों से मजदूरों का जाना शुरू हो चुका है।
इस संबंध में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अभिषेक सिंह का कहना है कि स्वेच्छा से अगर कोई कहीं जाता है तो हम उन्हें नहीं रोक सकते। मगर हमें यह शिकायत मिलती है कि दलालों के माध्यम से लालच देकर मजदूरों को यहां से ले जाया जा रहा है, इस स्थिति में हम कार्रवाई कर सकते हैं।
कोरोना काल में सवा लाख से भी ज्यादा प्रवासी मजदूरों की बलौदाबाजार जिले में हुई थी वापसी
पूरे प्रदेश में बलौदाबाजार ही इकलौता जिला है, जहां सबसे ज्यादा मजदूर आजीविका के बाहर जाते हैं। वैसे तो निश्चित आंकड़ा अभी सामने नहीं आया था मगर कोरोना संक्रमण के समय प्रवासी मजदूरों की वापसी के समय बाहर से आने वाले मजदूरों की जो सूची बनी थी उसमें उनकी संख्या 1 लाख 25 हजार से भी अधिक थी।
तत्कालीन उपायों के तहत उन विभागों में भी रोजगार के अवसर तलाश से गए ,जहां अधिकांश काम मशीनों से कराया जा रहा था। इसके तहत पथ निर्माण, पुल निर्माण, मनरेगा, अधीक्षक एवं कार्यपालन अभियंताओं को आदेश जारी किया गया था कि मशीनों के बदले मानव बल का प्रयोग प्रयोग किया जाए, पर पीएचई, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग में लगातार मशीनों से ही काम कराया जा रहा जिससे मजदूरों को कम नहीं मिल पाया था।
सीमेंट संयंत्रों में भी काम नहीं दिला सका प्रशासन
जिले में विश्व स्तरीय सीमेंट संयंत्र जैसी बड़ी औद्योगिक इकाइयां चालू है, उनमें बाहर जाने वाले कामगारों को समायोजित किया जा सक ता है। विडंबना यह है कि इस जिले के स्थानीय निवासियों को रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों में जाना पड़ता है। यह समस्या कई कारणों से जटिल हो गई है। कंपनियां बाहरी प्रशिक्षित श्रमिकों को प्राथमिकता देती है, इससे स्थानीय लोगों को अवसर नहीं मिल पाते। सरकारी योजनाओं का सही तरीके से क्रियान्वयन न होना और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता ने समस्या को और गहरा दिया है।


