बलौदा बाजार
सीमेंट संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर पहुंचने से जनसामान्य चिंतित
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बलौदाबाजार, 30 दिसंबर। अंचल के स्थापित प्रमुख सीमेंट संयंत्रों पर मापदंडों की अनदेखी कर व्यापक पैमाने पर प्रदूषण तत्व उत्सर्जित करने की बात संयंत्र की परिधि में स्थित वासियों द्वारा कही जा रही है। प्रदूषण के दुष्प्रभाव से मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पडऩे के अलावा पेड़ पौधों एवं पक्षियों की बहुमूल्य प्रजातियां नष्ट होने अथवा विलुप्त के कगार पर पहुंच रही है। प्रदूषण रोधी यंत्र (ईएसपी) के उपयोग में कोताही बरतने के चलते कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन व सल्फर डाइऑक्साइड जैसे जहरीले जैसे हवा में घुलकर बहुत बड़ी आबादी के जीवन के लिए खतरनाक साबित हो रही है। सीमेंटों से सतत उडऩे वाली धूल के कण आसपास के खेतों में सफेद चादर की तरह बिछे हुए देखे जा सकते हैं।
विदित हो कि विगत कुछ वर्षों में इन संयंत्रों के विस्तारीकरण, द्वितीय तृतीय यूनिट की स्थापना के चलते प्रदूषण के स्तर के आंकड़े और भायवह होते जा रहे हैं। कुछ संयंत्रों को निर्धारित मापदंडों का प्रयोग न करने के कारण रेड श्रेणी अर्थात अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले संयंत्रों के रूप में चिहित किए जाने की जानकारी भी प्राप्त हुई है। वहीं सीमेंट संयंत्रों द्वारा निर्मित पावर प्लांट के अलावा उनकी कॉलोनी हेतु भू जल के अत्यधिक मात्रा में दोहन से प्रभावित ग्राम वासियों के सक्षम जल संकट उत्पन्न होने लगा है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पूर्व से ही आंचल में विश्व स्तररीय सीमेंट संयंत्र स्थापित है। इन संयंत्रों द्वारा प्रदूषण नियंत्रण व पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं परंतु वास्तव वास्तु में स्थिति इनके पूर्णता विपरीत होती है। संयंत्रों द्वारा दिखावे के लिए दिन में प्रदूषण नियंत्रक यंत्र को चालू रखा जाता है परंतु रात्रि के दौरान अधिकांशत: बंद रखने की शिकायतें आसपास के निवासियों द्वारा की जाती है। जिसका प्रमाण इन इलाकों के खेतों, धर, की छतों, वाहनों एवं कपड़ों पर जमे धूल एवं धुआं के कणों के रूप में मिलता है। कुछ संयंत्रों द्वारा सीनाजोरी करते हुए दिन में भी जमकर धुएं का उत्सर्जन किया जा रहा है। इन सबके बावजूद संयंत्रों पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समेत सक्षम अधिकारियों के द्वारा अब तक कड़ी कार्रवाई में कोताही बरती जा रही है।
ठंड के दिनों मे चिमनी से निकलने वाली गैसों के ऊपर ना उडऩे से प्रदूषण के स्तर में और भी वृद्धि हुई है। धूल धुआं के कण संयंत्र से गुजरने वाले मार्ग पर गुब्बारा के रूप में एकत्र होने के कारण वाहन चालको की दृश्यता में कमी हो जाती है। जिससे दुर्घटना की आशंका भी बनी रहती है। आंचल के कृषक इस बात को लेकर चिंतित है कि संयंत्रों द्वारा भू जल के अंधाधुन्ध दोहन व इससे निकलने धूल के कणों की चादर खेत पर जमने से खेतों के बंजर होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। कृषकों द्वारा इसे संयंत्रों की सोची समझी साजिश करार दिया गया है। ताकि परेशान कृषक अपने कृषि भूमि इन संयंत्रों को बेचने विवश हो जाये।
प्रदूषण के दुष्प्रभाव पशु, पक्षी, व पेड़ पौधों की प्रजातियों के अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगा है। संयंत्रों की मशीनों से उत्पन्न होने वाले शोर से भी आसपास रहने वाले त्रस्त हैं। विशेषकर रात्रि के दौरान मशीनों के कनफोडू आवाज वातावरण में घूमते रहते हैं। संयंत्रों द्वारा उत्पन्न हेतु बड़े पैमाने पर अत्यधिक क्षमता का विस्फोटक किए जाने से ध्वनि तथा वायु प्रदूषण में और भी वृद्धि हो रही है। जिन पर प्रभावित नियंत्रण की आवश्यकता आंचल वासियों द्वारा महसूस की जा रही है।


