बलौदा बाजार

12 किमी लंबे बाईपास में एक लाइट भी नहीं
01-Dec-2024 2:19 PM
12 किमी लंबे बाईपास में एक लाइट भी नहीं

तीन डेंजर पॉइंट बनाकर भूले, इधर ट्रक पार्किंग से हादसे 

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बलौदाबाजार, 1 दिसंबर।
शहर को राजधानी रायपुर भाटापारा और लवन को जोडऩे के लिए पहली बार 2005 में बाईपास की योजना आई। तत्कालीन सीएम डॉ. रमन सिंह ने इसकी घोषणा की थी। मंजूरी मिलते 10 साल लग गए, 2015 में भूमि अधिग्रहण के साथ प्रोजेक्ट शुरू हुआ। जैसे-तैसे 2020 में बाईपास बनकर तैयार हुआ। आज 4 बरस हो गए, 12 किलोमीटर लंबे इस पूरे बाईपास में एक लाइट नहीं लग पाई है। खामियाजा उन राहगीरों को भुगतना पड़ रहा है, जो रात के अंधेरे में बड़ी गाडिय़ों की आंखें चौधिया देने वाली लाइट के चलते हादसे के शिकार हो रहे हैं। ऊपर से कदम-कदम पर हैवी गाडिय़ों की अवैध पार्किंग भी मौत को न्योता दे रही है। इसके चलते आए दिन लोग हादसे के शिकार हो रहे हैं। 

गौरतलब है कि मरम्मत के अभाव में आज लगभग पूरा बाईपास ही जर्जर है। इसका कारण हैवी गाडिय़ां हैं। दरअसल राजधानी रायपुर से रायगढ़ जांजगीर और ओडिशा तक सीमेंट किंलकर स्टील और रेत लाने ले जाने के लिए बलौदाबाजार रूट का इस्तेमाल किया जाता है। हैवी गाडिय़ों को शहर में एंट्री की अनुमति नहीं है। वे सभी बाईपास के जरिए शहर के बाहर से ही निकल जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक हर दिन 1000 से ज्यादा हैवी गाडिय़ां बाईपास का इस्तेमाल कर रही है। इनके लोड से सडक़ जगह-जगह से धंस गई है। 

डामर उखडऩे के साथ गिट्टी भी निकाल आई है। इससे कई जगहों पर गहरे गड्ढे हो गए हैं। इस वजह से लोग आए दिन हादसे का शिकार हो रहे हैं। बढ़ते हादसों को देखते हुए 2 साल पहले बाईपास में तीन डेंजर पॉइंट खोजे गए। जिसमें सकरी चौराहा कुकुरदी तिराहा और पनगांव तिराहा शामिल है। तत्कालीन कलेक्टर रजत बंसल ने तीनों डेंजर में सुरक्षा इंतजाम दुरुस्त करने और पूरे बाईपास में हाई मास्टर लाइट लगाने की प्लानिंग की थी। उनके तबादले के बाद से बाईपास में ट्रैफिक सुधार की फाइल कलेक्ट्रेट दफ्तर में धूल फाक रही है। हादसे के दिन ब दिन बढ़ते जा रहे हैं। शहर जिस तरह बाईपास की घोषणा से लेकर मंजूरी और निर्माण देखा है उसे देखते हुए लोगों का एक ही सवाल है सडक़ के उद्घाटन के बाद लाइट लगाने के लिए 4 साल काफी या अभी और इंतजार बाकी ? 

यातायात सुधार के लिए  सिग्नल की दरकार
प्रशासन को पता है कि बाईपास के तीन डेंजर पॉइंट हादसों का हॉटस्पॉट है। यहां हाई मास्टर लाइट सीसीटीवी लगाना दूर अब तक ट्रैफिक सिग्नल तक नहीं लगाए गए हैं। यहां यातायात सुधार के लिए सबसे ज्यादा सिग्नल की ही दरकार है। अभी यहां तीनों चरणों दिशाओं से आने वाली गाडिय़ां नियंत्रित रफ्तार से मुड़ती है। इससे भी कई बार हाथ से हुए हैं। सिग्नल लगाए जाएंगे तो एक वक्त पर ही दिशा से गाड़ी निकल पाएगी हादसे की आशंका भी काम हो जाएगी। अफसरों की लापरवाही का नमूना ही कहिए कि लोगों की मौत को न्योता देने वाले इन चौराहों चौराहे पर अब तक सिग्नल भी लगना जरूरी नहीं समझ गया। 

दिन ढलते ही अंधेरे की आगोश में समा जाती है
स्कूल कॉलेज गोइंग स्टूडेंट्स वेस्ट इंडस्ट्रियल एरिया के मजदूर नौकरीपेशा लोगों समेत सडक़ों ग्रामीण आने जाने के लिए बाईपास का ही इस्तेमाल करते हैं। इन दोनों ठंड में मजबूर सूरज जल्दी ढल रहा है। शाम 5 बजे के बाद से ही अंधेरा जाने लगता है। ऐसे में बाईपास में एक भी लाइट का नहीं होना इन सैकड़ो लोगों के जी का जंजाल हो गया है। बड़ी गाडिय़ों की आंख चौधिया देने वाली लाइट से जहां गड्ढा नजर नहीं आ रहे। और लोग गिरकर चोटिल हो रहे हैं। जो जगह-जगह ट्रैकों की अवैध पार्किंग भी बड़ी समस्या बन गई है।

किसी बड़ी गाड़ी को ओवरटेक करते वक्त अचानक आधी सडक़ गहरी ट्रक या हाईवे नजर आ जाए तो बाइक पर कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि बीते सालों में दर्जनों लोग खड़ी गाडिय़ों से टकराकर  मौत के शिकार हुए प्रशासन को समझना होगा कि लोगों के लिए सडक़ जागरूकता जितनी जरूरी है संबंधित विभाग के लिए सडक़ सुधार भी उतनी ही जरूरी है। 
 


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